Ram Janmbhumi Movement: रामजन्मभूमि अयोध्या में 495 सालों के संघर्ष और साधना की संक्षिप्त कथा

1528 से 2023 के बीच कुल 495 सालों का अंतराल है। 495 सालों का यह अंतराल अयोध्या के लिए अंतहीन प्रतीक्षा का समय था, जिसका अब अंत हो गया है। आज रामलला के नवनिर्मित मंदिर में उनकी प्राण प्रतिष्ठा के साथ 495 सालों के संघर्ष, साधना और करोड़ों लोगों की मनोकामना की पूर्ति हो गयी है।

लेकिन इस मनोकामना की पूर्ति के लिए पीढी दर पीढी उस स्थान के लिए संघर्ष कभी रुका नहीं जहां आज राम मंदिर में उनकी पुनरस्थापना हुई है। वैसे तो अयोध्या के दो अर्थ हो सकते हैं। या तो यह कि जिससे युद्ध न किया जा सके या फिर यह कि जिसने युद्ध की मानसिकता को ही जीत लिया हो। आज के समय में दूसरा अर्थ ही अधिक प्रासंगिक है। अयोध्या युद्ध की बजाय शांति और सह अस्तित्व का ही संदेश देती है।

Ram Janmbhumi Movement: A brief story of 495 years of struggle and meditation in Ram Janmbhumi Ayodhya

लेकिन इक्ष्वाकु वंश की राजधानी रही अयोध्या में जहां भगीरथ, हरिश्चन्द्र, सगर, रघु, अज, दशरथ और स्वयं राम ने राज किया हो उस अयोध्या से मीर बकी नामक एक मुगल सेनापति ने युद्ध भी किया और राम के जन्मस्थान का निशान ही मिटा दिया। हालांकि इतिहास के कुछ जानकार यह कहते हैं कि मीर बकी ने नहीं बल्कि औरंगजेब ने वहां तीन गुंबदों वाली मस्जिद बनाई थी। लेकिन वो भी इस बात से इंकार नहीं करते कि बाबर के समय में ही वहां रामकोट में खंडहर निर्मित हो गया था। यानी प्रत्यक्ष रूप से बाबर के सेनापति ने वहां भले ही तीन गुंबदों वाली मस्जिद न तामीर करवाई हो लेकिन मंदिर गिरवाने का काम तो उसी के समय में ही हुआ था।

इसका एक सामाजिक प्रमाण है स्थानीय सूर्यवंशी ठाकुरों द्वारा उसी समय मीर बकी से किया गया युद्ध। अयोध्या और बस्ती के करीब 120 गांवों के सूर्यवंशी ठाकुरों ने करीब पांच सौ साल बाद पगड़ी पहनी और पैरों में जूते डाले। यह त्याग उन्होंने इसलिए किया था क्योंकि जब मीर बकी वहां रामकोट स्थित मंदिर ढहाने पहुंचा तो ठाकुर गजराज सिंह के नेतृत्व में 90 हजार सूर्यवंशी ठाकुरों ने उससे युद्ध किया। कहते हैं कि इस भीषण युद्ध में 80 हजार क्षत्रिय राम के लिए बलिदान हो गये फिर भी उन्हें हार और अपमान का मुंह देखना पड़ा।

रामकोट या रामजन्मस्थान के लिए यह पहला संघर्ष था जो इतिहास में हो न हो, सामाजिक इतिहास में पूरी तरह से पीढी दर पीढी मौजूद रहा। इसीलिए उन क्षत्रियों के वंशजों ने तब तक पगड़ी और पनही (जूते) धारण न करने का संकल्प लिया जब तक उसी स्थान पर दोबारा राम मंदिर नहीं बन जाता। अब जाकर उनका संकल्प पूरा हो गया है। उस समाज के लोगों ने पगड़ी धारण कर ली है। इस तरह अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के ये सूर्यवंशी क्षत्रिय और ठाकुर गजराज सिंह पहले ऐसे सिपाही थे जिन्होंने अपना बलिदान दिया।

जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह ने भी रामकोट की मुक्ति का प्रयास किया था। 1717 में उन्होंने वह जगह मुगलों से खरीद ली और वहां राम चबूतरे का निर्मण करवाया था। मुगलों के समय में हिन्दुओं को सरयू में स्नान करने तक पर रोक लगा दी गई थी, लेकिन महाराजा सवाई जयसिंह ने मुगलों को पैसा देकर सरयू में स्नान का अधिकार भी खरीद लिया था।

आगे बढते हैं तो बैरागी साधुओं और निंहग सिखों का भी उल्लेख आता है जिन्होंने अयोध्या में रामकोट को दोबारा अपने हाथ में लेने का प्रयास किया। वैष्णव बैरागी साधु तो उस दिन से ही विरोध में थे जिस दिन रामकोट स्थित मंदिर को ढहाया गया था। उन्होंने लड़ाई भी लड़ी लेकिन जीत नहीं पाये। बाद के दशकों में भी अगर कोई मुसलमान वहां नमाज पढने जाता था तो उसे वहां से भगा देते थे। 1858 में 25 निहंग सिखों ने बाबा फकीर सिंह की अगुवाई में वहां धावा बोल दिया और रामकोट स्थित राम जन्मस्थान को मुक्त कराने का प्रयास किया था।

जो वैष्णव बैरागी पहले दिन से रामकोट स्थित मंदिर को गिराने के बाद उस जगह को दोबारा से अपने अधिपत्य में लेने का प्रयास कर रहे थे उन्हीं बैरागी साधु परंपरा के बाबा अभिरामदास ने 1949 में इतिहास रच दिया। बाबा अभिरामदास रामलला की एक अष्टधातु की मूर्ति अपने पास रखते थे। वो हमेशा रामलला की उस मूर्ति को अपने सिर पर रखकर चलते थे और उनके साथी परमहंस रामचंद्रदास उनके साथ राम नाम संकीर्तन करते हुए चलते थे। उस समय तक मस्जिद के बाहर रामचबूतरा पर ही पूजा पाठ होता था। बाबा अभिरामदास की योजना अनुसार महंत दिग्विजयनाथ की मदद से 22-23 दिसंबर 1949 की रात वही अष्टधातु की मूर्ति मस्जिद के अंदर स्थापित कर दी गई जो वो अपने सिर पर लेकर चलते थे।

अगले दिन जैसे ही ये बात प्रशासन तक पहुंची तो हड़कंप मच गया। उस समय फैजाबाद के डीएम थे केके नायर। केन्द्र की नेहरु सरकार की ओर से राज्य की गोविन्द वल्लभ पंत सरकार पर दबाव पड़ा कि डीएम केके नायर को आदेश देकर मूर्ति को बाहर करवा दिया जाए। आदेश केके नायर तक पहुंचा तो उन्होंने इस आदेश को मानने में असमर्थता जता दी। उनका कहना था कि ऐसा करने पर अयोध्या की स्थिति बेकाबू हो जाएगी। उन्होंने मुख्यमंत्री पंत से निवेदन किया कि अगर आप चाहें तो उन्हें हटाकर किसी नये जिलाधिकारी को नियुक्त कर सकते हैं। लेकिन वो मस्जिद के अंदर से रामलला की मूर्ति को बाहर नहीं निकालेंगे।

गोविन्द बल्लभ पंत ने न तो केके नायर को हटाया और न ही नया डीएम नियुक्त हुआ। इसके लिए उन्हें जवाहरलाल नेहरु का कोपभाजन भी बनना पड़ा लेकिन गोविन्द बल्लभ पंत ने वैसा नहीं किया जैसा नेहरु चाहते थे। हालांकि बाद में उस मस्जिद की सुरक्षा बढा दी गयी और पुजारी के अलावा बाकी को अंदर जाने से रोक दिया गया।

यह ताला खुला 1 फरवरी 1986 को जब जिला जज केएम पांडेय ने एक वकील उमेश चंद्र पांडेय की याचिका पर सुनवाई करते हुए ताला खोलने का आदेश दिया। जिला जज ने माना कि वहां ताला लगाने का कोई लिखित प्रशासनिक आदेश नहीं है। ऐसे में ताला लगाकर रखने का कोई औचित्य नहीं है।

दूसरी ओर केन्द्र की राजीव गांधी सरकार और राज्य की वीर बहादुर सिंह सरकार की ओर से भी अदालत में कोई हलफनामा देकर विरोध नहीं किया गया। दोनों ही सरकारें कांग्रेस की थीं और ऐसा समझा जाता है कि परोक्ष रूप से राजीव गांधी ने अदालत के फैसले का सम्मान करने की बात कही थी। उस समय इस पूरे मामले को कांग्रेस की ओर से अरुण नेहरू देख रहे थे।

इसलिए अक्सर कांग्रेस की ओर से यह दावा किया जाता है कि राजीव गांधी सरकार ने रामलला का ताला खुलवाया था। इस तरह 1 फरवरी 1986 की शाम 4 बजे ताला खोलने का आदेश हुआ और 40 मिनट बाद ही ताले में बंद रामलला मुक्त हो गये। ताला खुला नहीं बल्कि प्रशासन की मौजूदगी में तोड़ दिया गया। इस मुक्ति के साथ ही विश्वहिन्दू परिषद का प्रवेश भी अयोध्या में होता है क्योंकि उसी दिन विश्व हिन्दू परिषद अपनी रथयात्रा लेकर अयोध्या पहुंचा था।

यहां से विश्व हिन्दू परिषद और संघ परिवार राम मंदिर आंदोलन के केन्द्र में आ गया। विहिप के नेता अशोक सिंहल, बजरंग दल के विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा, आचार्य धर्मेन्द्र, उमा भारती ये ऐसे प्रमुख नाम थे जो उस दौर में अयोध्या आंदोलन की पहचान थे। इस आंदोलन को वही परमहंस रामचंद्रदास भी पूरा नेतृत्व दे रहे थे जो बाबा अभिरामदास के साथ सरयू में स्नान के बाद रामलला को सिर पर रखकर अयोध्या में घूमा करते थे।

विश्व हिन्दू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के संयुक्त आंदोलन के कारण 6 दिसंबर 1992 को वह विवादित ढांचा आखिरकार गिर गया। रामभक्त कारसेवकों की अपार भीड़ ने मात्र तीन घण्टे के अंदर तीनों गुंबदों को जमीन पर पटक दिया और वहां अस्थायी रूप से रामलला का एक टेन्टवाला मंदिर भी निर्मित कर दिया।

यहां कोठारी बंधुओं का बलिदान भी अविस्मरणीय है जिन्होंने 30 अक्टूबर 1990 को विवादित मस्जिद पर भगवा ध्वज फहरा दिया था। इससे मुलायम सिंह सरकार इतनी खफा हुई कि दोनों भाइयों को अयोध्या में उस घर से निकालकर 2 नवंबर को बीच सड़क पर पुलिस द्वारा गोली मार दी गयी जहां वो छिपे हुए थे। रामकुमार कोठारी और शरद कोठारी जो क्रमश: 23 और 20 साल के थे, उनकी इस तरह पुलिस द्वारा निर्मम हत्या से पूरा देश हिल गया था।

लेकिन ये वो नाम हैं जो अयोध्या आंदोलन के प्रमुख नाम हैं जिन्हें आज तब अवश्य याद करना चाहिए जब 500 सालों का संघर्ष पुर्णाहूति की ओर पहुंच गया है। लेकिन राम के लिए अपने योगदान की आहुति देने वाले लाखों-करोड़ों अनाम लोग भी हैं। आज के दिन उन सभी जीवित या दिवंगत आत्माओं को संतोष मिल रहा होगा।

जिन बड़े राजनीतिक लोगों ने इस मामले को हल करने की पहल की उनमें प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी और चंद्रशेखर का नाम अहम है। इन दोनों ने अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल में वहां राम मंदिर बनाने के लिए दोनों पक्षों को सहमत करने का प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हो पाये।

पीवी नरसिंहराव पर भी यह आरोप लगा कि 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में जो कुछ हुआ वह उन्होंने होने दिया। दोपहर 12 बजे से शाम चार बजे तक जब अयोध्या में मस्जिद टूट रही थी तब वो अपने ही आवास में एकांत में थे। उस दौरान उनसे कोई संपर्क नहीं कर पाया। उसके पहले कांग्रेस के माखनलाल फोतेदार जैसे नेताओं का दबाव बना था कि बाबरी मस्जिद को किसी भी कीमत पर बचाना होगा भले ही कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त करना पड़े लेकिन बहुत कम बोलनेवाले नरसिंहराव उस सलाह पर मौन रह गये।

इसके अलावा बाल ठाकरे एक और ऐसे राजनेता थे जो कभी अयोध्या तो नहीं गये लेकिन जब विवादित मस्जिद गिरी तो सबसे पहले इसका श्रेय उन्होने अपने शिवसैनिकों को देने में संकोच नहीं किया। कल्याण सिंह तो कह ही चुके थे कि 6 दिसंबर को चाहे जो हो जाए वो कारसेवकों पर गोली नहीं चलवायेंगे। उन्होंने ऐसा ही किया। उस समय भाजपा के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी थे और वो भी राम मंदिर के प्रबल और मुखर समर्थन से कभी पीछे नहीं हटते थे।

हां, लालकृष्ण आडवाणी जिनकी 1990 में निकाली गयी रथयात्रा से यह आंदोलन जन जन के मन की भावना बन गया, वो 6 दिसंबर को एक बात कहकर अयोध्या आंदोलन के इतिहास से लगभग अप्रासंगिक हो गये कि "यह उनके जीवन का सबसे दुखभरा दिन था।" वो रथयात्रा तो लेकर निकले लोगों की भावना जगाने के लिए लेकिन यह जागृत भावना राजनीतिक वोट तक रहेगी या मंदिर निर्माण तक जाएगी, इसे आडवाणी जी कभी स्पष्ट नहीं कर पाये। परमहंस रामचंद्रदास ने मृत्यु से कुछ दिन पहले बहुत बिलखते हुए कहा था कि अटल जी मंदिर बनवाना चाहते थे लेकिन आडवाणी ने अड़ंगा लगा दिया।

खैर लंबी धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी लड़ाई के बाद अब जब रामकोट में लगभग पांच सौ साल बाद दोबारा मंदिर बन गया है तब एएसआई के आर्कियोलॉजिस्ट बीबी लाल का योगदान भी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने 1966-67 में ही विवादित मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष खोज निकाले थे। उन्हीं के साथ रहे केके मोहम्मद ने भी बहुत साहस के साथ इस बात को स्वीकार किया और खुलकर आज भी कहते हैं कि वहां मंदिर ही था और कुछ नहीं। यह बात मुस्लिम पक्ष पहले ही स्वीकार करके वह स्थान हिन्दुओं को दे देता तो इतना विवाद ही नहीं होता।

आखिर में पांच वो जज जिन्होंने सर्वसम्मति से दिये फैसले में अयोध्या के ऐतिहासिक रामकोट को रामलला विराजमान को सौंप दिया था। इनमें मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, शरद बोबड़े, डीवाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नजीर शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसा संभवत: पहली बार हुआ कि अलग अलग जजों ने अपना निर्णय सुनाने की बजाय एकमत से अपना निर्णय दिया और विवादित परिसर को रामलला विराजमान को सौंप दिया।

योगी आदित्यनाथ और नरेन्द्र मोदी का नाम लिये बिना 500 साल के इस इतिहास का यह अध्याय अधूरा ही रहेगा। अजय सिंह बिष्ट जो अयोध्या आंदोलन में ही हिस्सा लेने आये थे और गोरखमठ के योगी आदित्यनाथ बन गये। 2017 में मुख्यमंत्री बनते ही उनकी पहली प्राथमिकता अयोध्या बनी।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जो स्वंय अयोध्या आंदोलन के बहुत करीब से साक्षी रहे हैं, उन्होंने भी 2017-18 में अपने स्तर पर श्री श्री रविशंकर को आगे करके कोई सर्वसम्मत हल निकालने का प्रयास किया था। वह प्रयास भले ही असफल हो गया हो लेकिन यह उनके जीवन का सौभाग्य है कि रामलला की प्राण प्रतिष्ठा बतौर प्रधानमंत्री अयोध्या में करके इस 500 साल के विवादित और संघर्षपूर्ण इतिहास की पुर्णाहुति कर दी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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