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Ved Pratap Vaidik: चला गया भारतीय भाषाओं का प्रबल पैरोकार पत्रकार

वेद प्रताप वैदिक अब हमारे बीच नहीं हैं। संभवत: इसी के साथ धोती पहनने वाले पत्रकारों की भी पीढी का भी अंत हो गया। लेकिन भारतीय पत्रकारिता, हिंदी और भारतीय भाषाओं के सम्मान की जब भी बात होगी, वैदिक जी याद आते रहेंगे।

remembering Ved Pratap Vaidik a journalist of strong advocate of Indian languages ​​

Ved Pratap Vaidik: विद्वान, पत्रकार, लेखक और वक्ता वेदप्रताप वैदिक 78 साल की उम्र में मंगलवार को संसार से विदा हो गये। लेकिन अब सवाल यह है कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी वैदिक जी को किस रूप में याद किया जाएगा? एक्टिविस्ट पत्रकार के रूप में, भाषा सत्याग्रही के रूप में, भारतीय भाषाओं के कट्टर हिमायती के रूप में या फिर हद से ज्यादा तेजी दिखाने की प्रवृत्ति वाले शब्दकर्मी के रूप में। अब जबकि उनका नश्वर शरीर भी हमारे बीच नहीं रहा, उनके ये कई सारे रूप याद आ रहे हैं।

हाथी और छह अंधों की कहानी के मुताबिक, वैदिक को लेकर उनके संपर्क में आए लोगों के अपने-अपने सत्य हैं, जो सीधे संपर्क में नहीं आए, उनके लिए वैदिक के दो ही रूप याद आते रहे हैं, एक ऐसे हरफनमौला लेखक के रूप में जिनकी कलम अहर्निश चलती रही और दूसरा भाषा आंदोलनकारी के रूप में।

आर्यसमाजी परिवार में मध्य भारत की सांस्कृतिक राजधानी इंदौर में जन्मे वैदिक की जिंदगी पर साहित्यिक और राजनीतिक संस्कारों का गहरा असर था। आर्यसमाजी परिवारों में हिंदी और भारतीयता को लेकर आग्रही सोच रही है। वैदिक पूरी जिंदगी इस आग्रही सोच से प्रभावित रहे। इस सोच का ही असर रहा कि जब खेलने-खाने की उम्र होती है, तब 13 साल की उम्र में हिंदी को लेकर आंदोलन करते हुए जेल यात्रा कर आए।

उच्च शिक्षा का मौका मिला देश में विख्यात और कुख्यात हो चुके दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में। वहां उनके आर्यसमाजी संस्कारों और हिंदी प्रेम ने नई अंगड़ाई ली। अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में अपना शोध हिंदी में प्रस्तुत कर दिया। यह साल 1966-67 का वक्त था। आज भी भारतीय उच्च शिक्षा और प्रशासन में हिंदी की तुलना में अंग्रेजी का वर्चस्व अधिक है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि करीब साढ़े पांच दशक पहले कैसे हालात रहे होंगे। अंग्रेजी के वर्चस्व वाले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय को हिंदी में लिखी थिसिस कहां मंजूर होती। विश्वविद्यालय ने शोध प्रबंध नकार दिया, लेकिन वैदिक झुके नहीं। हिंदी में ही अपना शोध प्रबंध प्रस्तुत करने को लेकर अड़ गए।

इस मामले ने तूल पकड़ा, क्या राष्ट्रवादी और क्या समाजवादी, हर तरह की धाराओं की प्रमुख हस्तियों ने वैदिक का समर्थन किया। इनमें प्रमुख रहे, डॉ राममनोहर लोहिया, मधु लिमये, आचार्य कृपलानी, गुरू गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, हिरेन मुखर्जी, हेम बरूआ, भागवत झा आजाद, प्रकाशवीर शास्त्री, किशन पटनायक, रामधारी सिंह दिनकर आदि। इस समर्थन के कारण ही वैदिक का शोध पत्र हिंदी में स्वीकार करने के लिए जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय को तैयार होना पड़ा। नियम बदले गए और भारतीय भाषाओं के प्रबल पैरोकार के रूप में वेद प्रताप वैदिक स्थापित हो गए।

वैदिक के पूरे व्यक्तित्व को देखें तो कह सकते हैं कि वे पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में राजनीति के व्यक्ति थे। कहीं न कहीं उनके दिल में उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं दबी हुई थीं। ऐसा लगता था कि राजनीतिक दलों, विशेषकर सत्ताधारी दलों से वे उम्मीद रखते थे। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की जब शुरूआत हुई तो उसमें वे भी शामिल रहे। बाबा रामदेव, अजीत डोभाल और अन्ना हजारे के साथ उनकी भी भूमिका रही। कभी-कभी ऐसा लगता है कि इस आंदोलन के सफल होने के बाद दिल्ली में आई केजरीवाल और केंद्र की मोदी सरकार से उन्हें 'कुछ' उम्मीद थी, जो पूरी नहीं हुई।

जब ये उम्मीदें धाराशायी हुई तो वे इन सरकारों के कटु आलोचक बन गए। कुछ वैसे ही, जैसे आज के दौर में परसेप्शन के आधार पर आलोचनाएं होने लगी हैं। यह उस वैदिक का नया रूप था, जिनकी छवि आंदोलनकारी पत्रकार की रही है।

हिंदुस्तान समाचार के संस्थापक बालेश्वर अग्रवाल के बाद वेदप्रताप वैदिक संभवत: अकेले पत्रकार रहे, जिनका वैश्विक राजनय पर ज्यादा असर रहा। भारतीय राजनेताओं प्रकाशवीर शास्त्री, लोहिया, गोलवलकर, नरसिंह राव, अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुलायम सिंह यादव, मीनू मसानी, राजनारायण, चंद्रशेखर के साथ ही ईरान के शाह पहलवी, अयातुल्ला खुमैनी, अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई, नजीबुल्लाह खान, पाकिस्तान के नेता जुल्फिकार अली भुट्टो और नवाज शरीफ से उनके व्यक्तिगत संपर्क थे। इनसे जुड़े किस्से सुनाते-सुनाते वे कई बार हकीकत और कोरी गप्प की सीमाओं को एकाकार कर देते थे।

लेकिन वैदिक की छवि ऐसे पत्रकार की भी रही, जो वक्त जरूरत पर सरकारों के खिलाफ सड़कों पर भी उतर सकता था। भाषा, विशेषकर हिंदी, को लेकर उनकी आलोचना के दायरे में हर वह नेता होता था, जो हिंदीभाषी होते हुए भी अंग्रेजी को बिला वजह की तवज्जो देता था। भारतीय भाषा अभियान चलाते वक्त वे अक्सर इस बहाने राजनीति पर हमले भी करते थे।

उनकी जिंदगी में कुछ अप्रिय प्रसंग भी आये। जैसे उन्होंने चंद्रप्रभा प्रकाशन के बैनर तले टाइम्स ऑफ इंडिया समूह की पत्रिकाओं धर्मयुग, दिनमान, फेमिना, माधुरी आदि को खरीद लिया था। तब हिंदी समाज ने माना था कि अंग्रेजी को तवज्जो देने वाले टाइम्स समूह के तत्कालीन प्रबंधन के लिए वैदिक जी टूल बन गए और औने-पौने दाम पर धर्मयुग समेत तमाम पत्रिकाएं खरीद लीं। उस समय वैदिक जी ने दावा किया था कि वे इन पत्रिकाओं को उनकी पूरी गरिमा के साथ निकालेंगे, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास की गर्वीली पात्र रहीं ये पत्रिकाएं निकल ही नहीं सकीं तो फिर गौरव और प्रतिष्ठा कहां से हासिल कर पातीं। इसे लेकर वैदिक जी हिंदी पत्रकारिता के सवालों के घेरे में रहे।

वैदिक जी पर सवाल तब भी उठा, जब उन्होंने भारत के मोस्ट वांटेड पाकिस्तानी आतंकी हाफिज सईद से पाकिस्तान के मुरिदके में जाकर इंटरव्यू किया था। हाफिज सईद पर 26 नवंबर 2011 को मुंबई के ताज होटल हमले का आरोप था इसलिए हाफिद सईद से मुलाकात पर उनकी काफी आलोचना हुई थी। शायद उन्होंने सोचा होगा कि हाफिज से बात करके वे पत्रकारिता जगत में स्थापित हो जाएंगे लेकिन इसके कारण उनकी बदनामी अधिक हुई।

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    इस मुलाकात या कथित इंटरव्यू को लेकर शायद वैदिक भूल गए थे कि वे सिर्फ रिपोर्टर नहीं हैं, बल्कि उनकी छवि एक एक्टिविस्ट और बौद्धिक पत्रकार की है, शायद इसीलिए वे सवालों के घेरे में आ गये। इसके बाद उनकी सार्वजनिक छवि पर जो धब्बा लगा तो उनकी मौत तक वह धुल नहीं पाया। इस मुलाकात के बाद उनकी वह छवि मानो सदा के लिए धूमिल हो गयी जिसमें उनका रौब था, भाषा आंदोलनकारी का ताप था और गंभीर शब्दकर्मी का तेज था।

    यह भी पढ़ें: Ved Pratap Vaidik: अब इस वादे को कौन निभाएगा वैदिक जी ?

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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