Satyapal Malik: बड़बोले सत्यपाल की असत्य वाणी
जम्मू कश्मीर और गोवा के राज्यपाल रहते हुए सत्यपाल मलिक अपने बड़बोलेपन के लिए मशहूर हो गये थे। उस समय उनके बोलने पर जो लोग मजाक बनाते थे, आज वही उनके कहे को गंभीर मुद्दा मान रहे हैं।

Satyapal Malik: राजनीति में कुछ लोग टूल्स के तौर पर इस्तेमाल होते हैं और कुछ लोग खुद को टूल्स के रूप में पेश कर इस्तेमाल किए जाने की दावत देते हैं। सत्यपाल मलिक दूसरी कैटेगरी में आते हैं। यह अलग बात है कि जो कीमत वे अपने लिए चाहते हैं, वह कोई दल देने को तैयार नहीं है। सपा, रालोद और कांग्रेस के लिए 2024 के आम चुनाव में प्रचार करने की स्वघोषणा के बाद भी कहीं से कोई तव्वजों नहीं मिली तो वे भाजपा और मोदी के खिलाफ मीडिया के टूल्स बनने के लिए तैयार हो गए। उनकी बातों को वही आज सबसे अधिक महत्व दे रहे हैं जो कभी उनके बड़बोलेपन का मजाक उड़ाते थे।
सत्यपाल मलिक जाट नेता रहे हैं, पर अब उनकी जगह वहां बनती नहीं। भाजपा के खिलाफ पश्चिमी उत्तर-प्रदेश में जो भी जाट राजनीति के अगुआ हैं उनको उनकी जरूरत नहीं। क्योंकि रालोद के नेता जयंत चौधरी अब अपनी पगड़ी खुद संभालने में लगे हैं और किसी को भी अपना नेता मानने के लिए तैयार नहीं होंगे। फिर जब यह तथ्य उनके सामने हो कि यही सत्यपाल मलिक 2004 में उनके पिता चौधरी अजित सिंह के खिलाफ भाजपा की ओर से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं तो फिर उनको लेकर उनकी राजनीतिक उबासी समझी जा सकती है। इसलिए मलिक छटपटाहट में है। सो उन्होंने जाट लैंड में अपनी जगह बनाने के लिए मोदी विरोध का रास्ता चुना है।
प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ उनके पास कोई तथ्य नहीं, इसलिए वे भी बहुतों की तरह परसेप्शन बिगाड़ने के खेल में लग गए हैं। एक अंग्रेजी वेबसाइट ने संभवतः मलिक को इंटरव्यू के लिए चुना ही इसलिए कि वे कुछ सनसनीखेज बातें करेंगे। जिस पत्रकार ने बात की, उसकी पहचान ही मोदी के खिलाफ एजेंडा चलाने की है। इंटरव्यू दो बातें मुख्य रूप से सत्यपाल मलिक ने कही और अपनी बातों में खुद को ही उलझा लिया। एक तो पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों पर पाकिस्तान द्वारा हमले कराए जाने को भारत सरकार की चूक बताने पर और दूसरे प्रधानमंत्री पर भ्रष्टाचार के मामले में मूक सहमत होने पर। सत्यपाल मलिक ने साक्षात्कार में यह कहा कि सीआरपीएफ को जवान ले जाने के लिए हवाई जहाज न देना हमारी चूक थी। इंटेलिजेंस का विफल होना भी हमारी कमी थी।
पुलवामा की घटना उनके कश्मीर के राज्यपाल पद पर रहते हुई। राष्ट्रपति शासन के दौरान किसी राज्यपाल के पास वही अधिकार होते हैं जो एक मुख्यमंत्री को होते हैं। जाहिर है जम्मू कश्मीर की पुलिस और लोकल इंटेलिजेंस दोनों उनके हाथ में थी। यदि उनका यह दावा कि 'आरडीएक्स से लदी गाड़ी लेकर आतंकवादी कई दिनों से घूम रहा था' सही है, तो असफलता किसकी थी। स्थानीय पुलिस या स्थानीय खुफिया तंत्र की ओर से चूक हुई तो विफल कौन कहलाएगा? जो उनका नेतृत्व कर रहा होगा। यानी सीधे राज्यपाल सत्यपाल मलिक।
जिस विश्वास और भरोसे से प्रधानमंत्री ने मलिक को कश्मीर में राज्यपाल बनाकर भेजा उस भरोसे को तोड़ा किसने? सत्यपाल मलिक ने। फिर उसी साक्षात्कार में वह कहते हैं कि बिना पाकिस्तान के शामिल हुए स्थानीय स्तर पर उतना विस्फोटक जमा ही नहीं हो सकता, जितना कि सीआरपीएफ काफिले को उड़ाने में किया गया। फिर इसकी जिम्मेदारी सत्यपाल मलिक को ही लेनी चाहिए कि उनके राज्यपाल रहते, शासन प्रशासन के सभी अधिकार संपन्न होने के बावजूद पाकिस्तान से विस्फोटक यहां पहुंच गया।
यह मानते हुए कि आरडीएक्स, पाकिस्तान ने भेजा, यह जानते हुए कि जिस आतंकवादी ने विस्फोट किया उसका सीधा संपर्क पाकिस्तान से था, फिर जहाज देने या ना देने के फैसले पर कयासबाजी लगाकर सत्यपाल मलिक ने केंद्र को कठघरे में क्यों खड़ा किया? उनकी हालिया सोच और उनके खुद के गणित मे शायद यह ठीक बैठता है। उन्होंने यह तय कर लिया है कि अब वह कांग्रेस और सपा के बीच कोई राजनीतिक जमीन तलाश करेंगे और यह तभी संभव है कि इन दोनों पार्टियों के एजेंडे के साथ चल लें। कांग्रेस के राजनीतिक एजेंडे में मोदी की हर उपलब्धि को विवादास्पद बना देना पहले से शामिल है। पुलवामा पर राहुल गांधी से लेकर दिग्विजय सिंह तक वीर जवानों की शहादत पर सवाल खड़े करते रहे हैं। ऐसे में भाजपा और खासकर मोदी को घेरने के लिए एक मोहरा बनने को सत्यपाल मलिक तैयार बैठे हैं।
सत्यपाल मलिक खुद दावा करते हैं कि जब उन्होंने कथित भ्रष्टाचार की जानकारी प्रधानमंत्री को दी तो उन्होंने उनका साथ दिया और उनके फैसले में कोई दखलंदाजी नहीं की। यह प्रधानमंत्री मोदी के भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टोलरेंस की हामी थी। फिर भी सत्यपाल मलिक ने यह जुमला जोड़ दिया कि उनके अनुसार मोदी जी को भ्रष्टाचार से परहेज नहीं है। उनका यह कथ्य भी उसी इको सिस्टम का सहयोग है, जो पिछले कई सालों से मोदी पर तरह तरह के आरोप लगाता रहा है और अदालती परीक्षणों व जन विश्वासों में लगातार विफल भी होता रहा है। सत्यपाल मलिक के बयानों और दावों को कांग्रेस ने भी एक तड़के के रूप में लिया है और एक दिन की सामग्री मानकर उसे मीडिया के सामने परोस दिया है।
सत्यपाल मलिक भारतीय राजनीतिक ग्लोब की पूरी परिक्रमा कर चुके हैं। 1974 में चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय क्रांति दल से विधायक और फिर 1980 में उसी पार्टी से राज्यसभा पहुंचने के बाद 1984 में कांग्रेस की ओर सरक लिए। राजीव गांधी की तरफदारी में उन्हें 1986 में कांग्रस की ओर से राज्यसभा की सीट मिल गई। फिर जब देखा कि कांग्रेस बोफोर्स कांड में फंस रही है तो फौरन पाला बदल लिया। वीपी सिंह के साथ जनता दल में चले गए और अलीगढ़ लोकसभा का चुनाव जीतकर मंत्री भी बन गए। फिर 2004 के चुनाव से पहले वह भाजपा में शामिल हुए और बागपत से चौधरी अजित सिंह के खिलाफ लोकसभा का चुनाव लड़ लिए। हारने के बाद भी भाजपा ने उनका सम्मान किया। बिहार, जम्मू-कश्मीर और मेघालय का राज्यपाल बनाया। मलिक अब फिर से हवा का रूख भांपने में लगे हैं और अपने लिए माहौल बनाने की कवायद कर रहे हैं।
सियासतदान अपनी जानिब नादान नहीं होते। पर बिना सोचे समझे किए जाने वाले कृत्य कई बार देश के लिए महंगे साबित होते हैं। अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षा के लिए देश को दांव पर लगाने वाले किसके हितैषी हो सकते हेैं। यह सत्यपाल मलिक को भी सोचना चाहिए। जिस पुलवामा हमले पर पाकिस्तान पूरी दुनिया की नजर में आतंकवाद परस्त देश के रूप में पहचाना गया, जिसके लिए अमेरिका समेत तमाम बड़े देशों ने आगे आकर भारत की संप्रभुता और सुरक्षा के लिए भारतीय सेना द्वारा की गई कार्रवाई का समर्थन किया। उसी पाकिस्तान ने सत्यपाल मलिक का बयान उद्धृत कर भारत को प्रोपेंगेडा चलाने वाले देश के रूप में पेश करने की चेष्टा की है। खुद को प्रधानमंत्री से भी ज्यादा जानकार, उनसे ज्यादा कर्मठ और ईमानदार होने का सत्यपाल मलिक का स्वांग बड़ी नादानी ही सिद्ध होगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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