Seat Sharing: अखिलेश झुके अब केजरीवाल की बारी
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और सपा की दबाव की रणनीति कामयाब रही। सपा-कांग्रेस में सीट शेयरिंग हो गई है। इसकी वजह यह रही कि भारतीय जनता पार्टी ने जातीय समीकरणों की जोरदार नाकेबंदी की है।
भाजपा की नाकेबंदी के कारण सपा और कांग्रेस को मजबूरी में एक दूसरे की शर्तें माननी पड़ी है। उत्तर प्रदेश की तरह पंजाब और दिल्ली में भी भाजपा की चुनावी रणनीति को देखते हुए कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में नए सिरे से बातचीत शुरू हो गई है। चंडीगढ़ मेयर के चुनाव ने दोनों पार्टियों को फिर से बातचीत के लिए मजबूर किया है।

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने पूरब में अनुप्रिया पटेल के अपना दल, संजय निषाद की निषाद पार्टी और ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी से गठबंधन किया है, तो पश्चिम में जयंत चौधरी के रालोद को अपने साथ ले लिया है। विधानसभा चुनावों में ओम प्रकाश राजभर, जयंत चौधरी, स्वामी प्रसाद मौर्य, पल्लवी पटेल और दलित नेता कमलकांत गौतम समाजवादी पार्टी के साथ थे। जातियों के समीकरण के कारण सपा की सीटें 47 से बढ़कर 111 हो गई थी।

गैर यादव पिछड़ी जातियों और दलितों में आधार वाले ये सभी नेता अब समाजवादी पार्टी का साथ छोड़ चुके हैं। राजभर और जयंत चौधरी भाजपा के साथ आ चुके हैं, स्वामी प्रसाद मौर्य और कमलकांत गौतम सपा का साथ छोड़कर अपनी पार्टी अलग बना रहे हैं। इन चुनावों में समाजवादी पार्टी का एमवाई गठबंधन भी खतरे में है, क्योंकि मुसलमानों का रूख भी कांग्रेस की तरफ है, इसलिए कोई गुंजाईश ही नहीं थी कि सपा अकेले चुनाव लड़ती।
पिछले कई दिनों से ये जो खबरें आ रही थीं कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत टूट गई है, वह पूरी तरह निराधार थी। सामने वाले पर दबाव बनाने के लिए राजनीति में कई बार इस तरह की खबरें राजनीतिक दल खुद चलवाते हैं।
समाजवादी पार्टी इन खबरों से कांग्रेस पर दबाव बना रही थी। खबरों को सच्चा साबित करने के लिए उन्होंने सपा के उम्मीदवारों का एलान भी करना शुरू कर दिया था। सोलह, ग्यारह और पांच उम्मीदवारों की तीन सूचियों में उन्होंने 32 उम्मीदवारों का एलान भी कर दिया। इनमें से कुछ सीटें वे थीं, जिन पर कांग्रेस दावा ठोक रही थी।
कांग्रेस अखिलेश यादव की दबाव की रणनीति के साथ साथ उनकी मजबूरी को भी समझती थी, इसलिए वह भी टस से मस नहीं हुई। इसी कारण अखिलेश यादव खुद झुकते चले गए। कहां पहले उन्होंने 11 सीटों की पेशकश करते हुए कहा था कि इससे ज्यादा सीटें नहीं दे सकते, फिर 15 सीटों पर आए, और आखिर में संख्या बढ़ा कर 17 कर दी।
अखिलेश यादव के राहुल की यात्रा में शामिल न होने के बयान ने दवाब का जोरदार काम किया। कांग्रेस 21 सीटों की मांग से नीचे आ गई है। सत्रह या अठारह सीटों पर समझौता हो जाएगा। अखिलेश यादव ने खुद ही कह दिया है कि अंत भला तो सब भला। अब राहुल गांधी की उत्तर प्रदेश में चल रही यात्रा में अखिलेश यादव का शामिल होना भी लगभग तय है।
इस बीच अंदरखाते बसपा से बातचीत चल रही थी कि वह भी गठबंधन में शामिल हो जाएं। लेकिन मायावती अड़ी हुई हैं, जिस कारण बसपा के लगभग सारे सांसद इधर उधर बिखर रहे हैं। कुछ सांसद कांग्रेस में जा रहे हैं, कुछ सपा में जा रहे हैं, तो कुछ भाजपा में जा रहे हैं। विधानसभा में सिर्फ एक सीट जीतने के बाद से बसपा बिखराव के मुहाने पर है।
अखिलेश यादव की तरह ही अरविन्द केजरीवाल भी कांग्रेस के साथ दबाव की राजनीति खेल रहे हैं। आम आदमी पार्टी की न तो दिल्ली में बातचीत टूटी है, न पंजाब में। जबकि केजरीवाल और भगवंत मान, दोनों ही सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि आम आदमी पार्टी अकेले ही चुनाव लड़ेगी।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को एक सीट देने की पेशकश की है, जबकि कांग्रेस अभी भी चार पर अड़ी हुई है। अंदरुनी खबर यह है कि एक-दो दिनों में ही केजरीवाल तीन सीटों की पेशकश करने जा रहे हैं। चंडीगढ़ के मेयर के चुनाव पर सुप्रीमकोर्ट के फैसले से पंजाब में भी केजरीवाल के अड़ियल रूख में बदलाव आया है।
सुप्रीमकोर्ट ने आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार को जीता हुआ घोषित कर दिया। मेयर पद के चुनाव के लिए समर्थन मांगने केजरीवाल खुद राहुल गांधी के पास गए थे। यह फैसला हो गया था कि मेयर आम आदमी पार्टी का होगा, और डिप्टी मेयर कांग्रेस का होगा।
चंडीगढ़ कॉरपोरेशन में 13 काउंसलर आम आदमी पार्टी के हैं, और 7 कांग्रेस के। दोनों पार्टियों के मिलकर 20 काउंसलर हो गए थे। दूसरी तरफ भाजपा के 14 और अकाली दल का एक काउंसलर है। एक वोट सांसद का होता है, तो भाजपा की सांसद किरन खेर का एक वोट है। लेकिन चुनाव में धांधली करके भाजपा ने मेयर का पद जीत लिया। मामला कोर्ट में पहुंचा और कोर्ट ने रद्द किए गए 8 वोट बहाल कर के आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार को जीता हुआ घोषित कर दिया।
अब यह अलग विषय है कि चुनाव में हेराफेरी की साजिश की रणनीति किस स्तर पर बनी थी। चंडीगढ़ स्तर पर बनी थी, या राष्ट्रीय स्तर पर। कुछ भी हो, भाजपा की बदनामी तो हुई ही है। राहुल गांधी ने कहा है कि हेराफेरी करने वाला रिटर्निंग आफिसर तो सिर्फ मोहरा था, हेराफेरी के पीछे मोदी का हाथ था।
यह अलग विषय है कि आम आदमी पार्टी का मेयर कितने दिन रहेगा, क्योंकि आम आदमी पार्टी के तीन काउंसलर दलबदल करके भाजपा में जा चुके है। आम आदमी पार्टी के मेयर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला कर भाजपा उन्हें कभी भी हटा सकती है।
खैर चंडीगढ़ के मेयर की राजनीति अपनी जगह है, लेकिन सुप्रीमकोर्ट के फैसले ने पंजाब और चंडीगढ़ में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में गठबंधन की नई संभावनाए पैदा की हैं। केजरीवाल और राहुल गांधी के बयान गौर करने लायक हैं।
केजरीवाल ने कहा है कि चंडीगढ़ के चुनाव ने साबित किया है कि मिलकर चुनाव लड़ें, तो भाजपा को हराया जा सकता है। उनकी यही बात पंजाब की तेरह और चंडीगढ़ लोकसभा सीट पर नए सिरे से बातचीत की संभावनाएं खोलती हैं। लेकिन आम आदमी पार्टी से गठबंधन के खिलाफ कांग्रेस में टूट की आशंका भी बढ़ गई है।
पंजाब में कांग्रेस, भाजपा और अकाली दल में भी बहुत कुछ चल रहा है। अकाली दल और भाजपा की बातचीत इस बात पर टूटी है कि भाजपा 13 में से सात सीटें मांग रही थी, जबकि अकाली दल पहले की तरह सिर्फ तीन सीटें गुरदासपुर, होशियारपुर और अमृतसर की ही पेशकश कर रही थी। भाजपा का तर्क है कि विधानसभा चुनावों के बाद उसकी ताकत बढ़ी है। कांग्रेस के दो बड़े नेता अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़ भाजपा में आए हैं, अकाली दल के भी कई नेता भाजपा में आए है, नवजोत सिंह सिद्धू और मनीष तिवारी भी भाजपा में आ सकते हैं।
अगर नवजोत सिंह सिद्धू और मनीष तिवारी भाजपा में आ जाते हैं, तो भाजपा अकाली दल में भी दुबारा बातचीत शुरू हो जाएगी। उधर युवराज सिंह के भी भाजपा में शामिल होने और गुरदासपुर से उम्मीदवार बनने की अटकलें हैं। वैसे गुरदासपुर के लिए भाजपा के पास सुनील जाखड़ सशक्त उम्मीदवार हैं, वह पहले भी वहां से सांसद रह चुके हैं। भाजपा अमृतसर, गुरदासपुर, होशियारपुर, जालन्धर, लुधियाना, आनंदपुर साहिब और पटियाला में चुनाव लड़ने का इरादा रखती है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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