राफेल पर ललकार रहे हैं राहुल तो भाग क्यों रहे हैं प्रधानमंत्री मोदी?
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नई दिल्ली। राहुल गांधी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अकेले 20 मिनट तक राफेल मसले पर बहस की चुनौती दी है। पहली जनवरी को साक्षात्कार में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि राफेल पर वे संसद में जवाब दे चुके हैं और बार-बार उसी मुद्दे पर जवाब नहीं देंगे। शायद यही वजह है कि 2 जनवरी को जब राहुल गांधी लोकसभा में बोल रहे थे तो प्रधानमंत्री मौजूद तक नहीं थे। रक्षा मंत्री ने भी राहुल का जवाब नहीं दिया। राहुल को जवाब देने खड़े हुए वित्तमंत्री अरुण जेटली।

सदन से ट्विटर तक ‘लड़ाई’
संसद में राहुल और जेटली का राफेल पर चला संघर्ष शाम होते-होते ट्विटर पर उठकर चला आया। कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियों के नेता ट्विटर पर एक-दूसरे के ख़िलाफ़ भिड़ गये। जिस तरीके से संसद में भ्रष्टाचार के मामले में वित्त मंत्री ने राहुल गांधी और उनके परिवार पर व्यक्तिगत हमले किए, उसका असर ट्विटर पर भी साफ-साफ दिखा।

जेटली ने राहुल गांधी को मूर्ख बताया
वित्तमंत्री अरुण जेटली ने राहुल गांधी को मूर्ख बताया है कि वे एक एयरक्राफ्ट की तुलना वे हथियारों से लैस जेट से कर रहे हैं। वे कहते हैं कि बिल्कुल अलग-अलग चीजों की तुलना कीजिए और इसे ‘घोटाला' का नाम दे डालिए। राहुल गांधी के लिए वित्तमंत्री अरुण जेटली ने ट्वीट में लिखा है, "कितना वे जानते हैं? कब वे जानेंगे?"

राहुल के निशाने पर बने हुए हैं मोदी
मगर, राहुल गांधी के निशाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बने हुए है। ऐसा लगता है कि वे नरेंद्र मोदी को राफेल पर बोलने के लिए बाध्य करके ही छोड़ेंगे। यह बात अलग है कि जब बीजेपी नेताओं को राफेल पर बोलने को कहा जाता है तो वे बोफोर्स और अगस्ता वेस्टलैंड और क्वात्रोकी पर बोलने लग जाते हैं।

राहुल लेंगे मोदी की परीक्षा, पेपर भी किया ‘लीक’
राहुल गांधी ने गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए परीक्षा का दिन बताते हुए उनके लिए पेश होने वाले सवालों को भी ‘लीक' कर दिया है।
1. इंडियन एयरफोर्स के लिए जरूरी थी 126 एयरक्राफ्ट, केवल 36 एयरक्राफ्ट ही क्यों खरीदे गये?
2. प्रति एयरक्राफ्ट कीमत 560 करोड़ रुपये के बजाए 1600 करोड़ क्यों?
3. एचएएल की जगह अनिल अम्बानी (एए) क्यों?
राहुल के हाथ में राफेल पर ऑडियो टेप का बम भी है जिसे वे संसद में फोड़ने को आमादा दिख रहे थे लेकिन स्पीकर ने उन्हें ऐसा करने को रोक दिया। सवाल जिम्मेदारी का था। जाहिर है किसी टेप का सही और गलत होना राहुल गांधी तय नहीं कर सकते, इसलिए वह जिम्मेदारी लेने की बात पर चुप रह गये। मगर, यह मुद्दा यहीं पर थमने वाला नहीं है।

राफेल का गोवा कनेक्शन
राफेल के गोवा कनेक्शन मामले में परिस्थितिगत सबूत मौजूद हैं। एक बीमार मुख्यमंत्री अपने घर को अस्पताल बनाकर और अस्पताल से शासन चला रहे हैं और बीजेपी नेतृत्व लाचार है। पहले ऐसा लगता था कि बीजेपी मनोहर पर्रिकर पर अत्याचार कर रही है, मगर अब टेप के खुलासे के बाद लगता है कि मनोहर पर्रिकर ही बीजेपी को लाचार बनाए हुए हैं। जिस तरीके से गोवा ऑडियो टेप मामले में बगैर जांच के उस टेप को सत्य नहीं बताया जा सकता, उसी तरीके से बगैर जांच के उसे असत्य या डॉक्टर्ड नहीं बताया जा सकता। संबंधित पक्ष को जरूर ऐसा कहने का अधिकार है और रहेगा।

राफेल मुद्दे पर बीजेपी के बचाव में रहा है ‘लोचा’
राफेल मुद्दे पर बीजेपी ने जो भी बचाव पेश किया है उसमें लोचा रहा है। प्रधानमंत्री और वित्तममंत्री ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर प्रक्रिया में बेईमानी के आरोप को खारिज किया। मगर, दुनिया जानती है कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने सीलबंद लिफाफे में जो तथ्य दिए, उसे गलत तरीके से समझे जाने की बात खुद सरकार ने कही। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बातें कही थीं कि वह प्राइसिंग पर कुछ नहीं बोल सकती, सौदे की प्रक्रिया पर कुछ नहीं बोल सकती...वगैरह-वगैरह।

राफेल पर भारत-फ्रांस की पूर्व और वर्तमान शासकों का रुख अलग-अलग
राफेल डील पर दो पक्ष हैं भारत और फ्रांस। भारत और फ्रांस की दोनों पूर्व सरकारों से जुड़े लोग, चाहे वे फ्रांसीसी पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद हों या कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी, इस डील पर उंगली उठा रहे हैं। वहीं दोनों ही वर्तमान सरकारें इस डील को सही ठहरा रहे हैं। द शॉ और उनके ऑफ सेट पार्टनर अनिल अम्बानी तो इसे सही ठहराएंगे ही। ऐसे में रास्ता क्या बचता है?

बहस की चुनौती क्यों नहीं स्वीकार कर रहे हैं नरेंद्र मोदी?
क्यों नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राहुल गांधी की बहस की चुनौती को स्वीकार करते हैं? क्यों नहीं सरकार राफेल मामले में जेपीसी की मांग को मान रही है? क्या राहुल गांधी की समझ पर सवाल उठाकर राफेल से जुड़े सवालों को क्या दबाया जा सकता है? अगर राफेल पर ललकार रहे हैं राहुल गांधी, तो नरेंद्र मोदी बहस से भाग क्यों रहे हैं?
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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