ठाकरे बंधुओं से दूर हो रहे हैं शिव सेना के परंपरागत मतदाता
महाराष्ट्र में विगत दिनों संपन्न हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा 29 में से 17 नगरनिगमों में अकेले अपने दम पर बहुमत हासिल करने में सफल रही है जबकि 8 नगर निगमों में भाजपा नीत महायुति ने बहुमत हासिल किया है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के गठबंधन को इन चुनावों में मिली करारी हार ने सदमे की स्थिति में पहुंचा दिया है।
ये चुनाव परिणाम मुंबई महानगर पालिका में तीस साल से चले आ रहे अविभाजित शिवसेना के वर्चस्व के अंत का संदेश लेकर आए हैं। गौरतलब है कि भाजपा ने मुंबई महानगर पालिका की 227 सीटो में से 89 सीटों पर जीत हासिल कर इतिहास रच दिया है।

सत्तारूढ़ महायुति में भाजपा की सहयोगी शिवसेना ( शिंदे गुट)29 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना 65 सीटों पर सिमट कर तीसरे स्थान पर आ गई। सबसे शोचनीय स्थिति का सामना उसकी सहयोगी राज ठाकरे की महाराष्ट्र सेना को करना पड़ा जिसे मात्र 6 सीटों पर जीत का स्वाद चखने का मौका मिला। इन नगरीय चुनावों में भाजपा की अभूतपूर्व शानदार सफलता ने निसंदेह राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का कद बढ़ा दिया है जिनकी कुशल रणनीति और सबको साथ लेकर चलने की कार्यशैली ने भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने अपने आपसी मतभेद भुलाकर जो चुनावी गठबंधन किया था उसे मिली करारी शिकस्त ने अब यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दोनों ठाकरे बंधु मिल कर आगे आने वाले समय में बाला साहेब ठाकरे की विरासत को सहेज कर रखने में सफल हो पाएंगे और इससे भी बड़ा सवाल तो यह है कि दोनों ठाकरे बंधुओं के बीच की यह राजनीतिक मैत्री क्या स्थायी रूप लेने में सफल हो पाएगी। अपनी पार्टी की करारी हार पर राज ठाकरे ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की है उससे यह संदेश मिलता है कि वे अपनी लाइन से नहीं हटेंगे। राज ठाकरे कहते हैं कि "हमारी लड़ाई मराठी लोगों, मराठी अस्मिता, मराठी पहचान और एक खुशहाल महाराष्ट्र के लिए है। हमारी लड़ाई हमारे वजूद की है। सबाइन जानते हैं कि ऐसी लड़ाईयां लंबी चलती हैं।"
इसी से मिलती जुलती प्रतिक्रिया उद्धव ठाकरे की शिवसेना की ओर से आई है जिसमें कहा गया है कि "यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।यह लड़ाई तब तक चलेगी जब तक कि मराठी लोगों को वह सम्मान नहीं मिल जाता जो वह डिजर्व करते हैं।" दोनों ठाकरे बंधुओं की प्रतिक्रियाओं से केवल यही मतलब निकाला जा सकता है कि वे अपनी लाइन से हटने के लिए तैयार नहीं हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि उनका पूरा चुनाव अभियान मराठी अस्मिता के नाम पर ही केन्द्रित था जो मतदाताओं को आकर्षित करने में असफल रहा। नगरीय निकायों के ताजा चुनाव परिणामों को तो मतदाताओं के इस संदेश के रूप में देखा जाना चाहिए कि उन्हें भाजपा नीत महायुति के सत्ता में रहने से मराठी अस्मिता पर कोई संकट नहीं आ रहा है।
दरअसल नगरीय निकायों के चुनाव परिणामों में ठाकरे बंधुओं के लिए यह संदेश भी छुपा हुआ है कि महाराष्ट्र की जनता उन्हें मराठी अस्मिता के रक्षक के रूप में पुरस्कृत करने के लिए तैयार नहीं है। गौरतलब है कि भाजपा नीत महायुति ने तो यहां विकास के नाम वोट मांगे थे वहीं दूसरी ओर ठाकरे बंधुओं का पूरा चुनाव अभियान मराठी एजेंडा के इर्द गिर्द ही घूमता रहा। चुनाव के पहले उद्धव ठाकरे ने जिस तरह कांग्रेस का साथ छोड़ कर राज ठाकरे से हाथ मिला लिया उसकी उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी। इससे उन्होंने दलित और मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन को दिया। इन चुनाव परिणामों से उद्धव ठाकरे को यह सबक भी लेना चाहिए कि शिवसेना के परंपरागत मतदाता भी उनसे दूर होते जा रहे हैं और झुकाव उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना की तरफ जा रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि एकनाथ शिंदे ने मूल शिवसेना से अलग हो कर अपनी पकड़ ढीली नहीं होने दी और आज वे मुंबई महानगर पालिका की 29 सीटें जीतकर मेयर पद के लिए भाजपा के साथ सौदेबाजी करने के लिए तैयार हैं।
(लेखक कृष्णमोहन झा राजनैतिक विश्लेषक है)
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