मुंशीगंज में नेहरू की गलती से मारे गए थे किसान, प्रियंका की जानकारी अधूरी
Priyanka Gandhi : जब से प्रियंका गांधी ने रायबरेली चुनाव की कमान संभाली है, कई बार आजादी से पहले रायबरेली के किसान आंदोलन और उसमें पंडित नेहरू की भूमिका का जिक्र कर चुकी हैं। बुधवार को उन्होंने दावा कर दिया कि कैसे अंग्रेजों ने 600 किसानों को गोलियों से भून दिया था।
रायबरेली का जलियां वाला बाग कांड कहे जानेवाले मुंशीगंज नरसंहार की याद में बने स्मारक पर पहुंचकर प्रियंका गांधी ने ट्वीट किया। प्रियंका ने लिखा, "आज से 103 साल पहले असहयोग आंदोलन के दौरान अवध में बाबा रामचंद्र और मदारी पासी जी के नेतृत्व में किसान आंदोलन चला था।

इस दौरान रायबरेली के मुंशीगंज में सैकड़ों किसानों को गोलियों से भून दिया गया। इसके बाद पंडित मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू जी रायबरेली आए थे। इस आंदोलन में ही पहली बार मोतीलाल नेहरू जी और जवाहरलाल नेहरू जी को गिरफ्तार किया गया था। उसी समय रायबरेली और अमेठी की जनता से कांग्रेस का जो रिश्ता जुड़ा वह आजतक कायम है। सेवा के सौ सालों का यह सफर आजतक जारी है"।
यह हास्यास्पद है कि जवाहरलाल नेहरु को श्रेय देने के प्रयास में प्रियंका तथ्यों के साथ छेड़छाड़ कर रही हैं। हकीकत यह है कि जवाहलाल नेहरु इस नरसंहार के बाद वहां नहीं पहुंचे थे बल्कि उस नरसंहार के वक्त वो वहीं पर थे। जवाहर लाल नेहरू ने खुद अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वो न केवल वहां मौजूद थे बल्कि किसानों की भीड़ उन्हीं के चलते वहां इकट्ठा हुई थी। पुलिया के एक तरफ फायरिंग होती रही और दूसरी तरफ नेहरूजी किसानों को समझाते रहे, लेकिन फायरिंग रुकवाने के लिए आगे नहीं बढ़े।
घटना के मूल में नेहरूजी की किसान नेता बनने की इच्छा बताई जाती है। 1920 में प्रतापगढ में जब कुछ किसानों को गिरफ्तार किया गया तो किसानों ने अदालत में धावा बोल दिया था। वो हजारों की संख्या में आ गए और मजिस्ट्रेट ने सुनवाई टाल दी। फिर किसानों ने जेल को घेर लिया, आखिरकार प्रशासन को किसान नेताओं को छोड़ना पड़ा था। इस मामले में कामयाब होकर उन किसान नेताओं ने जनवरी 1921 की शुरूआत में रायबरेली के एक मामले में भी वही रणनीति अपनाई। इस बार जवाहर लाल नेहरू को भी बुलाया गया और उनकी सभा के लिए हजारों की संख्या में किसान पहुंच गए। लेकिन इस बार ब्रिटिश सरकार भी तैयार थी। बड़ी संख्या में मिलिट्री मंगा ली गई थी।
जवाहर लाल नेहरू स्टेशन पर उतरे तो उन्हें पता चला कि किसान नेताओं को शहर के बाहर सई नदी पर ही रोक लिया गया है। नेहरू वहीं पहुंचे। मुंशीपुलिया पर पहुंचते ही उनको वहां के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट का पत्र मिला कि 'गो बैक'। लेकिन नेहरु वहीं रुक गए। नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि दूसरी तरफ से फायरिंग की आवाज आ रही थी। वह वहीं थोड़ी देर रुके तो डरे हुए किसानों ने उन्हें घेर लिया, जो अब तक नदी के किनारे खेतों में छुपे हुए थे।
नेहरू ने लिखा है कि कुछ हजार किसान थे। वहीं सभा शुरू हो गई और दूसरी तरफ फायरिंग हो रही थी। मीटिंग काफी कामयाब रही, किसानों का डर काफी हद तक उन्होंने दूर कर दिया था। फिर डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट फायरिंग लाइन से लौटा और नेहरु को अपने साथ अपने घर ले गया। जवाहर लाल आगे लिखते हैं, "मैंने पाया कि उस गोलीबारी में कई लोग मारे गये थे। किसानों ने पीछे हटने या लौटने से मना कर दिया था। इसके अलावा सबकुछ बहुत शांतिपूर्ण था।"
जवाहरलाल ने बस इतना लिखा कि कई किसान मारे गए थे। संख्या नहीं दी। लेकिन उनके अखबार नेशनल हेराल्ड ने कई दशक बाद लिखे गए लेख में ये संख्या 13 बताई है। अखबार ने कहां से ये आंकड़ा लिया उसने नहीं बताया। हकीकत तो गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार 'प्रताप' ने बताई थी कि सैकड़ों किसान मारे गए थे। जवाहरलाल नेहरू ने तो पूरी कहानी भी नहीं लिखी। कहानी की शुरूआत इस अफवाह से हुई कि लखनऊ जेल में दो किसानों की मौत हो गई है। विरोध स्वरूप मुंशीगंज की सई नदी के एक छोर पर विशाल किसान सभा के आयोजन की घोषणा की गयी जिसमें नेहरू के आने के सूचना पाकर हजारों किसान जुट गये थे।
वहां वीरपाल नाम के तालुकदार ने एक किसान पर गोली चला दी। वहां मौजूद मिलिट्री ने इसे ऑर्डर माना और फायरिंग शुरू कर दी। इसी दौरान वहां जवाहर लाल नेहरू पहुंचे। अगर वो हिम्मत करके फायरिंग वाली जगह की तरफ बढ़ते तो सैकड़ों किसानों की जान बच जाती लेकिन वो तो फायरिंग की आवाज सुनते रहे और किसानों को समझाते रहे। उसके बाद डीएम के साथ उसके घर चले गए। क्या गांधीजी या पटेल होते तो ऐसा ही करते?
गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार 'प्रताप' के दावे और तमाम स्थानीय रिपोर्ट्स के आधार पर किसानों की मौत का आंकड़ा 750 माना जाता है। आज प्रियंका गांधी जिस केस में मोतीलाल नेहरु को जेल होने का झूठ बोल रही हैं, सच्चाई तो यह है कि इसी मामले में केस होने पर मोतीलाल नेहरू के अखबार ने माफी तक मांग ली थी। लेकिन गणेश शंकर विद्यार्थी ने माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया था और उन्हें जेल जाना पड़ा था।
मुंशीपुलिया पर किसानों का नरसंहार जवाहर लाल नेहरू की आंखों के सामने हो रहा था। इतिहास के किसी कोने में खो चुके इस नरसंहार को मुंशीगंज किसान नरसंहार के नाम से जाना जाता है। लेकिन ताज्जुब की बात है कि जहां जवाहरलाल नेहरु के सामने ही 600 लोगों को गोलियों से भून दिया गया था, दशकों तक कांग्रेस सरकारें रहीं लेकिन कभी भी इसे जलियांवाला बाग घटना जैसा महत्व नहीं दिया।
असल में अवध के क्षेत्र में किसानों में जवाहर लाल नेहरू की रुचि बाबा रामचंद्र की वजह से पैदा हुई। फिजी में एक मजदूर की तरह ले जाए गए महाराष्ट्र के बाबा रामचंद्र ने लौटकर अवध के रायबरेली, प्रतापगढ़ और फैजाबाद में 1920 में किसानों को संगठित करने के लिए काम करना शुरू किया था। नेहरू की सभाओं में जब भी हजारों किसानों की भीड़ जुटी, वह बाबा रामंचद्र की वजह से थी। नेहरू ने पाया कि 'सीता राम' जैसे सामान्य अभिवादन को बाबा रामचंद्र ने एक आंदोलन का हथियार बना दिया है। नेहरू को लगता था कि बाबा रामचंद्र ने ये क्षेत्र भी इसीलिए चुना था क्योंकि यहां कभी अयोध्या के राजा राम का राज था।
बाबा रामचंद्र की इस क्षमता को जानते हुए भी नेहरु उन्हें कम पढा लिखा और जिम्मेदारियों से भागने वाला मानते थे। असल में बाबा रामचंद्र खुद नेता बनने की बजाय लोगों को आगे बढाते थे जो नेहरु को पसंद नहीं था। इसलिए अपनी आत्मकथा में उन्होंने बाबा रामचंद्र के बारे में यहां तक लिखा कि 'बाद के दिनों में वो (बाबा रामचंद्र) गैरजिम्मेवार और अविश्वसनीय व्यक्ति हो गये थे। संभव है बाबा रामचंद्र की नेहरु में ही कोई रुचि न रही हो लेकिन आज नेहरु वंश की ही प्रियंका गांधी बाबा रामचंद्र को अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन का मसीहा बताकर गलती सुधार रही हैं।
जो भी हो लेकिन मुंशीगंज नरसंहार के घाव कुरेदने वाली प्रियंका गांधी से अब जनता पूछ सकती है कि नेहरू की आंखों के सामने इतना बड़ा नरसंहार हुआ तो जलियां वाला बाग की तरह हमको उन शहीद किसानों के बारे में पढ़ाया क्यों नहीं जाता? इतने दशकों तक इसे छुपाया क्यों गया? आज अगर उसकी याद उन्हें आ रही है तो क्या वो किसान आंदोलन और नरसंहार के वक्त नेहरु की मौजूदगी का सच स्वीकार करने के लिए तैयार हैं?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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