Rahul Gandhi Disqualified: खुद राहुल गांधी ने यह कानून बनवाया था

कांग्रेस अगर तुरंत हाईकोर्ट में जाकर निचली अदालत के फैसले पर रोक लगवाने में कामयाब हो जाती, तो स्पीकर को फैसला टालना पड़ सकता था। लेकिन कांग्रेस इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने का अवसर समझ रही है।

Rahul Gandhi Disqualified: Rahul Gandhi himself had made this law

लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने 2013 के सुप्रीमकोर्ट के फैसले का पालन किया है। राहुल गांधी की लोकसभा की सदस्यता समाप्त कर दी गई है, क्योंकि सूरत की कोर्ट ने उन्हें जातिसूचक शब्द इस्तेमाल करने के लिए दो साल की सजा सुनाई है। मनमोहन सिंह की केबिनेट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दो साल के बजाए पांच साल कैद की सजा पर सदस्यता खत्म किए जाने का प्रावधान करना चाहा था। इस संबंध में केबिनेट ने प्रस्ताव पास करके अध्यादेश जारी करवा दिया था। इन्हीं राहुल गांधी ने प्रेस क्लब में अध्यादेश की प्रति फाड़ पर मनमोहन सरकार को अध्यादेश वापस लेने को मजबूर किया था। अब सुप्रीमकोर्ट के उसी फैसले के कारण राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता चली गई है और अगर वह ऊपरी अदालत से बरी न हुए तो 2024 का लोकसभा चुनाव भी नहीं लड़ पाएंगे।

राहुल गांधी ने ट्विट कर के कहा है कि वह भारत की आवाज के लिए लड़ रहे हैं, और इसके लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। राहुल गांधी तो क्या कांग्रेस भी यह मानने को तैयार नहीं कि राहुल गांधी ने सभी मोदियों को चोर कह कर पूरी जाति का अपमान करके बड़ी गलती की थी। उन्हें मामला अदालत में जाने से पहले ही माफी मांग लेनी चाहिए, क्योंकि अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब यह नहीं है कि आप किसी को गालियां निकालते रहें, और किसी एक समुदाय को चोर कहने लगें।

Rahul Gandhi Disqualified: Rahul Gandhi himself had made this law

राहुल गांधी को सोचना चाहिए था कि वह किसी जाति पर कैसे प्रहार कर सकते हैं। अदालत ने उन्हें बार बार माफी मांगने का अवसर दिया, इसके बावजूद वह माफी मांगने को तैयार नहीं हुए। यहां सवाल सिर्फ राहुल गांधी का नहीं उनके वकीलों की टीम और पूरी कांग्रेस पर भी खड़ा होता है कि उन्होंने राहुल गांधी को यह सलाह क्यों नहीं दी कि इस तरह की भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

हैरानी यह है कि अदालत के फैसले को कांग्रेस बदले की भावना कह रही है। वह कोर्ट के फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतर आई है। अपने आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिए कांग्रेस के सारे लोकसभा सदस्य इस्तीफे देने की रणनीति बना सकते हैं। चुनाव में सिर्फ एक साल ही बचा है, कांग्रेस ऐसा समझती है कि जिस तरह लोकसभा की ओर से 1978 में इंदिरा गांधी की सदस्यता खत्म करने से देश में उनके पक्ष में माहौल बना था, वैसा ही माहौल बनाया जा सकता है।

यह कोई पहली बार नहीं हो रहा जब नेहरु परिवार के लिए कांग्रेस ने कोर्ट के फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया है। इससे पहले जब 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द किया था, कांग्रेस तब भी सडकों पर उतरी थी। क़ानून के राज को सबक सिखाने के लिए इंदिरा गांधी ने सारे देश पर इमरजेंसी थोप दी थी। इतना ही नहीं बल्कि जिस नियम के कारण इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द किया गया था, बाद में इंदिरा गांधी ने उस नियम को ही पिछली तारीख से बदल दिया था।

उस समय यशपाल कपूर प्रधानमंत्री के सचिव थे, चुनाव से पहले राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेजकर वह इंदिरा गांधी के चुनाव इंचार्ज बन गए थे, लेकिन उनका इस्तीफा मंजूर नहीं हुआ था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सिन्हा ने अपने आदेश में लिखा था कि इंदिरा गांधी ने अपने चुनाव में भारत सरकार के अधिकारियों और सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया। इंदिरा गांधी ने बाद में इस्तीफा मंजूर होने वाला नियम ही बदल दिया था, बल्कि पिछली तारीख से बदल दिया।

1977 में भी जब लोकसभा ने प्रस्ताव पास करके इंदिरा गांधी की सदस्यता खत्म की थी, तब भी कांग्रेस ऐसे ही सड़कों पर उतरी थी, तब मोरारजी देसाई की सरकार झुक गई थी और दुबारा प्रस्ताव पास करके लोकसभा ने उनकी सदस्यता बहाल कर दी थी। लेकिन अब कांग्रेस जितने चाहे प्रदर्शन कर ले, लोकसभा स्पीकर के हाथ बंधे हुए हैं।

सुप्रीमकोर्ट जन प्रतिनिधित्व क़ानून की वह धारा 8{4} खत्म कर चुका है, जिसमें याचिका लंबित होने तक सांसद बने रहने का रास्ता खुला हुआ था। अधिनियम की धारा 8{3} में दो साल की सजा होने पर सदस्यता खत्म किए जाने का प्रावधान है। शुरू में ऐसा लगा था कि क्योंकि राहुल गांधी को सजा देने वाले जज ने सजा को एक महीने के लिए निलंबित कर दिया था, इसलिए शायद राहुल गांधी की सदस्यता एक महीने तक खत्म नहीं की जाएगी।

लेकिन लोकसभा स्पीकर को कानूनी सलाह दी गई कि सजा निलंबित होने के बावजूद वह सांसद नहीं रह सकते। क्योंकि जन प्रतिनिधित्व क़ानून की जिस धारा के अंतर्गत ऊपरी अदालत में सुनवाई के दौरान सांसद बने रहने का प्रावधान था, वह धारा ही असंवैधानिक करार दी जा चुकी है, तो वह सांसद कैसे बने रह सकते हैं। जब तक वह बरी नहीं होते, सांसद नहीं बने रह सकते।

कांग्रेस अगर तुरंत हाईकोर्ट में जाकर निचली अदालत के फैसले पर रोक लगवाने में कामयाब हो जाती, तो स्पीकर को फैसला टालना पड़ सकता था, लेकिन कांग्रेस इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने का अवसर समझ रही है, इसलिए वह जानबूझकर कोर्ट नहीं गई। लेकिन यह कोई पहली बार नहीं हुआ कि दो साल की सजा होने पर किसी की सदस्यता खत्म हुई हो, इस क़ानून के अंतर्गत अब तक 32 सांसदों की सदस्यता खत्म हो चुकी है, जिनमें लालू यादव भी शामिल है।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा है कि उन्हें पहले ही अंदेशा था कि इस तरह का फैसला आ सकता है, क्योंकि सुनवाई के दौरान कई जज बदले गए। जजों के ट्रांसफर के नियम हैं, आमतौर पर तीन साल बाद जिला जज का ट्रांसफर होता है। पिछले चार साल में अगर दो जज बदले भी गए हों, तो यह नियमानुसार ही हुआ होगा। लेकिन यह कह कर मल्लिकार्जुन खड़गे ने न्यायपालिका पर सवाल खड़ा किया है।

मल्लिकार्जुन खड़गे को शायद यह समझ ही नहीं आ रहा कि राहुल गांधी की यह टिप्पणी गलत थी, इसी लिए कोर्ट ने ट्रायल के बाद फैसला दिया है। कोर्ट में दलीलें देने के लिए राहुल गांधी ने वकीलों की टीम लगाई हुई थी। वकील भी राहुल गांधी के इस वाक्य को उचित ठहराते रहे कि राहुल गांधी का मोदी सरनेम को चोर कहना इसलिए गलत नहीं है क्योंकि उन्होंने दो भगौड़ों का नाम लिया था।

मल्लिकार्जुन खड़गे जिस तरह फैसला सुनाने वाले जज पर सवाल उठा रहे हैं, वह न्यायपालिका की अवमानना का मामला बनता है। पता नहीं सूरत के जिला जज और गुजरात सरकार इसे गंभीरता से लेंगे या नहीं। लेकिन मल्लिकार्जुन खड़गे के इस बयान ने इंदिरा गांधी की याद दिला दी, जिन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डी.सी. माथुर के माध्यम से जस्टिस सिन्हा को संदेश भिजवाया था कि अगर वह इंडिया गांधी के पक्ष में फैसला देंगे तो उन्हें सुप्रीमकोर्ट का जज बना दिया जाएगा।

बाद में गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव पीपी नैयर ने चीफ जस्टिस माथुर से मिलकर अनुरोध किया था कि जस्टिस सिन्हा को जुलाई तक फैसला टालने के लिए कहा जाए। जस्टिस माथुर ने जस्टिस सिन्हा से अनुरोध किया भी था, लेकिन जस्टिस सिन्हा ने इस अनुरोध को ठुकराते हुए 12 जून को फैसला सुना दिया। यह सब कुछ राज नारायण के वकील शान्ति भूषण के बेटे प्रशांत भूषण ने अपनी किताब में लिखा है, जो हाल ही में राहुल गांधी की पदयात्रा में उनके साथ चले थे। इस घटना का उल्लेख करना आज इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मल्लिकार्जुन खड़गे शायद उसी जमाने में घूम रहे हैं, जिस जमाने में जजों की नियुक्ति सरकार करती थी और उन्हें दबाया जाता था।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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