Semiconductor: आत्मनिर्भर भारत अब बनायेगा सेमीकंडक्टर चिप
Semiconductor: इस हफ्ते, भारत में सेमीकंडक्टर की मैनुफैक्चरिंग को लेकर दो अच्छी खबरें आई हैं। पहली है, अमेरिकी कंपनी माइक्रॉन टेक्नोलॉजी द्वारा गुजरात में सेमीकंडक्टर लगाने की घोषणा। और दूसरी, वेदांता-फॉक्सकॉन द्वारा जॉइंट वेंचर के रूप में गुजरात में ही सेमीकंडक्टर मैनुफैक्चरिंग शुरू करने के लिए आवेदन। इसमें वेदांता की 67% हिस्सेदारी है। भारत सरकार ने देश में सेमीकंडक्टर उत्पादन शुरू करने के लिए एक जून से फिर से आवेदन मंगाने शुरू किए हैं। आशा की जा रही है कि अभी और कई बड़ी कंपनियां भी भारत में सेमीकंडक्टर बनाने में दिलचस्पी दिखा सकती हैं।
दुनिया में सेमीकंडक्टरों की खपत में भारत सातवें स्थान पर है। पिछले साल बाजार में हमारी भागीदारी चार फीसदी थी, जिसके वर्ष 2026 तक छह प्रतिशत होने का अनुमान है। 768 अरब डॉलर के इस विशाल बाजार में यह बहुत कम लग सकता है। फिर भी दो साल पहले यह राशि 27.2 अरब डॉलर थी। भारत में सेमीकंडक्टर मार्केट की वैल्यू में हर साल 19% की बढ़ोत्तरी हो रही है। इससे यह 2026 तक दोगुने से भी ज्यादा, करीब 64 अरब डॉलर हो जाएगी। ऐसे में यह बहुत जरूरी है कि भारत इस मामले में भी आत्मनिर्भर बने और यहॉं बढ़ती हुई मॉंग के हिसाब से सेमीकंडक्टर की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए एक ईकोसिस्टम विकसित हो।

2022 के आंकड़ों के अनुसार, सेमीकंडक्टर चिप की वैश्विक मॉंग को पूरा करने वाले देशों में ताईवान (24%) शीर्ष पर है, साउथ कोरिया (19%) दूसरे, अमेरिका तीसरे (13%) व जापान (10%) चौथे स्थान पर। छह प्रतिशत भागीदारी के साथ चीन का स्थान पॉंचवा है। कोरोना के बाद से दुनिया भर में चीन के विरुद्ध एक असंतोष और अप्रसन्नता का माहौल बना है जिसके कारण मशीन के लिए इस महत्वपूर्ण चिप को बनाने के लिए भारत के प्रति दुनिया के सेमीकंडक्टर निर्माताओं ने रुचि दिखाई है।
दिलचस्प बात यह है कि इनमें सिर्फ जापान ही ऐसा देश है, जहॉं सेमीकंडक्टर का उत्पादन और खपत समान, दस प्रतिशत है। चीन और अमेरिका में इनकी खपत, उत्पादन के मुकाबले क्रमश: 14% व 15% ज्यादा है। इसके विपरीत, ताईवान व दक्षिण कोरिया अपनी जरूरत का क्रमश: छह व आठ प्रतिशत से 18% व 11% अधिक सेमीकंडक्टर बनाते हैं। अपने उपयोग के बाद बचे हुए सेमीकंडक्टरों को जरूरतमंद देशों को बेचकर मुनाफा कमाते हैं।
ऐसे में यह क्षेत्र भारत के लिए एक नया उभरता बाजार है, जिसमें समय रहते उसका प्रवेश काफी फायदे का सौदा साबित हो सकता है। सेमीकंडक्टर उत्पादन को प्रोत्साहित कर वह न सिर्फ इनके आयात पर खर्च होने वाली राशि बचा सकता है, बल्कि हो सकता है कि यहां इतना उत्पादन होने लग जाए, जो सेमीकंडक्टर निर्यात के माध्यम से हमारे लिए आय का एक बड़ा स्रोत साबित हो।
प्रत्यक्ष फायदों की बात करें तो माइक्रॉन का प्रस्तावित प्लांट बहुत महत्वाकांक्षी है। माइक्रॉन सेमीकंडक्टर चिप बनाने वाली विश्व की पांचवी सबसे बड़ी कंपनी है। पांच लाख वर्गफीट में आकार लेने जा रहे इस प्लांट में माइक्रॉन 6,700 करोड़ रुपए का निवेश कर रही है। सरकार के दावों को मानें तो इससे देश में पांच हजार प्रत्यक्ष नौकरियां व पंद्रह हजार कम्युनिटी जॉब्स सृजित होंगी। इन्हीं सब फायदों के मद्देनजर, केंद्र सरकार माइक्रॉन के इस संयंत्र को बहुत सपोर्ट कर रही है। 21 जून को अमेरिका में प्रधानमंत्री मोदी ने मॉइक्रॉन कंपनी के सीईओ संजय मलहोत्रा से मुलाकात की थी। इसके ठीक सात दिन बाद 28 जून को गुजरात में कंपनी के साथ एमओयू भी साइन हो गया और उनको सानंद में जमीन आवंटन के कागजात भी सौंप दिये गये। इस मौके पर गुजरात के मुख्यमंत्री के अलावा केन्द्रीय संचार एवं आईटी मिनिस्टर अश्विनी वैष्णव भी उपस्थित थे।
गुजरात के सानंद में लगनेवाले इस सेमीकंडक्टर प्लांट में कंपनी को कुल परियोजना लागत का पचास फीसदी केंद्र सरकार और 20 प्रतिशत गुजरात सरकार से मिलेगा। माइक्रोन को 22,540 करोड़ रुपए की यह वित्तीय सहायता, सरकार की मॉडिफाइड असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग(एटीएमपी) स्कीम के अंतर्गत दी जा रही है। यह प्लांट अगले साल दिसंबर तक प्रोडक्शन शुरू कर देगा।
जहां तक वेदांता और फॉक्सकॉन के साझा उपक्रम का सवाल है तो इनकी योजना भी कुछ कम महत्वाकांक्षी नहीं है। कंपनी का दावा है कि वह सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में भारत को एक विश्वस्तरीय फैब देने के लिए तैयार हैं। इसका मतलब है कि एक ऐसा सेमीकंडक्टर फेब्रिकेशन प्लांट बनायेंगे जो गुणवत्ता, उत्पादकता और सक्षमता की दृष्टि से उच्चतम मानकों का पालन करता हो। सामान्यत: ऐसे प्लांटों में अत्यधिक एडवांस्ड सेमीकंडक्टर चिप्स का निर्माण किया जाता है। इस प्रस्तावित प्लांट पर 1.54 लाख करोड़ रुपए लागत आने का अनुमान है।
रक्षा, उपग्रह परिचालन, सर्वर, रेलवे और दूरसंचार आदि बहुत सारे क्षेत्रों और मोबाइल, लैपटॉप, स्मार्ट कार, ई-व्हीकल, गेमिंग कंसोल जैसी लगभग सभी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसों में सेमीकंडक्टर चिप की जरूरत पड़ती है। जैसे-जैसे इन डिवाइसों की लोकप्रियता बढ़ रही है, सेमीकंडक्टर की वैश्विक मांग भी बढ़ती जा रही है। इस बढ़ती मांग को पूरा करने में सेमीकंडक्टर बनाने वाली कंपनियों के मौजूदा संसाधन अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। इससे सेमीकंडक्टर चिप्स की ग्लोबल शॉर्टेज हो गई है। इससे उत्पादकों और उपभोक्ताओं, दोनों को समस्या हो रही है। उत्पादक चिप न मिलने के कारण कम उत्पादन या उत्पादन में देरी की दिक्कत से जूझ रहे हैं तो ग्राहकों को अपना चहेता उत्पाद पाने के लिए बहुत इंतजार करना पड़ रहा है। उनके लिए ज्यादा कीमत भी चुकानी पड़ रही है।
लगातार प्रतिस्पर्द्धी होते जा रहे, लेकिन विकास की अपार संभावनाओं वाले, वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग में सभी अग्रणी देश इस मौके को लपकने के लिए आतुर हैं। ऐसे देशों में नीदरलैंड, जर्मनी, मलेशिया और इज़राइल शामिल हैं, जो इस दौड़ में आगे रहने के लिए अनुसंधान और विकास में लगातार और भारी भरकम निवेश कर रहे हैं। ऐसे में भारत भी क्यों पीछे रहे। माइक्रोन जैसी कंपनियों को न्यौता, एक ऐसी ही पहल है, जो हमें बढ़त देने में मददगार साबित हो सकती है।
कई अन्य ऐसी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियॉं भी हैं, जो इस क्षेत्र में भारत को एक शानदार इन्वेस्टमेंट डेस्टिनेशन के तौर पर देख रही हैं। इसी के मद्देनजर सरकार ने देश में सेमीकंडक्टर मैनुफैक्चरिंग को प्रोत्साहन देने लिए पीएलआई स्कीम लागू कर रही है। पीएलआई या प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव योजना देश में उत्पादन करने वाली कंपनियों को वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है। पीएलआई का लक्ष्य डोमेस्टिक मैनफैक्चरिंग को बढ़ावा देना और आयात पर देश की निर्भरता को कम करना है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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