Rahul Gandhi Case: सार्वजनिक जीवन में शब्दों की मर्यादा जरूरी
सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा रहनी चाहिए। राहुल गांधी के आस पास एक ऐसी चौकड़ी जम गई है, जिसे न भाषा की समझ है, न संस्कृति की और न राजनीति की समझ है। अपने यहाँ कहावत है, जैसी संगत, वैसी रंगत।

राहुल गांधी अब किसी को चोर कहना भूल जाएंगे। हर किसी को चोर कहना उनकी आदत बन गई थी। चौकीदार चोर है कहने के बाद उन्होंने यहां तक कह दिया था कि हर चोर मोदी क्यों होता है। गुजरात की सूरत कोर्ट ने उन्हें दो साल की सजा सुनाई है। यह बात 2019 के लोकसभा चुनाव की ही है, जब वह हर जनसभा में चौकीदार चोर है का नारा लगवाया करते थे। तभी उन्होंने दक्षिण भारत की एक जनसभा में कह दिया कि हर चोर का सरनेम मोदी क्यों होता है। उनका आशय नीरव मोदी और ललित मोदी से रहा होगा। लेकिन मोदी एक जाति है, सारे मोदी तो चोर नहीं हो सकते। सूरत से भाजपा विधायक पूर्नेश मोदी ने उसी समय राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि का केस दायर कर दिया था।
शायद अब उन्हें समझ आ जाए कि गालीगलोज इस देश की राजनीतिक भाषा नहीं है। अभी तो गुजरात का एक फैसला आया है। बिहार का फैसला भी आने वाला है। वहां भी सुशील कुमार मोदी ने भी चोर कहने पर एक केस दायर किया हुआ है। सूरत की कोर्ट में चार साल से केस चल रहा था, राहुल गांधी खुद दो बार सुनवाई के समय कोर्ट में हाजिर हुए थे। उनके पास माफी मांगने का लंबा वक्त था, लेकिन नहीं मांगी।
राहुल कम से कम केजरीवाल से कुछ सीखते, जो शुरुआत में हर नेता पर अनाप शनाप आरोप लगाया करते थे, लेकिन कोर्ट में पहली या दूसरी तारीख पर ही माफी मांग लिया करते थे। उन्होंने नीतिन गडकरी और अरुण जेटली से माफी मांग ली थी। राहुल गांधी कम से कम अपने ही पहले के तजुर्बे से सबक लेते जब उन्हें चौकीदार चोर कहने पर सुप्रीमकोर्ट में माफी मांगनी पड़ी थी।

सवाल खड़ा हो रहा है कि राहुल गांधी की लोकसभा की सदस्यता खत्म होगी या नहीं। राहुल गांधी सुप्रीमकोर्ट के उसी फैसले में फंस गए हैं, जिसे संशोधित करने के लिए यूपीए सरकार अध्यादेश लाई थी, लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बेइज्जत करते हुए राहुल गांधी ने प्रेस क्लब में अध्यादेश की प्रति फाड़ दी थी। सुप्रीमकोर्ट ने 10 जुलाई 2013 को एक फैसला दिया था, जिसके अंतर्गत लोकप्रतिनिधित्व क़ानून 1951 की धारा 8{4} को असंवैधानिक ठहरा दिया था। इस धारा में प्रावधान था कि अगर किसी विधायक या सांसद को दो साल या उससे ज्यादा सजा होती है और वह उस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देता है, तो याचिका लंबित रहने तक उसकी सदस्यता बरकरार रहेगी। सुप्रीमकोर्ट के उस फैसले से लालू यादव की सदस्यता खत्म हो रही थी क्योंकि वह चारा घोटाले में सजायाफ्ता हो गए थे। सरकार इस फैसले को बदलने के लिए अध्यादेश लाई थी, लेकिन राहुल गांधी ने अध्यादेश फाड़ दिया तो मनमोहन सरकार ने अक्टूबर में अपना अध्यादेश वापस ले लिया था।
जिस जज ने राहुल गांधी को दो साल की सजा सुनाई है, उसने राहुल गांधी की सदस्यता बचाने का दरवाजा भी खोल दिया। राहुल गांधी की सजा को फिलहाल एक महीने के लिए निलंबित किया गया है, इससे उनकी लोकसभा की सदस्यता बच जाएगी। अगर अदालत फैसले को एक महीने के लिए निलंबित नहीं करती तो सुप्रीमकोर्ट के फैसले के मुताबिक़ राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता 23 मार्च 2023 से खत्म हो जाती और छह साल के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य भी हो जाते। एक महीने के भीतर वह निचली अदालत के फैसले को चुनौती देंगे। इसलिए लोक-प्रतिनिधि अधिनियम 1951 की धारा 8(3) के मुताबिक उनकी संसद की सदस्यता पर फिलहाल कोई खतरा नहीं है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य नेता कुछ भी सबक लेंगे। क्योंकि सवाल सिर्फ राहुल गांधी का नहीं कांग्रेस के सभी नेता कुछ भी अनाप शनाप बोलते रहते हैं। जबकि सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा रहनी चाहिए। राहुल गांधी के आस पास एक ऐसी चौकड़ी जम गई है, जिसे न भाषा की समझ है, न संस्कृति की और न राजनीति की समझ है। अपने यहां कहावत है, जैसी संगत, वैसी रंगत।
मुझे जनार्दन द्विवेदी की याद आती है, मैं उन्हें राजीव गांधी या सोनिया गांधी का राजनीतिक सलाहाकार तो नहीं कह सकता, लेकिन राजीव गांधी और सोनिया गांधी को राजनीतिक भाषा की मर्यादा तो उन्होंने ही सिखाई थी। इन दोनों के भाषण जनार्दन द्विवेदी ही लिखा करते थे। जैसे ही सोनिया गांधी पर जनार्दन द्विवेदी का प्रभाव खत्म हुआ, मौत के सौदागर जैसी भाषा शुरू हो गई। 2014 के चुनाव नतीजों के बाद जैसे ही उन्होंने कांग्रेस को बताया कि कांग्रेस क्यों फेल हुई और मोदी युग की शुरुआत हो गई है, उन्हें किनारे करना शुरू कर दिया गया। अब जनार्दन द्विवेदी तो राजनीति से रिटायर हो चुके हैं, लेकिन उनका बेटा भाजपा में शामिल हो चुका है।
लोग तो राहुल गांधी की बेहूदा भाषा पर कई बार चुप्पी साध लेते हैं, अगर उनके हर भाषण की समीक्षा की जाए, तो हर रोज उन पर कोई न कोई केस दर्ज हो। वीर सावरकर और आरएसएस पर बिना वजह अनर्गल बयानबाजी उनकी आदत बन गई है। अपनी भारत जोड़ो यात्रा में बार बार नफरत फैलाने वाली बयानबाजी के अलावा उन्होंने क्या कहा और क्या किया। जबकि भारत जोड़ो यात्रा का मकसद प्यार मोहब्बत फैलाना बताया गया था। कांग्रेस के बचे खुचे नेताओं को बैठ कर सोचना चाहिए कि कांग्रेस कहां पहुंच गई है, जिस तरह पिछले सात आठ साल में सेना, न्यायपालिका, चुनाव आयोग पर कांग्रेस के नेता हमला करते रहे हैं, वह सब मंथन का विषय है।
कांग्रेस नेताओं की राहुल गांधी के हर गलत बयान पर सिर झुकाने की आदत बन गई है, जब राहुल गांधी ने प्रेस क्लब में एक अध्यादेश की कापी फाड़ दी थी, तो मनमोहन सिंह सरकार ने अध्यादेश वापस ले लिया था। राहुल गांधी के लन्दन में दिए गए अनर्गल भाषणों का संसद के दोनों सदनों में कांग्रेस बचाव कर रही है। सूरत की कोर्ट से राहुल गांधी को सजा होने के बाद भी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का बयान उनका बचाव करने वाला है, जब उन्होंने कहा कि सुनवाई के दौरान कई जज बदले गए।
कांग्रेस के नेताओं को पार्टी के भीतर लोकतंत्र कायम कर के राहुल गांधी की समीक्षा करनी चाहिए। यहां लोकतंत्र कायम करने से मेरा आशय कांग्रेस कार्यसमिति का चुनाव करवाने से है, जिसे अस्वीकार कर के अध्यक्ष को अधिकार दे दिया गया है कि वह चापलूसों को मनोनीत कर लें। ऐसे मनोनीत सदस्य कार्यसमिति में क्या बोलेंगे।
इंदिरा गांधी या उससे पहले के जमाने की बात थी ही अलग, मैंने नरसिम्हा राव के समय जब रिपोर्टिंग की शुरुआत की थी, तब भी अर्जुन सिंह, के. करुनाकरण, विजय भास्कर रेड्डी, वी.एन. गाडगिल, माखन लाल फोतेदार जैसे नेता कार्यसमिति में खुलकर अपनी बात कहा करते थे। अब कांग्रेस कार्यसमिति में चापलूसी के अलावा कुछ नहीं होता, इसीलिए गुलामनबी आज़ाद की रहनुमाई में जी-23 ग्रुप ने कांग्रेस कार्यसमिति के चुनाव करवाने की मांग की थी।
कांग्रेस के प्रवक्ताओं का भी बुरा हाल है, जैसा राजा, वैसी प्रजा वाली हालत हो गई है कांग्रेस की। मैंने कांग्रेस प्रवक्ता वी.एन. गाडगिल का जमाना देखा है। क्या मर्यादित भाषा होती थी, सीधा हमला किसी पर नहीं होता था, संकेतों में ही सब कुछ कह दिया करते थे। आखों का इशारा ही बड़ी खबर बन जाया करती थी।
अब कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा को देख सुनकर आश्चर्य होता है कि कांग्रेस कहां से कहां पहुंच गई है। प्रधानमंत्री के खिलाफ हर रोज किस किस तरह की बेहूदा भाषा का इस्तेमाल करते हैं वह। हाल ही में उन्होंने नरेंद्र मोदी के पिता के नाम पर गलत टिप्पणी की और जब उन्हें गिरफ्तार किया गया तो कांग्रेस के बड़े बड़े नेताओं ने नारे लगाए, मोदी तेरी कब्र खुदेगी। क्या देश के प्रधानमंत्री के लिए ऐसी भाषा शोभा देती है? सार्वजनिक जीवन में शब्दों की मर्यादा रहनी चाहिए।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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