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Rajasthan Assembly: स्पीकर पद की शक्तियां घटाने के लिए याद रहेंगे सी.पी. जोशी

कोर्ट को तब तक दखल का अधिकार नहीं होता, जब तक स्पीकर दलबदल क़ानून के अंतर्गत दाख़िल याचिका पर फैसला नहीं कर ले। लेकिन स्पीकर सीपी जोशी ने कोर्ट में वकील भेज कर न्यायपालिका को अपने फैसले से पहले ही दखल का अधिकार दे दिया।

Rajasthan Assembly High Court notice to Speaker CP Joshi on congress mlas Resignation

Rajasthan Assembly: कांग्रेस हाईकमान की ओर से सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाए जाने की आशंका के चलते कांग्रेस के 90 विधायकों ने 25 सितंबर 2022 को विधानसभा स्पीकर के घर जाकर सामूहिक इस्तीफे दिए थे| राजस्थान हाईकोर्ट ने विधानसभा के स्पीकर सीपी जोशी को नोटिस जारी करके पूछा है कि उन्होंने उन 90 विधायकों के इस्तीफों पर क्या कार्यवाही की है| स्पीकर को दस दिन में जवाब दाखिल करना है|

Rajasthan Assembly High Court notice to Speaker CP Joshi on congress mlas Resignation

हालांकि हाईकोर्ट के नोटिस से पहले ही विधायक शनिवार को इस्तीफे वापस ले चुके हैं, हालांकि हाईकोर्ट में इस पर भी सुनवाई हो रही है कि विधायक इस्तीफा वापस ले सकते हैं या नहीं| इसलिए इस मामले में वैसे ही कुछ नहीं होना, जैसे दो साल पहले सचिन पायलट गुट के 18 विधायकों के मामले में हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में दाखिल याचिकाओं पर कुछ नहीं हुआ था|

राजस्थान हाईकोर्ट ने ढाई साल बाद अब सचिन पायलट और उन 18 विधायकों को भी नोटिस जारी करके पूछा है कि क्या उनकी ओर से जुलाई 2020 को स्पीकर के खिलाफ दायर याचिका रद्द की जाए| कांग्रेस हाईकमान के साथ सौदेबाजी करने के लिए तब सचिन पायलट ने हाईकोर्ट का इस्तेमाल किया था, उसके बाद उन बागियों में से कई अशोक गहलोत सरकार में मंत्री बन गए|

लेकिन अब दूसरा सवाल खड़ा होता है कि क्या हाईकोर्ट या सुप्रीमकोर्ट को लोकसभा या विधानसभा के स्पीकरों को नोटिस देने का अधिकार है? क्या यह विधायिका के कामकाज में दखल नहीं है? क़ानून के मुताबिक़ न्यायपालिका स्पीकर के काम में दखल नहीं दे सकती थी|

लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने सुप्रीमकोर्ट का नोटिस तक लेने से इनकार कर दिया था| विधानसभा स्पीकरों ने इसी परम्परा को आगे बढाया था| क्योंकि क़ानून के मुताबिक स्पीकर के दलबदल सम्बधी निर्णय लेने के अधिकार में कोर्ट दखल नहीं दे सकता| इस लिए आम तौर पर स्पीकर कोर्ट में अपना वकील भी नहीं भेजते थे|

दलबदल विरोधी क़ानून में सारे अधिकार स्पीकर को दिए गए थे, उसके फैसलों पर सुप्रीमकोर्ट समीक्षा भी नहीं कर सकता था| उत्तराखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, मणिपुर सभी मामलों में सुप्रीमकोर्ट का यही निर्णय रहा था| लेकिन जब स्पीकर ही गलत फैसले करें, या अपने दल की सरकार बचाने के लिए दलबदल क़ानून के अंतर्गत दाखिल याचिकाओं पर फैसला ही न करें, तो अदालतों को दखल देना पड़ा और धीरे धीरे न्यायपालिका ने स्पीकरों के अधिकारों पर कब्जा करना शुरू कर दिया|

1992 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पीकर के फैसले की न्यायिक समीक्षा का अधिकार ले लिया और 2020 में कर्नाटक विधानसभा स्पीकर के एक फैसले को पलट भी दिया| हालांकि कर्नाटक विधानसभा के स्पीकर का फैसला ही उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर था| उन्होंने कांग्रेस और जनता दल सेक्यूलर के 17 विधायकों की सदस्यता रद्द करते हुए उन्हें मौजूदा सदन के कार्यकाल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहरा दिया था| चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराना स्पीकर के अधिकार क्षेत्र में नहीं था|

सुप्रीमकोर्ट ने स्पीकर का यह फैसला बदलते हुए कहा कि वह विधायकों को सिर्फ अयोग्य ठहरा सकता है, लेकिन यह नहीं तय कर सकता है कि विधायक कब तक चुनाव नहीं लड़ेंगे| मणिपुर के मामले में कोर्ट ने स्पीकर को दलबदल के एक मामले में चार हफ्ते में फैसला करने का निर्देश दिया, हालांकि इसमें भी स्पीकर को बाध्य नहीं किया गया था| बाद में अधिकतम सीमा तीन महीने तय की गई|

मणिपुर और कर्नाटक के मामलों में फैसला देते समय सुप्रीमकोर्ट ने स्पीकरों के अधिकारों पर सख्त टिप्पणी करते हुए संसद से आग्रह किया था कि स्पीकरों से सदस्यों को अयोग्य ठहराने का अधिकार वापिस ले कर किसी प्राधिकरण को सौंपा जाए, जिसका अध्यक्ष सुप्रीमकोर्ट या हाईकोर्ट का रिटायर्ड जज हो|

यह लगातार देखा गया है विधायिका और कार्यपालिका के अधिकारों में न्यायपालिका अतिक्रमण करने की कोशिश करती रही थी| एक बार उसने सूचना आयुक्त रिटायर्ड जज नियुक्त करने का आदेश दे दिया था| एक बार उसने मुख्य चुनाव आयुक्त आयुक्त रिटायर्ड जज नियुक्त करने का आदेश दे दिया था। इसी तरह स्पीकर के अधिकार भी किसी रिटायर्ड जज को देने की बात कही थी|

सुप्रीमकोर्ट का एतराज इस बात पर है कि स्पीकर सत्ताधारी राजनीतिक दल के सदस्य होते है और उनके निर्णय राजनीति पर आधारित होते हैं| स्पीकरों ने खुद दलबदल विरोधी क़ानून के अंतर्गत फैसलों में देरी करके या दलगत आधार पर गलत फैसले देकर एवं तानाशाहीपूर्ण व्यवहार कर के न्यायपालिका को दखल देने का मौक़ा दिया|

राजस्थान विधानसभा के स्पीकर ने तो जुलाई 2020 में बड़ी गलती की थी, जब उन्होंने पायलट गुट की याचिका पर स्पीकर सचिवालय से वकील नियुक्त कर दिया था, और बाद में हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दे दी थी| जबकि लोकसभा के स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने सुप्रीमकोर्ट का नोटिस लेने से भी इनकार कर दिया था|

राजस्थान विधानसभा के स्पीकर सी.पी. जोशी ने कांग्रेस विधायक दल के मुख्य सचेतक महेश जोशी की याचिका पर राजेश पायलट समेत उनके गुट के 18 विधायकों को दलबदल विरोधी क़ानून के तहत नोटिस जारी किया, जिसे राजेश पायलट गुट ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी थी|

अगर कोई विधायक या सांसद अपने आप अपनी पार्टी छोड़ता है, तब भी उस पर दलबदल विरोधी क़ानून लागू होता है| इन 18 विधायकों ने एक तरह से खुद ही पार्टी छोड़ दी थी, इसलिए महेश जोशी की याचिका कानूनन सही थी, उस पर विधायकों को नोटिस देकर स्पीकर को कोर्ट की अनदेखी कर के फैसला करना चाहिए था|

कोर्ट को तब तक दखल का अधिकार नहीं था, जब तक स्पीकर दलबदल क़ानून के अंतर्गत दाख़िल याचिका पर फैसला नहीं कर ले| लेकिन स्पीकर सी.पी. जोशी ने कोर्ट में अपना वकील भेज कर न्यायपालिका को फैसले से पहले ही दखल का अधिकार भी दे दिया|

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    न्यापालिका की ओर से स्पीकरों को नोटिस देने का सांप खुद स्पीकर सी.पी. जोशी ने अपने गले में डाला है| कर्नाटक और मणिपुर विधानसभा स्पीकरों के साथ साथ सी.पी. जोशी भी इस मायने में याद किए जाएंगे कि उन्होंने स्पीकरों को मिले अधिकारों का मानमर्दन कर के स्पीकर पद की गरिमा घटाई|

    यह भी पढ़ें: Varun Gandhi: क्या वरुण गांधी का राजनीतिक हृदय परिवर्तन हो गया है?

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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