Ram Mandir Economy: ताजमहल नहीं, अब राम मंदिर देगा बाजार को सहारा
Ram Mandir Economy: एक लंबी अवधि तक मोहब्बत के स्मारक के तौर पर अतिथि कक्ष से लेकर शयनकक्ष तक में शोभायमान होते रहे ताजमहल के स्थान पर अब अयोध्या का राम मंदिर विराजमान होने वाला है। प्रेम पर आस्था की इस सर्जिकल स्ट्राइक की घोषणा कनफेडरेशन आफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने की है।

उनका कहना है कि अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा समारोह के कारण मंदिर से संबंधित उत्पादों की बिक्री से केवल जनवरी माह में 50,000 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार हो सकता है, वहीं अयोध्या के राम मंदिर की प्रतिकृति भारत के प्राय सभी हिंदू घरों में अनिवार्य रूप से स्थापित होगी तथा सदियों से मोहब्बत की निशानी ताजमहल को रिप्लेस कर देगी।
देश के विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित बयान में महासचिव ने कहा है कि राम मंदिर का उत्साह पूरे देश में है और व्यापार जगत इसमें अपने लिए बड़े अवसर देख रहा है। खंडेलवाल के अनुसार 22 जनवरी को अयोध्या धाम में जब राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा होगी तो राम तो आएंगे ही साथ में लक्ष्मी मैया भी आएंगी।
खंडेलवाल को अनुमान है कि अयोध्या धाम में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा से मंदिर से संबंधित उत्पादों की बिक्री से अकेले जनवरी माह में 50,000 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार हो सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा है कि आने वाले समय में सबसे अधिक मांग राम मंदिर की प्रतिकृति की होनी है। उनका यह भी कहना है कि राम मंदिर की प्रतिकृति आने वाले दिनों में पहले से लोगों के घरों में, ड्राइंग रूम में विद्यमान ताजमहल को सदा सदा के लिए बेदखल कर देगी।
कोई भी संस्कृति हजारों वर्ष तक यूं ही जीवित नहीं रहती। उसे सामाजिकता के खाद और अर्थ तंत्र की तरलता से सींचना पड़ता है। भारतीय संस्कृति को यह खाद पानी मिलती रहे इसके लिए भव्य आयोजनों के जरिए सुचिंतित प्रयास लगातार किए जाते रहे हैं। वर्तमान में आगामी 22 जनवरी 2023 को अयोध्या धाम में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के विधिवत प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन प्रस्तावित है। इस कार्यक्रम में देश-विदेश के लाखों लोगों के पहुंचने का अनुमान है। व्यापारी समुदाय का दावा है कि राम के महाआगमन के साथ ही अयोध्या धाम की धरा पर वैभव की देवी महालक्ष्मी की भी गतिविधियां बढ़ जाएगी जिसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ना स्वाभाविक है।
देश-विदेश के बड़े कारोबारी लोगों की नजर भी इस पर है। सभी राज्यों में व्यापारियों ने इस अतिरिक्त व्यापार की मांग को पूरा करने के लिए बहुत पहले से व्यापक तैयारियां शुरू कर दी हैं। कैट के मुताबिक देश के सभी बाजारों में भगवान राम की तस्वीर अंकित विशेष कपड़े, मालाएं, राम मंदिर के मॉडल, भगवान राम के अंग वस्त्र आदि बड़ी मात्रा में उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
कैट के अध्यक्ष बीसी भरतीया की माने तो राम मंदिर के मॉडलों की मांग बहुत ज्यादा है और यह मॉडल हार्ड बोर्ड, पाइनवुड, लकड़ी आदि से अलग-अलग आकारों में बनाए जा रहे हैं। इसके अलावा मिट्टी के दिए, रंगोली के रंग, सजावट के फूल और बाजारों और घरों को रोशन करने के लिए बिजली के सामान का भी बड़ा व्यवसाय तैयार है। कन्फेडरेशन का यह भी कहना है कि व्यापारी घर-घर जाकर राम मंदिर की प्रतिकृति खरीदने और उसे रखने का विशेष रूप से आग्रह कर रहे हैं।
दुनिया के प्रमुख धर्मों के हजार साल का इतिहास देखें तो आखिरी केंद्रीय धार्मिक निर्माण कार्य इस्लाम के ही खाते में दर्ज है। इस्लामी इतिहास में हमें 624 ई का साल मिलता है जब मुसलमानों ने काबे की ओर मुंह करके नमाज पढ़नी शुरू किया। वक्त के साथ इसकी मरम्मत होती गई, जिसे आज हम एक वर्गाकार इमारती ढांचे के रूप में देखते हैं।
ईसाइयों में सबसे पुराना तीर्थ यरूसलम है। रोमन राजाओं के समय में यूरोप में कुछ धार्मिक इमारतें बनी, उसके बाद इंग्लैंड का कैंटरबरी बाकायदा चर्चों का शहर बनकर तैयार हुआ। दुनिया के एकमात्र धर्मराज्य वेटिकन सिटी का स्वतंत्र अस्तित्व 20वीं सदी की चीज है, जिसे 1929 में इटली से अलग करके बनाया गया। इसके बाद भी दुनिया में छिटपुट धार्मिक निर्माण कार्य जारी रहे, लेकिन ऐसा कोई धार्मिक स्थल नहीं बना जिसे उस धर्म की अस्मिता से जोड़ा गया हो।
कह सकते हैं कि इतिहास में आज हम उस जगह खड़े हैं जहां काफी अरसे बाद वृहद हिंदू अस्मिता से जुड़ा कोई निर्माण कार्य हो रहा है। राम हिंदुओं की कुछ इस तरह की वृहद धार्मिक अस्मिता से जुड़े हैं जो मात्र तीन-चार दशकों में ही न सिर्फ शैव और शाक्त बल्कि कृष्ण भक्ति से ओतप्रोत वैष्णव परंपरा को भी पीछे छोड़ते हुए हिंदू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में उभरे हैं। दक्षिणी भारत के साथ-साथ बंगाल और पहाड़ तक में राम को लेकर अब बराबर सम्मान दिखाई देने लगा है।
पिछले इन्हीं कुछ वर्षों में राम कुछ बदले बदले भी दिख रहे हैं। सीता के बिना वह कुछ-कुछ अकेले भी हो गए हैं। जो राम इस समय धार्मिक समरसता के केंद्र में है उनके स्वरूप में क्रोध का स्थान प्रमुख हो गया है। यह बात गली बाजार में बिक रही तस्वीरों और बड़ी-बड़ी गाड़ियों के पीछे लगे स्टीकरों से भी प्रमाणित होती है।
बाजार के संतुलनकारों का मानना है कि राम के अयोध्या धाम में लक्ष्मी की बारिश होगी। लक्ष्मी धन-धान्य की देवी है। उद्योग, बाजार, सोने चांदी और पैसे की देवी हैं। लक्ष्मी का मतलब श्रम है, उद्योग है, कृषि है, उत्पादन है, सेवा क्षेत्र है, और इन सब का बाजार है। उत्पादन, बाजार और उपभोग यह तीन क्रियाएं मनुष्य की आदि क्रियाएं हैं, और लक्ष्मी मैया इन्हीं प्रक्रियाओं में बिराजती हैं। उक्त तीनों में बाजार सबसे निर्णायक है वही उत्पादन और उपभोग को अनुशासित करता है।
यही बाजार अब प्रेम के साम्राज्य को ललकारते हुए आस्था की चुनौती दे रहा है। सब जानते हैं कि आस्था का जन्म ही विश्वास के आधार पर होता है, और विश्वास प्रेम से पैदा होता है। जब तक हमारे मन में किसी के लिए प्रेम ना हो तो उसके प्रति आस्था हो ही नहीं सकती।
ऐसे में आस्था और प्रेम को अलग-अलग समझना अधूरे ज्ञान का परिणाम है। वस्तुतः यह दोनों विश्वास के धागे से जुड़े होते हैं। बहरहाल सनातन धर्म में राम की अपरिहार्यता का सवाल 'जहां है जैसे है' के आधार पर छोड़ते हुए 22 जनवरी को प्रेम पर आस्था के विजय का शुभ मुहूर्त तय हो गया है। व्यापारी अपना अपना लाभ देख रहे हैं। वे व्यापारी चाहे प्रतिकृति के हो अथवा अयोध्या धाम में राम मंदिर के। दरअसल इस सवाल में ही कलयुग के राम के साथ-साथ अयोध्या धाम का भी भविष्य छुपा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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