Emergency 1975: संजय गांधी नहीं थे आपातकाल के रचनाकार
आपातकाल को लेकर अनेक लोगों ने बहुत कुछ लिखा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी बड़े राजनीतिक संकट का सामना कर रही थीं, क्योंकि चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग के आरोप में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 जून 1975 को लोकसभा सांसद के रूप में उनका निर्वाचन रद्द कर दिया था और छह साल के लिए उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी। इंदिरा गांधी ने तुरंत कांग्रेस कार्यसमिति बुलाई थी, बैठक में उन्हें राय दी गई थी कि हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी जाए। जबकि एक राय यह भी आई थी कि सुप्रीमकोर्ट का फैसला आने तक कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ को प्रधानमंत्री बना दिया जाए, और इंदिरा गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बन जाए। सुप्रीमकोर्ट का फैसला पक्ष में आने पर पदों की फिर से अदला बदली हो जाए।

कहते हैं कि कांग्रेस कार्यसमिति में जब यह बात हो रही थी, तो संजय गांधी अपनी मां को बैठक से बाहर ले गए और उन्हें समझाया कि वह प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफे की गलती न करें, क्योंकि बड़ी मुश्किलों से कांग्रेस सिंडिकेट से छुटकारा मिला है। लेकिन फैसला लेने में अभी समय था, क्योंकि पहले सुप्रीमकोर्ट जाना था। इंदिरा गांधी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने भी उन्हें बड़ी राहत नहीं दी थी। 24 जून के फैसले में सुप्रीमकोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला तो बरकरार रखा, लेकिन सुनवाई पूरी होने तक उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की छूट दे दी थी। इस बीच जयप्रकाश नारायण का आन्दोलन पूरे देश में फैलने लगा था। दिल्ली में लाल किले से इंडिया गेट तक हुई रैली ने वातावरण इंदिरा गांधी के खिलाफ बना दिया था।
तो क्या 24 जून के सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी ने संजय गांधी के कहने पर आपातकाल लगाया था? आमतौर पर यही धारणा है, लेकिन उस समय के बहुत ही सक्रिय पत्रकार बी.के. चम ने 2013 में लिखी अपनी किताब "बिहाइंड क्लोज्ड डोर्स: पॉलिटिक्स ऑफ पंजाब, हरियाणा एंड द इमरजेंसी" में लिखा है कि संजय गांधी ने आपातकाल लगाने की सलाह नहीं दी थी, बल्कि संजय गांधी की सलाह यह थी कि इंदिरा गांधी राष्ट्रपति का पद ग्रहण करके सेना की सुप्रीम कमांडर बन जाएं। उनका सुझाव था कि एक एक साल करके कम से कम पांच साल तक चुनाव टाले जाएं।

बी.के. चम चंडीगढ़ स्थित पत्रकार थे, वह संजय गांधी के निकटम सहयोगी बंसीलाल के काफी निकट माने जाते थे। वह लिखते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले की भनक इंदिरा गांधी को पहले से थी। एक अन्य लेखक ने लिखा है कि इंदिरा गांधी ने हाईकोर्ट का संभावित फैसला बदलवाने की कोशिश भी की थी। इंदिरा गांधी ने संभावित फैसले पर अपने बेटे संजय गांधी और उनके करीबी बंसीलाल से विचार विमर्श शुरू कर दिया था।
इंदिरा गांधी के सामने दो तरह के सुझाव थे। पहला सुझाव तो यही था कि वह राष्ट्रपति बन कर सेनाओं की सुप्रीम कमांडर बन जाएं, मौलिक अधिकारों वाले संविधान और न्यायपालिका को भी निलंबित कर दिया जाए, लेकिन संसद और राज्य विधानसभाओं को जस का तस बरकरार रखा जाए। उनकी सलाह में जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति को हाउस अरेस्ट करना भी शामिल था। इसके अलावा कृषि मंत्री जगजीवन राम, पेट्रोलियम मंत्री केडी मालवीय और विदेश मंत्री वाईबी चव्हान को भी नजरबंद किया जाता, क्योंकि ये सभी इंदिरा गांधी के उतने वफादार नहीं थे।
इंदिरा गांधी को यह भी सुझाव दिया गया था कि कुछ प्रमुख अफसरों को भी गिरफ्तार किया जाए, जिनमें गृह सचिव एनके मुखर्जी और पीएन हक्सर का नाम शामिल था। 1968 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण, 1971 में भारत सोवियत संघ समझौते और बांग्लादेश की मुक्ति योजनाओं में हक्सर का ही दिमाग था। लेकिन इंदिरा गांधी इन सभी सुझावों से बिलकुल सहमत नही थीं, वह उन गुप मीटिंगों में संजय गांधी और बंसीलाल के सुझाव सुनती रहती थीं, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं देती थीं।
लेकिन 12 जून को जब उन्हें छह साल के लिए चुनाव लड़ने से भी अयोग्य ठहरा दिया गया, तो संजय गांधी और बंसीलाल के दबाव में 13 जून को दोपहर बाद ढाई बजे अपनी कुर्सी बचाने के लिए इंदिरा गांधी ने कदम उठाने का फैसला किया। संजय गांधी से कहा गया कि वह इंदिरा गांधी की ओर से लिए जाने फैसलों के समर्थन में वफादार मुख्यमंत्रियों से बयान दिलवाने के लिए बात करें। कुछ मुख्यमंत्रियों को एयरफ़ोर्स के विमान से दिल्ली भी लाया गया, जिनमें मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पी.सी. सेठी भी थे।
बंसीलाल उस समय कश्मीर में थे, उन्हें भी तुरंत वापस लौटने के लिए कहा गया। वह फैसले के अगले दिन 13 जून को सुबह दिल्ली पहुंचे। इंदिरा गांधी ने हालांकि कांग्रेस कार्यसमिति की सलाह पर सुप्रीमकोर्ट जाने का फैसला किया था, लेकिन बंसीलाल और संजय गांधी की योजना पर भी समानांतर काम करना शुरू कर दिया था। अमेरिका और सोवियत संघ का समर्थन हासिल करने की योजना पर भी सलाह मशविरा हुआ।
24 जून के सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद बंसीलाल और संजय गांधी की योजना लागू करने की तयारियां चल रही थीं कि इंदिरा गांधी ने अपने वफादारों के साथ अंतिम सलाह शुरू की। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे और अपने कुछ अन्य वफादारों से सलाह के बाद 25 जून देर शाम इंदिरा गांधी ने संजय गांधी और बंसीलाल की योजना पर अमल करने का फैसला छोड़ दिया। अलबत्ता सिद्धार्थ शंकर रे की सलाह पर आंतरिक आपातकाल लगा कर राजनीतिक विरोधियों को गिरफ्तार करने और आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाने का फैसला किया।
सिद्धार्थ शंकर रे ने खुद आपातकाल लगाने के लिए राष्ट्रपति को भेजे जाने वाली चिठ्ठी ड्राफ्ट की थी। जिसमें आंतरिक आपातकाल लगाए जाने का आधार देश की सुरक्षा को खतरा बताया बताया गया था। इस तरह राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद के दस्तखत होते ही 25 जून की आधी रात को आपातकाल लागू हो गया। जबकि कैबिनेट ने आपातकाल लगाने का फैसला अगले दिन 26 जून को सुबह बुलाई गई बैठक में किया। बी.के. चम लिखते हैं कि आपातकाल लगाए जाने से खुद संजय गांधी आश्चर्यचकित थे। अगर बंसीलाल और संजय गांधी के फार्मूले पर अमल होता तो भारत में लोकतंत्र खत्म हो गया होता, तो देश में तानाशाही लागू हो गई होती।
आपातकाल लगने के बाद रातों रात देश भर में गिरफ्तारियां शुरू हो गईं। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवानी, आदि नेता गिरफ्तार कर लिए गए। नागरिक अधिकार निलंबित हो गए थे, और मीडिया पर सेंसरशिप लगा दी गई। अनेक ऐसे पत्रकारों को गिरफ्तार कर लिया गया, जो जेपी आन्दोलन की खबरों को लिख रहे थे या आन्दोलन के पक्ष में संपादकीय लिख रहे थे।
संपादकों से कहा गया था कि वे सरकारी अधिकारियों को दिखाए बिना कोई खबर या संपादकीय प्रकाशित नहीं करेंगे। अखबार प्रिंट होने से पहले अधिकारी उन्हें पढ़ते थे। कई बार अंतिम समय पर खबर बदलने को कहा जाता था, तो संपादक वहां से खबर को हटवा कर खाली जगह छोड़ देते थे। बाद में उन्हें लगा कि इसे विरोध जताने का हथियार भी बनाया जा सकता है। अखबारों के संपादकों ने अपना संपादकीय कॉलम खाली रखना शुरू कर दिया। अखबारों की इस रणनीति ने भी आपातकाल के खिलाफ जन जागृति बनाने का काम किया।
सभी बड़े विपक्षी नेता जेलों में थे, ऐसे में अकाली दल और आरएसएस ने आपातकाल और संघ के खिलाफ लगाए गए प्रतिबन्ध के खिलाफ देश भर में सत्याग्रह शुरू कर दिया। हालांकि सत्याग्रह की खबरें अखबारों में नहीं छपती थी, लेकिन देश भर की जेलें भर गईं थीं। शाम को जेलों से आपातकाल के खिलाफ लगने वाले नारों को सुनने के लिए लोग जेलों के बाहर जुटने लगे थे। आपातकाल के बावजूद लोगों ने खुद मौन रह कर नारों का समर्थन करते हुए विरोध का नया तरीका सीख लिया था। भीड़ को जेलों के बाहर से हटाना हर जिले में पुलिस के लिए मुसीबत बन गई थी। जबरन नसबंदी करने के माहौल से जनता में तेजी से नाराजगी बढ़ने लगी और अंततः इंदिरा गांधी को आपातकाल हटाना पड़ा और लोकसभा चुनावों की घोषणा करनी पड़ी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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