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बेटियों की प्रतिभा के बजाय सुन्दरता देखने की मानसिकता

Prachi Nigam: हर हाथ में मौजूद स्मार्ट गैजेट्स और तकनीकी सुविधाओं ने यूजर्स को इतना निष्ठुर कर दिया है कि चर्चित चेहरों के ही नहीं आम लोगों के व्यक्तिगत जीवन में भी मीनमेख निकालने लगे हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश 10वीं बोर्ड की टॉपर प्राची निगम को उनके लुक को लेकर सोशल मीडिया पर खूब ट्रोल किया गया।

ज्ञात हो कि यूपी बोर्ड 10वीं परीक्षा 2024 के परिणामों में सीतापुर की प्राची निगम पूरे प्रदेश में अव्वल रही है। दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा कि एक छात्रा द्वारा हासिल किए गए अंक, साल भर की मेहनत और अकादमिक प्रतिबद्धता पर ध्यान देने के बजाय समाज के एक बड़े तबके ने अजीबो-गरीब बातें सोशल मीडिया मंच पर लिखना शुरू कर दिया।

prachi nigam

परीक्षा में सफलता के लिए जिस बिटिया की सराहना की जानी चाहिए थी, लोग उसके चेहरे में मीनमेख निकालने लगे। 'अरे ! इसके चेहरे पर तो बाल हैं।' 'यह लड़की कैसे हो सकती है ?' 'इसकी शक्ल तो लड़कों वाली है।' और न जाने क्या क्या? उसके चेहरे पर दिख रहे बालों को लेकर मजाक बनाने वाले मीम्स, कमेंट्स और पोस्ट्स सोशल मीडिया पर छा गए।

हालांकि बहुत से लोगों ने उपहास उड़ाने की इस प्रवृत्ति का विरोध भी किया पर सवाल यह है कि अपनी मेहनत से पाई कामयाबी की खुशी में एक परिवार को आहत करने वाली बातें हुई ही क्यों? किसी के व्यक्तिगत जीवन पर टीका-टिप्पणी करने का यह अमानवीय बर्ताव आखिर क्यों और कैसे जड़ें जमा रहा है?

जिस देश में आज भी दूर-दराज़ के हिस्सों में लड़कियों का स्कूल तक पहुँचना आसान नहीं वहाँ एक बेटी का अव्वल आना कितने ही परिवारों के लिए प्रेरणादायी बनता है। विडम्बना ही है कि एक ओर तकनीकी से मिली सुविधाएं बेटियों की राह आसान बना रही हैं तो उसी तकनीकी से ही मिले सोशल मीडिया मंचों पर होने वाली अर्थहीन बहसें जाने कितनी ही महिलाओं और बच्चियों को खुद तक सिमटकर रहने के हालात बना रही हैं।

तभी तो बोर्ड परीक्षा में टॉप करने वाली एक बिटिया के अंक और काबिलियत देखने के बजाय लोगों ने उसके चेहरे को लेकर ही वर्चुअल मीडिया में चर्चा की, जबकि देखा जाए तो किशोरावस्था की यह उम्र बहुत शारीरिक बदलावों को साथ लाने वाला आयुवर्ग है। प्यूबर्टी के इस पड़ाव पर असंतुलित हार्मोन्स के कारण बच्चियों में शारीरिक और मानसिक मोर्चे पर कई बदलाव आते हैं। लड़के हों या लड़कियां, शारीरिक संरचना से लेकर विचार-व्यवहार तक, बच्चों का मन-जीवन कई तरह के बदलावों से गुजरता है। इन सभी बदलावों की एक सहज स्वीकार्यता होनी चाहिए। हार्मोन्स के परिवर्तन के इस दौर को खुद बच्चों, परिजनों और परिवेश में जुड़े अपने-पराये लोगों, सभी को बेहद सहजता से ही लेना चाहिए।

दुखद है कि ऐसा ना करते हुए एक तस्वीर भर देखकर लोगों ने प्राची और उसके परिवार को ठेस पहुँचाने वाली चर्चा छेड़ दी। इस चर्चा से जुड़ा चिंतनीय पक्ष यह भी यह है कि ट्रोलर गैंग की यह विकृत मानसिकता बड़े होते बच्चों को सुंदरता और बाजार के जाल में फँसाने के मार्ग पर ले जाने वाली है। इस बिटिया की बेवजह हुई ट्रोलिंग के बाद जाने कितने ही बच्चे अपने लुक्स को लेकर सतर्क हो जाएंगे। पल-पल एक गैर-जरूरी मानसिक दबाव को जीने लगेंगे। अपनी ऊर्जा अकादमिक बेहतरी के बजाय दिखावटी सज-धज में लगाने वाली सोच के जाल में फंस जाएंगे।

सोशल मीडिया की चमक-दमक और बाजार की रणनीतियों के चलते पहले से ही बच्चे और किशोर खुद के निखार-संवार के जाल में फंस रहे हैं। ऐसी चर्चाएँ तो खेलने-कूदने और पढ़ने-गुनने की उम्र में बनवाटी-सजावटी व्यक्तित्व पाने की सोच को और बढ़ावा देने वाली ही साबित होंगी। शारीरिक सौंदर्य के एक खाँचे के अनुरूप ढलने की यह सोच कुछ समय पहले राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीइआरटी) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में भी समाने आई थी।

अध्ययन बताता है कि देश के 45 प्रतिशत बच्चे अपनी शारीरिक संरचना से खुश नहीं हैं। नई पीढ़ी की एक बड़ी आबादी अपने वजन, रंग-रूप और ऊंचाई को लेकर हीन भावना से ग्रस्त है। यह बात अभिभावकों के लिए भी चिंता का सबब है और सामाजिक परिवेश के लिए भी। साथ ही मनःस्थिति के इसी मोड़ पर बाज़ार की रणनीति भी बच्चों को घेरती है।

किशोरवय विद्यार्थियों में सौंदर्य संवर्धन से लेकर वजन घटाने और शारीरिक सौष्ठव के नाम पर अजब-गजब खान-पान अपनाकर बलिष्ठ बनने से जुड़े उत्पादों का प्रयोग और सेवन बढ़ जाता है। तकलीफदेह है कि खुद को सुंदरता की एक तयशुदा छवि में ढालने के फेर में बच्चे गलतियों के कुचक्र में फँस जाते हैं। शारीरिक संरचना को लेकर खुद को कमतर आंके जाने के माहौल में कई किशोरवय लड़के-लड़कियां दुबले होने, रंग गोरा करने यहाँ तक कि नैन-नक्श जैसी बातों को लेकर सेहत को नुकसान पहुँचाने वाले तरीके अपना लेते हैं। इतना ही नहीं शारीरिक संरचना में औरों से पीछे छूट जाने का भाव उनमें ईर्ष्या और अवसाद जैसे नकारात्मक भावों को भी जन्म देता है।

सवाल यह है कि एक बिटिया के चेहरे को लेकर यूं मीनमेख निकालने वाली यह बहस हुई ही क्यों? इस प्रश्न का उत्तर तलाशते हुए लगता है कि अब लोग फिल्टर्ड चेहरे देखने के आदी हो गए हैं। सोशल मीडिया में आए दिन दिखते नए अवतारों और नकली सजधज ने लोगों में असली चेहरे देखने की स्वीकार्यता ही खत्म कर दी है। तस्वीरों की दुनिया के आभासी संसार में कोई अपने असल रंग-रूप में नहीं दिखना चाहता।

दुखद है कि इस मानसिकता ने हर उम्र के लोगों को अपने व्यक्तित्व के प्रति सहज रहने के बजाय असहज बना दिया है, जबकि खुद के प्रति स्वीकार्यता की सोच अपने अस्तित्व की चेतना को मान देने से जुड़ी है। यह आत्मविश्वास की कुंजी है। वैचारिक स्तर पर बेहतर इंसान बनने का मार्ग सुझाती है। जबकि वर्चुअल दुनिया में शारीरिक छवि को लेकर भी एक दूसरे की बराबरी करने और कमतरी की अनुभूति को बढ़ाने की स्थितियाँ बन गई हैं। ऊपर से तकनीक ने तस्वीरों में रंग-रूप बदलने की ढेर सारी सुविधाएं भी उपलब्ध करवा दी हैं। जिसके चलते तकनीकी सुविधाओं के रूप में मिला नकली रूप-रंग मानसिक तनाव का कारण बन रहा है, जो कहीं ना कहीं मानसिक व्याधियों का शिकार बनाने वाला है।

विशेषकर महिलाएं नकली सजा-सज्जा के इस घेरे में सबसे ज्यादा फंस रही हैं। मनमाने सौंदर्य मानकों के अनुरूप अपनी तस्वीरें तैयार कर आभासी मंचों पर साझा कर रही हैं। अधिकतर यूजर्स फिल्टर इस्तेमाल कर सुंदर बनाई छवियों को देखने के अभ्यस्त हो चले हैं। लोग भूल ही गए है कि किसी चेहरे में कोई कमी भी हो सकती है। मनोवैज्ञानिक रूप से बीमार करने वाला यह बर्ताव ही तो इस प्राची से जुड़ी बहस में सामने आया है, जो कहीं न कहीं सौंदर्य संवर्धन के मनोवैज्ञानिक जाल में फंसाने वाला व्यवहार है।

सोशल मीडिया की इस ट्रोलिंग के बाद प्राची ने दृढ़तापूर्वक कहा है कि 'ट्रोलर्स को उनकी सोच मुबारक, सफलता ही मेरी पहचान है। मेरा लक्ष्य परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन करना था। इसलिए कभी रूप-रंग पर ध्यान ही नहीं गया। कभी किसी ने टोका भी नहीं। स्कूल से लेकर घर व दोस्तों ने भी हमेशा पढ़ाई पर ही बात की।' असल में देखा जाये तो यह उम्र चेहरे को नहीं अपने गुणों को निखारने की उम्र है। जरूरी है कि देश एक हर हिस्से में बसे किशोरवय बच्चे सुंदरता के मोर्चे पर अपनी निखार-संवार के बजाय भविष्य को सँवारने का मार्ग पकड़ें।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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