Vasundhara Raje: वसुंधरा राजे की राजनीति खत्म या मिलेगी कोई नयी जिम्मेदारी?
Vasundhara Raje: राजस्थान में तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने की सारी कोशिशें करने के बावजूद असफल रहीं वसुंधरा राजे के स्थान पर मुख्यमंत्री के रूप में भजनलाल शर्मा ने शपथ ले ली है और अब राजे की राजनीतिक संभावनाओं पर चर्चा होने लगी है। भाजपा ने जब मुख्यमंत्री पद के लिए शर्मा के रूप में नए चेहरे को चुना तो तारीफ तो बहुत हुई और यह भी कहा गया कि इस चयन से आम कार्यकर्ता में यह विश्वास बढ़ा है कि हर समर्पित कार्यकर्ता कल किसी भी पद पर पहुंच सकता है। लेकिन यह भी सवाल उठा कि राजस्थान की सबसे मजबूत नेता वसुंधरा राजे अब क्या करेंगी? या पार्टी अब उनके लिए क्या सोच रही है?
सवाल इसलिए है कि वसुंधरा राजे प्रदेश की सबसे लोकप्रिय नेता हैं और फिर भी उनकी बजाय भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री चुना गया। 70 साल की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे न केवल राजस्थान बल्कि देश भर में अब भी लोकप्रिय हैं, लेकिन उनके लिए पार्टी का क्या प्लान हैं, इस बारे में बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने फ़िलहाल पत्ते नहीं खोले हैं। लेकिन बहुत कोशिशों के बावजूद मुख्यमंत्री पद न दिए जाने के बाद उनके भविष्य पर बीजेपी के कुछ नेताओं का कहना है कि केंद्रीय नेतृत्व राजे को पार्टी के भीतर या केंद्र सरकार में मौक़ा दे सकता है।

ताकतवर वसुंधरा की ताकत
राजस्थान की दो बार मुख्यमंत्री रहने से पहले वसुंधरा राजे केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में विदेश राज्य मंत्री रही हैं। वसुंधरा राजे दो बार दमदार मुख्यमंत्री रही हैं और फिलहाल बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। 2014 में बीजेपी जब केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश की सत्ता में आई तो वसुंधरा को केंद्र की राजनीति में आने के लिए कहा गया था, यह तब की बात है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सबसे करीबी साथी अमित शाह देश भर में पार्टी का विस्तार कर रहे थे और साथ ही उस पर अपनी पकड़ भी मज़बूत कर रहे थे।
मगर तब वसुंधरा ने इससे इनकार कर दिया था। फिर वह राजस्थान में पार्टी के नेताओं और विधायकों के बीच अपने वफ़ादारों की फौज का विस्तार करती हुई राज्य में बीजेपी को मजबूत करने के साथ ही खुद की जड़ें भी गहरी करती जा रही थीं। इस बार के विधानसभा चुनाव से पहले जब उनको केंद्र में ले जाने की बात चली, तो उन्होंने खुद ही यह ऐलान तक कर दिया कि 'मैं राजस्थान से बाहर कहीं नहीं जाने वाली, मेरी डोली राजस्थान आई थी और अब मेरी अर्थी ही राजस्थान से जाएगी।'
राजे को दरकिनार करने की तैयारी पहले से थी?
राजस्थान में बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने वसुंधरा राजे के भविष्य का प्लान तैयार कर लिया था। राजस्थान की राजनीतिक समझ रखनेवाले कहते हैं सन 2018 में जब राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता में आई, तभी वसुंधरा राजे के बजाय बीजेपी नेतृत्व ने उनकी जगह राजस्थान में नए नेतृत्व को आगे लाने का निर्णय कर लिया था। इसी कारण उनको दरकिनार करते हुए छोटे छोटे प्रतिद्वंदियों को ताकतवर बनाया जाता रहा।
जानकार कहते हैं कि इसके बावजूद राजनीतिक रूप से बेहद जिद्दी स्वभाव की वसुंधरा राजे अपने स्वभाव के मुताबिक राजस्थान में अपनी ताकत दिखाने के नुस्खे तलाशती रही और तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने की राह अपने स्तर पर मजबूत करती रही। हालांकि बीजेपी नेतृत्व भी किसी और को मुख्यमंत्री बनाने के अपने लक्ष्य पर अटल रहते हुए हर तरह से वसुंधरा को मुख्यधारा से दूर ही रखे रहा। फिर भी, बीजेपी के नेताओं द्वारा बीच बीच में जब तब उनको राजस्थान से बाहर भेजे जाने की चर्चा चली, तो वह दृढ़ता से डोली और अर्थी वाला अपना लोकप्रिय जुमला उछालकर जिद पर अड़े रहने के संदेश देती रही और विधायकों व नेताओं का साथ व समर्थन भी जुटाती रही।
इस बार के विधानसभा चुनाव में भी वसुंधरा ने पूरी ताकत दिखाने की कोशिश की, और हालांकि बीजेपी आलाकमान ने उनके समर्थकों और विश्वासपात्रों को बड़ी संख्या में टिकट भी दिए, लेकिन उनके चेहरे पर वोट मांगने के बजाय कमल के निशान को पार्टी का चेहरा घोषित करके चुनाव लड़ा और जीत दर्ज करते ही उन्हें दरकिनार करके भजनलाल शर्मा जैसे वसुंधरा राजे से बेहद अल्प राजनीतिक कद के नेता को मुख्यमंत्री बना दिया।
क्या वसुंधरा को कुछ मिलेगा तो वो स्वीकार करेंगी?
अब जब बीजेपी ने राजस्थान में नेतृत्व का स्वरूप ही बदलकर वसुंधरा से फोकस शिफ्ट कर दिया है, तो सवाल किया जा रहा है कि उनका राजनीतिक भविष्य क्या होगा? राजनीति से जुड़े लोगों और राजनीतिक विश्लेषकों की इस मामले में अलग अलग राय है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि बीजेपी टेलेंट को जाया नहीं करती, किसी न किसी रूप में उनका उपयोग करती ही है।
इसी तथ्य के अनुरूप वसुंधरा राजे को केंद्र सरकार में या संगठन में कोई सक्रिय जिम्मेदारी दी जा सकती है। हालांकि, वसुंधरा राजे पार्टी से मिले किसी प्रस्ताव को स्वीकार करेगी या नहीं, इस पर अलग अलग मत हैं। वसुंधरा राजे के एक करीबी का कहना है कि यह पूरी तरह से राजे के निर्णय पर ही निर्भर रहेगा कि वे दिल्ली से मिलने वाले किसी भी तरह के प्रस्ताव को स्वीकार करती हैं या नहीं। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि बहुत संभावना इस बात की भी है कि केंद्र अपनी ओर से वसुंधरा राजे को कोई प्रस्ताव दे ही नहीं।
सब कुछ मोदी और शाह पर निर्भर?
हालांकि, यह भी तय है कि 'डोली और अर्थी' वाला उनका दांव भजनलाल शर्मा को नेतृत्व मिलने के बाद अब ठंडा पड़ गया है और संभव है कि वे देश या दिल्ली में कोई सम्मानजनक पद लेकर तत्काल राष्ट्रसेवा में लग जाए, या फिर लोकसभा चुनाव की प्रतीक्षा करे, ताकि चुनाव जीतकर केंद्र में मंत्री पद की संभावना जग सके। वसुंधरा राजे की राजनीति जानने वाले कहते हैं कि मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के, 'मैं अपने लिए कुछ मांगने से बेहतर मरना पसंद करूंगा, ये मेरा काम नहीं है' बयान के बाद वसुंधरा राजे पर भी ये दबाव बना है कि वे भी केंद्र से कुछ ना मांगें।
हालांकि, जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से वसुंधरा राजे के रिश्ते रहे हैं, तथा तीनों ही अपने अपने स्तर पर राजनीतिक रूप से बेहद सख्त और लगभग अटल - अविचल रहने वाले हैं, उससे तो यह संभावना कतई नहीं है कि तीनों में से कोई एक भी झुकेगा। फिर, वसुंधरा राजे भी शिवराज सिंह की तरह ही मांगना तो पसंद नहीं करेंगी, यह सब जानते हैं।
ऐसे में, सियासी शतरंज पर भले ही यह कहा जाता रहा हो कि राजनीति असीम संभावनाओं का खेल है लेकिन जब संभावनाएं खुद ही भावनाओं का खेल बन जाए, तो राजनीति खेल से ज्यादा और कुछ भी नहीं होती। फिर भी कहना मुश्किल है कि वसुंधरा राजे के साथ खेल हो गया और उनका खेल खत्म हो गया है। लेकिन खेल की गेंद किसके पाले में है, यह भी साफ है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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