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Rajya Sabha Candidates: विचारधारा नहीं सत्ता ही लक्ष्य है अब नेताओं का

Rajya Sabha Candidates: सत्ता के लिए कांग्रेस पार्टी के नेता किस तरह लालायित रहते हैं, उसका ताजा उदाहरण महाराष्ट्र से मिलता है|

जहां 50 साल से ज्यादा समय से कांग्रेस से जुड़े रहे तीन बड़े नेता सत्ता के लालच में कांग्रेस छोड़कर भाजपा, एनसीपी या शिवसेना सेना में चले गए और वहां से अपनी राज्यसभा सीटें सुनिश्चित कर लीं|

Rajya Sabha Candidates

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और पूर्व सांसद मिलिंद देवड़ा का कांग्रेस से 50 साल से भी पुराना रिश्ता था| मिलिंद देवड़ा के पिता मुरली देवड़ा यूपीए सरकार में केन्द्रीय मंत्री हुआ करते थे, मिलिंद देवड़ा खुद भी कांग्रेस के सांसद रहे थे| अशोक चव्हाण महाराष्ट्र के कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे, उनके पिता एस.बी. चह्वाण भी मुख्यमंत्री रहे थे|

इन दोनों जन्मजात कांग्रेसी नेताओं ने राज्यसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस पार्टी छोडी, अशोक चह्वाण भाजपा से और मिलिंद देवड़ा शिवसेना से राज्यसभा का टिकट पा गए| तीसरे नेता बाबा सिद्दीकी अजीत पवार की एनसीपी में शामिल हुए हैं। उन्हें अभी इन्तजार करना पड़ेगा क्योंकि एनसीपी राज्यसभा की एक ही सीट जीत सकती है।

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हालांकि प्रफुल्ल पटेल की मौजूदा राज्यसभा की अवधि 2028 तक थी, लेकिन शरद पवार ने उनको डिसक्वालीफाई करने की याचिका लगा रखी है, इसलिए उन्होंने इस्तीफा देकर एनसीपी कोटे की सीट से पर्चा दाखिल कर दिया| अब प्रफुल्ल पटेल की खाली की हुई सीट पर बाद में उपचुनाव होगा| चव्हाण, देवड़ा और पटेल तीनों ही मूल रूप से कांग्रेसी हैं, जो राज्यसभा में एनडीए सांसद होंगे| तीनों पचास साल से भी ज्यादा समय से कांग्रेस विचारधारा से जुड़े थे और भाजपा के साथ विचारधारा की लड़ाई मानते थे|

राज्यसभा की 56 सीटों पर द्विवार्षिक चुनाव हो रहा है| जिसमें महाराष्ट्र की छह सीट हैं| तीन भाजपा को मिलेंगी, भाजपा ने एक दिन पहले कांग्रेस से आए चह्वाण के अलावा 2019 में टिकट काटे जाने से नाराज चल रही पुणे की पूर्व विधायक मेधा कुलकर्णी और पार्टी कार्यकर्ता अजीत गोपछड़े को उम्मीदवार बनाया है|

भाजपा ने अपने वरिष्ठ नेताओं पंकजा मुंडे, विनोद तावड़े और विजया राहटकर को निराश किया| एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने मिलिंद देवड़ा और एनसीपी ने प्रफुल्ल पटेल को उम्मीदवार बनाया है| छटी सीट पर कांग्रेस ने पूर्व मंत्री चंद्रकांत हंडोरे को उम्मीदवार बनाया है|

पहले चर्चा थी कि कांग्रेस कन्हैया कुमार को उम्मीदवार बना रही है, अगर ऐसा होता तो कांग्रेस को छटी सीट पर पटखनी देने के लिए भाजपा की रणनीति अपना चौथा उम्मीदवार उतारने की थी, क्योंकि चह्वाण के साथ कांग्रेस के 13 विधायक और मिलिंद देवड़ा के साथ भी कुछ विधायक बताए जा रहे थे| लेकिन कांग्रेस ने अपने दलित नेता चंद्रकांत हंडोरे को उम्मीदवार बनाकर भाजपा को दुविधा में डाल दिया, क्योंकि अगर कांग्रेस का दलित उम्मीदवार हार जाता, तो लोकसभा चुनावों में भाजपा को मुश्किल होती|

भाजपा ने कांग्रेस से ही आए शिवसेना के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे को इस बार राज्यसभा टिकट नहीं दिया| नारायण राणे 1999 में शिवसेना के मुख्यमंत्री थे| वह शिवसेना छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए, केंद्र की यूपीए सरकार में मंत्री रहे, फिर केंद्र में भाजपा की सरकार आई तो भाजपा में शामिल होकर पहले राज्यसभा के सदस्य बन गए, फिर मोदी सरकार में केन्द्रीय मंत्री|

भाजपा के लिए महत्वपूर्ण यह है कि किसी तरह राज्यसभा में बहुमत हासिल करे, पिछले दस साल सत्ता में रहने के बावजूद वह राज्यसभा में बहुमत हासिल नहीं कर पाई है| फर्क सिर्फ इतना आया है कि दस साल पहले कांग्रेस की सीटें सौ से ज्यादा थी, और भाजपा एक बार सौ के आंकड़े को छूकर अब वापस 94 सीटों पर है, जबकि कांग्रेस खिसक कर 30 पर आ चुकी है|

अभी 15 राज्यों की 56 सीटों पर चुनाव हो रहा है, उत्तर प्रदेश की दस, महाराष्ट्र की छह, बिहार की छह, पश्चिम बंगाल की पांच, कर्नाटक और गुजरात की चार चार, उड़ीसा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, राजस्थान की तीन तीन, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़ की एक एक| इसके अलावा बाद में इसी साल 13 अन्य सीटों पर भी चुनाव होना है|

भाजपा ने राज्यसभा का कार्यकाल पूरा कर रहे 28 सांसदों में से सिर्फ 4 को दुबारा टिकट दिया है। इन 28 में से ज्यादातर भाजपा की मूल विचारधारा से थे| जिन सात मंत्रियों को टिकट नहीं दिया गया उनमें मनसुख मांडवीया, पुरषोतम रुपाला, धर्मेन्द्र प्रधान, भूपेन्द्र यादव और मुरलीधरन भाजपा की मूल विचारधारा और पृष्ठभूमि के थे, जबकि राजीव चन्द्रशेखर और नारायण राणे प्रवासी पंछी हैं|

कर्नाटक, हिमाचल और उत्तर प्रदेश में भाजपा ने एक एक उम्मीदवार एक्स्ट्रा खड़ा कर दिया है| इन तीनों ही राज्यों में खड़े किए गए एक्स्ट्रा उम्मीदवार भाजपा पृष्ठभूमि के नहीं हैं| हिमाचल में खड़े किए गए हर्ष महाजन भी मिलिंद देवड़ा और अशोक चव्हाण की तरह कई दशकों से कांग्रेस परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता और वह खुद भी कांग्रेस सरकारों में मंत्री रहे हैं। दो साल पहले 2022 में वह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे|

इसी तरह उत्तरप्रदेश में आठवें उम्मीदवार के तौर पर खड़े किए गए संजय सेठ पुराने समाजवादी हैं। वह लखनऊ के बिल्डर और अखिलेश यादव के करीबी थे, और अभी हाल ही में समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे| जहां तक कर्नाटक का सवाल है, तो वहां पांचवे उम्मीदवार के तौर पर उतारे गए कूपेंद्र रेड्डी जेडीएस के उम्मीदवार हैं, जिनको भाजपा अपने अतिरिक्त वोट देगी|

यानी भाजपा ने राज्यसभा में बहुमत हासिल करने के लिए उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में वोटिंग करवाना तय कर दिया है| अगर एनडीए के तीनों उम्मीदवार जीत जाते हैं, तो एक सीट का नुकसान समाजवादी पार्टी को और दो सीट का नुकसान कांग्रेस को होगा|

यहाँ दिलचस्प यह है कि तीनों ही राज्यों में एनडीए ने इंडी एलायंस के बाहरी उम्मीदवारों के सामने स्थानीय उम्मीदवार उतारे हैं| जिससे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में भगदड़ मच गई है| इन तीनों राज्यों में स्थानीय उम्मीदवारों को जिताने के लिए क्रॉस वोटिंग हो सकती है| कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकारे हैं|

कर्नाटक में कांग्रेस ने दो लोकल उम्मीदवारों के अलावा दिल्ली के अजय माकन को तीसरा उम्मीदवार बनाया है| उनके बाहरी होने के कारण और जेडीएस के कुपेंद्र रेड्डी के लोकल होने के कारण क्रास वोटिंग की संभावना बढ़ गई है| जातीय राजनीति भी काम करेगी| इसी तरह हिमाचल में भी कांग्रेस ने राजस्थान मूल के अभिषेक मनु सिंघवी को चुनाव मैदान में उतार दिया है| सोनिया गांधी अगर राजस्थान की बजाए खुद हिमाचल प्रदेश से राज्यसभा से चुनाव लड़ती, और अभिषेक मनु सिंघवी को राजस्थान से राज्यसभा में लाया जाता, तो ऐसी स्थिति पैदा नहीं होती|

भाजपा ने अभिषेक मनु सिंघवी के सामने कांग्रेस के पुराने नेता हर्ष महाजन को चुनाव में उतार कांग्रेस कैंप में खलबली मचा दी है| हर्ष महाजन दिवंगत कांग्रेस नेता और सात बार मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह के करीबी लोगों में से एक हैं| हिमाचल प्रदेश में सुखविंदर सिंह सुख्खू को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद से कांग्रेस विधायक दल में असंतोष है। कहा जा रहा है कि वीरभद्र सिंह कैंप के कम से कम एक दर्जन विधायक क्रास वोटिंग कर सकते हैं|

वीरभद्र सिंह की पत्नी, प्रतिभा सिंह जो अभी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और मंडी से सांसद हैं, वह मुख्यमंत्री पद की प्रबल दावेदार थी| अगर उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता, तो कहा जा रहा था कि वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह को उप मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, लेकिन कांग्रेस ने प्रतिभा सिंह की जगह सुखविंदर सुख्खू को मुख्यमंत्री बना दिया और विक्रमादित्य सिंह को उप मुख्यमंत्री भी नहीं बनाया| जिससे वीरभद्र सिंह के समर्थक कम से कम एक दर्जन विधायक बेहद नाराज हैं|

विक्रमादित्य सिंह रामलला के मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में गए थे, इतना ही नहीं उन्होंने न्योते के लिए आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद का आभार भी जताया था| जबकि कांग्रेस ने यह कह कर बायकाट किया था कि कार्यक्रम को आरएसएस और भाजपा का कार्यक्रम बना दिया गया है| वीरभद्र सिंह समर्थक विधायक क्रास वोटिंग करके भाजपा के उम्मीदवार को जीता सकते हैं| अगर ऐसा होता है, तो हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार पर ही खतरे के बादल मंडराने लगेंगे|

लेकिन सबसे ज्यादा दिलचस्प मुकाबला उत्तर प्रदेश में हो गया है| कायदे से भाजपा सात और समाजवादी पार्टी राज्यसभा की तीन सीटें जीतने की स्थिति में है| भाजपा को पहली प्रिफरेंस में ही सात सीटें जीतने के लिए 259 विधायक चाहिए, लेकिन भाजपा के पास अपने सहयोगियों के साथ 288 विधायक हैं| यानी भाजपा गठबंधन के पास 29 विधायक ज्यादा है|

भाजपा को आठवीं सीट जीतने के लिए आठ विधायक और चाहिए| भाजपा ने समाजवादी पार्टी के करीब रहे संजय सेठ को आठवें उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतार दिया है| इसलिए यूपी ने समाजवादी पार्टी के तीन उम्मीदवारों में से एक के हारने की आशंका पैदा हो गई है| वह या तो जया बच्चन हो सकती है, या पूर्व आईएएस आलोक रंजन| इन दोनों को उम्मीदवार बनाए जाने से सपा विधायकों में नाराजगी है|

जया बच्चन बाहरी भी हैं, उनका सपा में कोई उपयोग भी नहीं है और उन्हें पांचवीं बार टिकट दिया गया है| जया बच्चन और आलोक रंजन दोनों ही अखिलेश यादव के पीडीए यानी पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक फार्मूले में भी फिट नहीं बैठते| सिर्फ रामजी लाल सुमन एकमात्र दलित समुदाय के उम्मीदवार हैं, जो पीडीए के फार्मूले में फिट बैठते हैं| इसलिए समाजवादी पार्टी में भारी आक्रोश है|

कुर्मी समाज से आने वाली पल्लवी पटेल ने जया बच्चन और आलोक रंजन को उम्मीदवार बनाने का सार्वजनिक विरोध किया है| जबकि दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने जातीय समीकरण बनाने के लिए चार ओबीसी, एक ब्राह्मण, एक जाट और एक राजपूत को टिकट दिया है| जातीय राजनीति वाले उत्तर प्रदेश में भाजपा का आठवाँ उम्मीदवार जीत गया, तो यूपी में बचा खुचा इंडी एलायंस भी टूट जाएगा|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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