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Ragging: जारी है रैंगिग के नाम पर बर्बर और बेहूदा व्यवहार

Ragging: बीते दिनों तेलंगाना में रैगिंग रोधी समिति द्वारा जांच के बाद राज्य सरकार द्वारा संचालित गांधी मेडिकल कॉलेज के दस एमबीबीएस छात्रों को एक साल के लिए निलंबित कर दिया गया। एंटी-रैगिंग कमेटी ने पाया कि जूनियर छात्रों के साथ रैगिंग करने के आरोपी विद्यार्थी दोषी हैं। वे बीते कुछ दिनों से रैगिंग में संलिप्त थे। गौरतलब है कि रैगिंग के शिकार छात्रों द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली में रैगिंग रोधी प्रकोष्ठ को शिकायत के बाद यह जांच हुई थी। जांच के बाद इन छात्रों को निलंबित करने का आदेश जारी किया गया है। अफसोस कि यह कोई चौंकाने वाला समाचार नहीं है। न ही ऐसे दुर्व्यवहार की खबरों को गंभीरता से लिया जाता है।

हमारे यहाँ रैगिंग की शिकायतों और दोषी छात्रों के निलंबन के समाचार आए दिन आते रहते हैं। बावजूद इसके न तो इस नकारात्मक व्यवहार पर लगाम लग रही है और दोषियों को सख्त सजा देने के उदाहरण भी नाम मात्र के हैं। दूसरे छात्रों का मनोबल तोड़ने और प्रताड़ित करने वाली अधिकतर घटनाओं में सजा देने के लिए निलंबन से आगे सोचा ही नहीं जाता। परिणामस्वरूप परिचय के नाम पर बेहूदा, बर्बर और अश्लील हरकतों वाली रैगिंग जारी है।

Ragging cases in colleges absurd behavior continues in the name of ragging

एक ओर जहां मेडिकल की पढ़ाई के लिए तैयारी रही एक छात्रा ने कोचिंग केंद्र कहे जाने वाले कोटा में अपनी जान दी है, वहीं एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे विद्यार्थियों का यह व्यवहार दुर्भाग्यपूर्ण दिशाहीनता ही कहा जाएगा। जिस देश में एक-एक सीट के लिए बच्चे अपनी जान दे रहे हैं, वहाँ स्तरीय कॉलेज में प्रवेश पा चुके छात्र अपनी ऊर्जा नए छात्रों के शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और यौन उत्पीडन में लगा रहे हैं। इससे ज्यादा भयावह क्या हो सकता है? चिंतनीय बात यह है कि इस बेहूदगी से जुड़े सभी मामले तो सामने भी नहीं आ पाते। बहुत से मामलों को तो संस्थान के परिसर से बाहर ही नहीं आने दिया जाता। फिर भी मन विचलित करने वाली कुछ घटनाएँ सुर्खियां बनती हैं तो कई सवाल भी उठ खड़े होते हैं।

इतना ही नहीं रैगिंग करने वाले विद्यार्थियों में मानवीय मोर्चे पर ही कोई समझ नहीं है। नए छात्रों के प्रति संवेदनशीलता नहीं है। व्यवस्था का कोई भय नहीं है। सजा मिलने का डर नहीं है। व्यक्तित्व गढ़ने वाले अपने अभिभावकों की बिखरती आशाओं का खयाल नहीं है। ऐसे संवेदना शून्य व्यवहार वाले विद्यार्थी आगे चलकर कैसे चिकित्सक बनेंगे, यह भी एक बड़ा सवाल है। अपने जूनियर साथियों को अपमानित करने वाला हद दर्जे का असभ्य बर्ताव करने वाले विद्यार्थियों की सोच की इस दिशाहीनता को आखिर क्या समझा जाए ?

हैदराबाद में हुए इस शर्मनाक मामले में पीड़ित छात्रों को न केवल आधी रात कमरे में बुलाया गया, बल्कि जबरदस्ती शराब और सिगरेट पिलाकर उनके कपड़े भी उतरवाए गए। सप्ताह भर पहले कॉलेज आए इन छात्रों के साथ सीनियर छात्रों ने गाली-गलौज भी की। इतना ही नहीं दिन भर औपचारिक कपड़े पहने रहने और लाइब्रेरी में प्रवेश न करने की हिदायत भी गई। अफसोस यह है कि एक सरकारी कॉलेज में मन दुखाने वाली ऐसी घटना हुई है।

रैगिंग के दौरान किए गए बर्ताव से व्यथित होकर देश के कई संस्थानों में विद्यार्थी अपनी जान तक दे चुके हैं। दूर-दराज़ के इलाकों से आने वाले कई मेधावी छात्र इस शोषण और प्रताड़ना के चलते पढ़ाई तक छोड़ देते हैं। मेहनत से अपनी जगह बनाने वाले विद्यार्थियों के अभिभावक एक अर्थहीन सी वजह से दिन-रात डरे-डरे से रहते हैं।

कितने ही छात्र-छात्राएं सीनियर विद्यार्थियों का भयावह व्यवहार झेलकर अवसाद से घिर जाते हैं। इस मनोवैज्ञानिक पीड़ा के चलते पढ़-लिखकर कुछ बनने के सपनों से मुंह मोड़ लेते हैं। ऐसी स्थितियाँ केवल बच्चे और उसके परिवार को ही नहीं समाज और देश को भी हानि पहुँचाती हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इस दुर्व्यवहार की दरकार ही क्यों है ? नए बच्चों को संबल देने के बजाय उनका मनोबल तोड़ने वाले इस तथाकथित परिचय के खेल को बंद क्यों नहीं किया जाता?

विडम्बना ही है कि स्कूली शिक्षण संस्थानों से लेकर उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठानों तक, जाने कब और कैसे यह अजब-गज़ब सी कुप्रथा पनप गई, जिसमें अपने नए साथियों के साथ सहयोग नहीं बल्कि शोषण करने का चलन चल पड़ा। कैसी विडंबना है कि छात्रों को निर्वस्त्र करना, फब्तियां कसना, यौन उत्पीड़न, घृणित स्तर का मजाक, अपशब्द कहना और नशा आदि करवाना तक अब रैगिंग का हिस्सा बन गए हैं। बीते कुछ बरसों से देश के कोने-कोने में रैगिंग के नाम पर भावी प्रतिभाओं को ही नहीं पूरे परिवार और समाज को आघात पहुंचाने वाली ऐसी घटनाएँ बदस्तूर जारी हैं। बावजूद इसके दोषी छात्रों को कठोर दंड देने के उदाहरण बहुत कम देखने को मिलते हैं।

भारत में किसी भी शिक्षण संस्थान या छात्रावास में किसी विद्यार्थी के दुर्व्यवहार (रैगिंग) को लेकर कठोर कानून बने हुए हैं। रैगिंग रेगुलेशन एक्ट के अंतर्गत सश्रम कारावास और जुर्माने तक का प्रावधान है। ज्ञात हो कि 2013 में भोपाल के एक निजी कॉलेज में रैगिंग से तंग आकर एक छात्रा द्वारा आत्महत्या कर लेने के मामले में दो साल पहले अदालत ने चार छात्राओं सजा दी थी। न्यायालय ने चार छात्राओं को दोषी करार देते हुए पांच साल की कैद और दो-दो हजार रुपये जुर्माना देने की सजा सुनाई थी।

भविष्य बनाने की गलाकाट प्रतियोगिता के बीच बड़ी मेहनत से छात्र किसी संस्थान में पहुँचते हैं। इन हालतों में भी रैगिंग के नाम पर हर साल अनगिनत विद्यार्थी अपने वरिष्ठ विद्यार्थियों का कठोर व्यवहार और उत्पीड़न झेलते हैं। वरिष्ठ छात्र अमानवीय और अनुशासनहीन व्यवहार कर अपना दबदबा बनाने की कोशिश में इंसानियत ही भूल जाते हैं। बीते कुछ बरसों में ऐसे मामलों में लड़कियों की भागीदारी भी खूब देखने को मिली है। देश के हर हिस्से में हो रही ऐसी घटनाएं समग्र समाज और शिक्षा जगत के लिए चिंता का विषय हैं।

कालेज में रैगिंग हर तरह की सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों की समस्याएँ बढ़ाती है। विशेषकर सरकारी संस्थानों में आने वाले बहुत बच्चे तो आर्थिक मोर्चे पर भी एक युद्ध लड़कर ही अपने सपनों को साकार करने निकलते हैं। लेकिन जब वो रैगिंग के डर से स्कूल या कॉलेज ही छोड़ देते हैं तो न केवल उनका भविष्य चौपट होता है बल्कि परिवार की उम्मीदों पर भी पानी फिर जाता है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कई छात्रों के भविष्य निर्माण में बाधक बनने वाले इस दुर्व्यवहार को रोकने के लिए कानूनी सख्ती आवश्यक है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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