प्रियंका के पहले भाषण और ट्वीट के मायने, गांधी मार्ग ही है मोदी मार्ग का जवाब

नई दिल्ली। प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपने राजनीतिक जीवन का पहला भाषण महात्मा गांधी की धरती गुजरात में दिया। दांडी यात्रा के 89 साल बाद साबरमती आश्रम पहुंचकर प्रियंका ने अपने राजनीतिक करियर को नया मुकाम देने की कोशिश की। प्रियंका का पहला ट्वीट भी गांधीजी को समर्पित रहा। उन्होंने गांधीजी के संदेश से अपने वैयक्तिक सोच और कांग्रेस के सिद्धांत को जोड़ने की भी कोशिश की। प्रियंका का संदेश साफ है- बीजेपी और नरेंद्र मोदी की राजनीति का मुकाबला महात्मा गांधी के आदर्शों से ही किया जा सकता है।

प्रियंका ने तीन तरीके से रखी बात

प्रियंका ने तीन तरीके से रखी बात

यह तथ्य प्रियंका गांधी ने तीन तरीके से देश का बता दी है- एक, उन्होंने राजनीतिक भाषण के लिए गुजरात को चुना। दूसरा भाषण का कथ्य और तथ्य महात्मा गांधी के आदर्शों को रखा। न सिर्फ रखा, बल्कि उसके आईने में अपने राजनीतिक विरोधियों को परखने की कोशिश दिखलायी। तीसरा, अपने ट्वीट्स में भी साबरमती की सच्चाई और अहिंसा को समर्पित महात्मा गांधी के विचारों की ओर देश का ध्यान दिलाया।

सादगी के पैमाने पर गांधी के बहाने मोदी

सादगी के पैमाने पर गांधी के बहाने मोदी

बात ट्वीट से ही बढ़ाते हैं। अहमदाबाद में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में शामिल होने के बाद प्रियंका गांधी ने कहा, साबरमती की सादगी में सत्य जीवित है। साबरमती, सादगी और सत्य इन तीनों बातों का गहरा संबंध महात्मा गांधी से रहा है। प्रियंका ने इस ट्वीट के माध्यम से बताना चाहा है कि साबरमती और गुजरात से जुड़कर कोई व्यक्ति सादगी को छोड़ दे या फिर सत्य के मार्ग से भटक जाए, ऐसा नहीं हो सकता। यह संदेश पढ़ते ही पाठक के जेहन में एक तरफ इंग्लैंड में पढ़े लिखे गुजरात के महात्मा गांधी की याद हो आती है जिन्होंने चमक-धमक और कोट-टाई की ज़िन्दगी का त्याग करते हुए मामूली धोती में जीवन गुजार दिया। वहीं खुद को चायवाला कहते हुए गुजरात के ही आधुनिक नेता नरेंद्र मोदी का अक्श भी बरबस खिंच जाता है।

गांधीजी ने सत्य को हमेशा मार्गदर्शक रखा। भारत का बंटवारा होने के बावजूद पाकिस्तान को उसका हक मिले, इसके लिए गांधीजी ने अनशन किया। उन्होंने सांप्रदायिक दंगे को रोकने के लिए कई बार खाना-पीना छोड़ दिया। उनके अनशन ने जादू दिखलाया और लोगों ने सांप्रदायिकता की राह छोड़कर शांति की राह पकड़ ली। वहीं, नरेंद्र मोदी की राह अब तक बिल्कुल जुदा नज़र आयी है।

अहिंसा के बहाने मोदी मार्ग का विरोध

अहिंसा के बहाने मोदी मार्ग का विरोध

प्रियंका ने दूसरे ट्वीट में बात को और भी साफ करते हुए लिखा, अगर हिंसा के मकसद में कुछ अच्छा दिखता है तो वह अस्थायी है। हिंसा में हमेशा बुराई ही होती है। इशारा बिना कहे हुए सर्जिकल स्ट्राइक और एअर स्ट्राइक की ओर है। मतलब साफ है कि ऐसे हथकंडों से जिसमें हिंसा हो, कोई लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। प्रियंका ने अपने भाषण और ट्वीट दोनों में गांधी के बहाने बीजेपी और मोदी पर निशाना साधा हैं। आज़ादी के संघर्ष की शुरुआत जिस साबरमती आश्रम से हुई, वहां जाकर प्रियंका ने बताया कि उन्हें लगा कि उनकी आंखों में आंसू आने वाले हैं। उन्होंने कहा कि यह देश प्रेम, सद्भाव और आपसी प्यार के आधार पर बना है। इसलिए आज जो कुछ देश में हो रहा है उससे दुख होता है। जाहिर है उन्होंने बगैर नाम लिए ही मोदी सरकार को दुख की वजह बता डाला।

वोटरों को फिजूल के मुद्दों से बचने, सही मुद्दे पर अड़ने की सलाह

वोटरों को फिजूल के मुद्दों से बचने, सही मुद्दे पर अड़ने की सलाह

चुनाव की बेला में प्रियंका ने राजनीति में कदम रखा है। लिहाजा उन्होंने बदलाव के लिए वोट की अहमियत पर भी जोर दिया। वोट को हथियार बताया। ऐसा हथियार, जो बगैर चोट पहुंचाए, नुकसान किए वोटर को ताकतवर बनाता है।प्रियंका गांधी ने फिजूल के मुद्दे नहीं उठने देने की अपील कर वास्तव में मोदी की सियासत पर हमला बोला है। इसके साथ ही उन्होंने वो मुद्दे भी वोटरों को थमाने की कोशिश की है जो मोदी सरकार के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं। इनमें रोज़गार, महिला सुरक्षा, आगे बढ़ने जैसी बातें शामिल हैं।

जागरूकता को देशभक्ति बताकर अंधराष्ट्रवाद का विरोध

जागरूकता को देशभक्ति बताकर अंधराष्ट्रवाद का विरोध

प्रियंका ने जागरूकता पर बहुत ज़ोर दिया है। इसकी वजह भी है। वे झूठे वायदों से भी जागरूक रहने को कहती हैं और पुराने वादों के पूरा होने, न होने को लेकर भी सजग रहने की ज़रूरत बताती हैं। वे जानने को कहती हैं कि दो करोड़ रोज़गार का क्या हुआ?, 15 लाख रुपये का क्या हुआ?, महिलाओं की सुरक्षा का क्या हुआ? प्रियंका ने जागरूकता को देशभक्ति से जोड़कर भी वर्तमान माहौल में अंधराष्ट्रवाद पर करारा प्रहार किया है। वे नफरत की हवाओं को प्रेम एवं करुणा में बदलने को ही देश की फितरत बताते हुए नरेंद्र मोदी पर करारा प्रहार करती हैं। नरेंद्र मोदी ने कहा था कि यह उनकी फितरत है कि वे किसी को छोड़ते नहीं हैं। चुन-चुन कर बदला लेते हैं। संस्थाओं के नष्ट होने और नफ़रत फैलाने के माहौल की चर्चा करते हुए वह वोटरों से सही निर्णय लेने के लिए कहती हैं, सही सवाल करने के लिए कहती हैं। वक्त की नजाकत का महत्व बताते हुए प्रियंका गांधी वर्तमान चुनाव को आज़ादी की लड़ाई से कम नहीं मानतीं। मतलब साफ है कि हार-जीत की परवाह किए बगैर प्रियंका ने सत्य और अहिंसा के साथ गांधीवादी मार्ग पर सियासत पर आगे बढ़ने का इरादा दिखाया है। वास्तव में मोदी मार्ग का जवाब गांधी मार्ग ही है।

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