Khalistan Movement: खालिस्तान आन्दोलन को फिर से हवा किसने दी?
कश्मीर को भारत से अलग करने की अपनी योजना विफल होने के बाद पाकिस्तान ने अपना पूरा ध्यान पंजाब में भारत विरोधी माहौल बनाने में लगा दिया है। इस काम में विदेशों में रह रहे अनेक सिख भी पाकिस्तान के इशारे पर सहयोग कर रहे हैं।

Khalistan Movement: खालिस्तान का आन्दोलन फिर से शुरू होना देश के लिए एक नई चुनौती है| अमृतपाल सिंह नाम के एक अराजकतावादी को भिंडरावाले-2 कहा जा रहा है। उसके तार पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई से जुड़े हैं, जो जम्मू कश्मीर से 370 हटने के बाद से खालिस्तान आन्दोलन को हवा दे रही है| 18 मार्च को पंजाब पुलिस की भारी नाकेबंदी के बावजूद अमृतपाल भाग जाने में सफल हो गया है। हालांकि पंजाब में कोई भी पुलिस की इस थ्योरी को मानने को तैयार नहीं कि वह भारी नाकेबंदी के बावजूद फरार हो गया|

लोगों का मानना है कि जिस तरह ज्ञानी जैल सिंह के कार्यकाल में भिंडरावाले को सरकारी संरक्षण था, उसी तरह अमृतपाल सिंह को भी संरक्षण दिया गया| हालांकि केंद्र सरकार के दवाब में उसके सवा सौ के करीब समर्थकों को जरुर गिरफ्तार किया जा चुका है| हो सकता है कि अमृतपाल किसी गुरूद्वारे या स्वर्ण मन्दिर में ही छिप गया हो| हालांकि अमृतपाल सिंह के पिता का दावा है कि वह पुलिस की गिरफ्त में है|
1978 में शुरू हुए खालिस्तान आन्दोलन को सशस्त्र आन्दोलन बनाने वाले संत जरनैल सिंह भिंडरावाले की हिंसा से बदहाल पंजाब को बचाने के लिए 1984 में इंदिरा गांधी ने स्वर्ण मन्दिर में सेना भेज कर आतंकियों का खात्मा किया था| उसी के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पूर्व आर्मी चीफ जनरल ए.एस. वैद्य की भी हत्या कर दी गई थी| 1985 में राजीव लोंगोवाल समझौते के तहत खालिस्तान आन्दोलन कुछ ठंडा पड़ने की उम्मीद बनी थी, लेकिन समझौता करने वाले लोंगोवाल की एक महीने के भीतर हत्या कर दी गई|
यहाँ तक कि 1991 में राजीव गांधी की हत्या में भी खालिस्तानी जगजीत सिंह चौहान की भूमिका थी| रिपब्लिक आफ खालिस्तान के स्वयंभू राष्ट्रपति जगजीत सिंह चौहान ने राजीव गांधी की हत्या की साजिश रचने में तमिल टाइगर्स इंटरनेशनल फेडरेशन की मदद की थी| नानावती आयोग ने उसे हत्या में सह-साजिशकर्ता माना था| पंजाब के लंबे राष्ट्रपति शासन के बाद 1992 में हुए चुनावों में कांग्रेस चुनाव जीती थी| बेअंत सिंह मुख्यमंत्री बने, उन्होंने अलगाववाद के आन्दोलन पर काबू पा लिया था, लेकिन 1995 में खालिस्तानियों ने मानव बम से उनकी भी हत्या कर दी थी|
पंजाब में यह आखिरी बड़ी आतंकवादी वारदात थी| इसके बाद खालिस्तान का आन्दोलन कनाडा से चल रहा निर्वासित सिखों का आन्दोलन ही बन कर रह गया था, जिसे भारत के सिखों का समर्थन नहीं था| अमेरिका के सिख नागरिक गुरपतवंत सिंह पन्नू ने जगजीत सिंह चौहान की मृत्यु के बाद 2007 में सिख फार जस्टिस नाम से नया संगठन खड़ा किया था, लेकिन जम्मू कश्मीर से 370 हटाए जाने तक इस सगंठन ने अखबारी बयानबाजी और कोरी धमकियों के अलावा कुछ नहीं किया था|
जम्मू कश्मीर से 370 हटने के बाद से कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया से खालिस्तान समर्थकों की गतिविधियाँ बढ़नी शुरू हुई| अब तो खालिस्तानियों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की धमकियां दी जा रही हैं। हाल ही में उनके गुजरात दौरे से पहले 8 मार्च को लाखों गुजरातियों को वीपीएन नंबर से मोदी की हत्या की धमकी भेजी गई थी| सिख फार जस्टिस ने 2020 में खालिस्तान के लिए रेफरंडम अभियान शुरू किया| रेफरंडम अभियान के बाद अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, कनाडा ही नहीं, बल्कि भारत के पंजाब में भी खालिस्तानियों का जमावड़ा बढ़ता देखा गया|
जम्मू कश्मीर से 370 हटाए जाने के बाद पिछले तीन साल में अब खालिस्तान आन्दोलन को पंजाब में फिर से जिंदा करने की कोशिशें चल रही हैं| वर्ष 2020 में नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ चले आन्दोलन और बाद में 2021 के किसान आन्दोलन को खालिस्तानियों के समर्थन के सबूत सामने आए थे| इन दोनों ही आंदोलनों को विदेशों से फंडिंग हुई थी। किसान आन्दोलन के समय लाल किले पर खालिस्तानी झंडा फहराया जाना इसका ठोस सबूत है|
2022 में पंजाब विधानसभा चुनावों के समय फिरोजपुर में पंजाब सरकार की मिलीभगत से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रास्ता रोककर खालिस्तानियों ने पहली बार अपनी ताकत दिखाई थी| जबकि उस समय की कांग्रेस सरकार ने इसे किसानों की ओर से रास्ता रोकना बताया था। लेकिन सिख फार जस्टिस के गुरपतवंत सिंह ने अमेरिका से वीडियो जारी करके कहा था कि नरेंद्र मोदी का रास्ता खालिस्तान समर्थकों ने रोका| पंजाब में खालिस्तान समर्थकों के फिर से सिर उठाने की दूसरी घटना तब उजागर हुई, जब हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले पंजाब से पहुंचे कुछ खालिस्तान समर्थकों ने पंजाब के इलाके वापस लेने के पोस्टर लगाए|
लाल किले पर फहराए गए खालिस्तान के झंडे की तरह अब ब्रिटेन, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और कनाडा में भारतीय दूतावासों पर लगे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज को हटा कर खालिस्तानी झंडा फहराने की घटनाएं हो रही हैं| सबसे ताजा घटना 19 मार्च की है जब पंजाब के खालिस्तानी अमृतपाल सिंह के संगठन "वारिस पंजाब दे" के खिलाफ धरपकड़ शुरू हुई| वारिस पंजाब दे संगठन की स्थापना लाल किले पर खालिस्तानी झंडा फहराने वाले एक्टर दीप सिद्धू ने की थी, जिसकी 15 फरवरी 2022 को एक रोड एक्सीडेंट में मौत हो गई थी| 29 सितंबर 2022 को खालिस्तानी जनरैल सिंह भिंडरावाले के मोगा जिले के रोडे गांव में हुए कार्यक्रम में इस संगठन की कमान अमृतपाल सिंह को सौंपी गई|
अमृतपाल सिंह को भिंडरावाला-2 कहा जा रहा है| 23 फरवरी को उसने अपने समर्थक लवप्रीत सिंह तूफान को पुलिस की गिरफ्त से छुड़वाने के लिए गुरुग्रंथ साहब के साथ अजनाला पुलिस स्टेशन पर हजारों समर्थकों के साथ धावा बोल दिया था| तब राज्य सरकार ने घुटने टेकते हुए लवप्रीत सिंह तूफान को रिहा कर दिया था|
कुछ दिन पहले तक अमृतपाल सिंह सिख भी नहीं था, वह अपने बाल कटवाता था, लेकिन अब वह पक्का खालिस्तानी बन चुका है| उसने अपने एक बयान में कहा है कि वह खुद को भारतीय नहीं मानता, वह खुद को सिर्फ पंजाबी मानता है और पुराने पंजाब के सारे हिस्से वापस चाहता है। उसने एक बयान में कहा था कि पहले भारत के पंजाबी भाषी इलाके वापस लिए जाएंगे, बाद में पाकिस्तानी हिस्से पर विचार किया जाएगा|
यही बात सिद्धू मुसेवाला के एक गीत में भी कही गई थी, जिसे उसकी हत्या के बाद जारी किया गया था। लेकिन भारी विरोध के बाद यूट्यूब ने उसे वापस ले लिया है| खालिस्तान का आन्दोलन किस तरह फिर से पंजाब में जड़ें जमा रहा है, इसका एक ताज़ा उदाहरण 19 मार्च को देखने को मिला, जब सिद्धू मूसेवाला के गाँव में उसकी बरसी मनाई जा रही थी| बड़े से स्टेज पर शबद कीर्तन चल रहा था, तभी सिद्धू मूसेवाला के पिता बलकौर सिंह के साथ उनकी मां चरण कौर स्टेज पर आई। मां ने आवाज में दम भरते हुए कहा- "मैं तां बस तुहानू इक्को ही गल्ल पूछणा चाहूंगी के साड्डा देश अजाद है या गुलाम...(मैं बस तुमसे एक ही बात पूछना चाहती हूं कि हमारा देश आजाद है या गुलाम)|" भीड़ ने जवाब दिया "गुलाम", और इसके बाद "खालिस्तान जिंदाबाद" के नारे लगने लगे| मंच से न किसी ने भीड़ को रोका, न कोई विरोध हुआ| चरण कौर फिर कहती हैं- "आप्पा किसी भूलेखे च न रहिये के अस्सी तां आजाद हो गए, अस्सी तां अज्ज वी गुलाम हां... (हमें किसी भुलावे में नहीं रहना चाहिए कि हम आजाद हो गए, हम तो आज भी गुलाम हैं)|
कुछ लोगों का मानना है कि पंजाब में सिख फार जस्टिस की गतिविधियाँ 2017 के पंजाब विधानसभा चुनावों के समय शुरू हो गई थीं। 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद पंजाब में खालिस्तान समर्थक खुल कर सामने आ चुके हैं| नवंबर 2022 में अमृतसर में धरने पर बैठे शिवसेना के नेता सुधीर सुरी की दिन दहाड़े हत्या के बाद तरन तारन से कनाडा जाकर बसे गैंगस्टर लखबीर सिंह उर्फ लांडा हरिके ने ट्विटर पर एक पोस्ट में कहा था कि यह तो सिर्फ शुरुआत है| जो सिख कौम या किसी भी अन्य धर्म के बारे में बुरा बोलते हैं, वे सभी तैयारी रखें| सभी की बारी आएगी| सिक्योरिटी लेकर यह न समझें कि बच जाएंगे| अभी तो शुरुआत हुई है, हक लेना अभी बाकी है|
सिख फार जस्टिस को भारत सरकार पहले बहुत हल्के से ले रही थी, लेकिन जम्मू कश्मीर से 370 हटाए जाने से कुछ दिन पहले ही मोदी सरकार ने जुलाई 2019 में उसे प्रतिबंधित किया| 370 हटने के बाद पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी ने सिख फार जस्टिस को अपनी फंडिंग बढ़ा दी। गुरपतवंत सिंह पन्नू ने खालिस्तान के लिए रेफरेंडम का अभियान शुरू किया, जो भारत और पाकिस्तान के पंजाब में तो नहीं, बल्कि अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में हो रहा है, जहां सिख काफी मात्रा में रहते हैं| वे आए दिन भारतीय दूतावासों और उच्चायोगों पर प्रदर्शन करते रहते हैं|
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भारत सरकार ने ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका और आस्ट्रेलिया से भी अपनी नाराजगी का इजहार किया है, जहां खालिस्तान के समर्थन में खुलेआम गतिविधियाँ चल रही हैं| एक समय में खालिस्तान आन्दोलन के अगुआ रहे जसवंत सिंह ठेकेदार ने खुलासा किया है कि सिख फार जस्टिस की ओर से विदेशों में करवाए जा रहे जनमत संग्रह के पीछे पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई का हाथ है|
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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