Pakistan: पाकिस्तान में सदर ए रियासत की सियासत
पाकिस्तान में हाल ही में दो नये कानून पास हुए और उन कानूनों के तहत तुरंत कार्रवाइयां भी शुरू हो गई। इन्हीं कानूनों के तहत पूर्व विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी और पीटीआई के पूर्व सेक्रेट्री जनरल असद उमर गिरफ्तार करके जेल भी भेज दिए गए। अब अचानक पाकिस्तान के सदर आरिफ अल्वी यह कह रहे हैं कि उन्होंने तो उन कानूनों पर साइन ही नहीं किया है तो फिर उस कानून के तहत कार्रवाई कैसे हो सकती है? सदर अल्वी के इस कथित खुलासे से पाकिस्तान में राजनीतिक भूचाल तो आया ही है, साथ ही सदर (राष्ट्रपति) के चरित्र पर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
सदर आरिफ अल्वी ने 20 अगस्त को ट्वीटर को इंटरव्यू देते हुए यह कहा कि उनका खुदा गवाह है कि उन्होंने आफिशियल सीक्रेट एक्ट और पाकिस्तान आर्मी एक्ट पर दस्तखत नहीं किए हैं, बल्कि उन्होंने तो दोनों विधेयकों को सरकार को वापस लौटा देने के लिए अपने मातहत अधिकारियों को कहा था, क्योंकि वह कुछ प्रावधानों से सहमत नहीं थे। पर उनके मातहत अधिकारियों ने उनके साथ धोखा किया और विधेयकों को वापस नहीं किया और वे कानून बन गए।

पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 75 के तहत पार्लियामेंट से पास किए गए विधेयकों पर राष्ट्रपति की संस्तुति लेने के लिए 10 दिन का समय किया गया है। इस अवधि में या तो राष्ट्रपति अपनी सहमति देकर कानून बनाने की इजाजत दे देेते हैं या फिर अपनी असहमति दर्ज कराकर विधेयक को वापस सरकार के पास भेज देते हैं। यदि 10 दिन के बाद भी कोई संदेश राष्ट्रपति भवन से नहीं आता तो वह विधेयक पास मान लिया जाता है और कानून बन जाता है। पर इस मामले में तो सदर अल्वी ने हद ही कर दी।
उन्होंने अपने हस्ताक्षर से विधेयक बन जाने की मीडिया में आई खबरों पर 24 घंटे तक कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दी। पीटीआई से संबद्ध दो वरिष्ठ नेताओं की आफिशियल सीक्रेट एक्ट के तहत गिरफ्तारी हो गई, फिर भी वह चुप रहे और फिर उन्होंने दो दिन बाद ट्वीटर के जरिए दावा किया कि उनका जाली हस्ताक्षर किया गया और विधेयक पर उनकी आपत्ति नहीं भेजी गई। पीटीआई से संबद्ध दोनों नेता कथित अमेरिकी साइफर का उपयोग राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किए जाने के आरोप में जेल में हैं।
सदर के स्पष्टीकरण के बाद बवाल मचना तय था। आनन फानन में निगरा हुकूमत में कानून मंत्री मोहम्मद इरफान असलम और सूचना एवं प्रसारण मंत्री मुर्तजा सोलंगी ने एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस आयोजित करके दावा किया कि 10 दिन की मियाद के अंदर राष्ट्रपति भवन से दोनों में किसी विधेयक पर कोई लिखित सुझाव या संशोधन का प्रस्ताव नहीं आया, इसलिए संविधान के प्रावधान के अनुसार दोनों विधेयक कानून बन गए। अब इसमें किसी प्रकार के विवाद की कोई संभावना नहीं है। हालांकि निगरा हुकूमत ने इस संबंध में राष्ट्रपति के खिलाफ कोई प्रतिकूल प्रक्रिया अपनाने की बात नहीं की, परंतु पाकिस्तान के कानूनदानों ने अल्वी की ऐसी की तैसी कर दी।
पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष यासीन आजाद ने कहा कि यह कल्पना के परे है कि ऐसे गंभीर मामले में सदर अल्वी इतनी गैर जिम्मेदारी दिखाएंगे और सोशल मीडिया के जरिए इस बात को जाहिर करेंगे। उनसे यह उम्मीद है कि इस मामले में वह कोई जांच बिठाएंगे और कथित धोखाधड़ी को उजागर करेंगे। वह आखिर इतने समय तक चुप कैसे रहे, जबकि मीडिया में पिछले शनिवार से ही दोनों विधेयकों पर उनकी मंजूरी की खबर चल रही है। आजाद ने यहां तक कहा कि सदर अल्वी ने सोच समझ कर यह विवाद उत्पन्न किया है, उन्हें अब फौरन अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।
वैसे सदर आरिफ अल्वी अक्सर अपनी पार्टी पीटीआई के प्यार में राष्ट्रपति पद की गरिमा कम करते रहे हैं। उनके विवादित बयान और कारनामों की एक लंबी लिस्ट है। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ व उनके भाई शहबाज शरीफ खुलेआम सदर अल्वी को पीटीआई चेयरमैन इमरान खान का पिट्ठू कहते हैं। सदर अल्वी ने कई बार ऐसा करके दिखाया भी है। अप्रैल 2022 में जब इमरान खान की सरकार गिर गई और पीडीएम गठबंधन से शहबाज शरीफ को प्रधानमंत्री के लिए चुना गया तो अल्वी ने तबीयत खराब का बहाना बनाकर शहबाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने से मना कर दिया। यह सदर अल्वी ही थे, जिन्होंने इमरान खान की तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल बाजवा के साथ सुलह कराने के लिए राष्ट्रपति भवन में गुप्त बैठकें करवाई। वह अंतिम समय तक इमरान सरकार को बचाने में लगे रहे।
इमरान खान ने पाकिस्तान में जल्दी चुनाव कराने के उद्देश्य से पंजाब और खैबर पख्तुनवा की असेम्बली जनवरी 2023 में भंग करवा कर एक तरहीक चला दी। पाकिस्तान के संविधान के अनुसार असेम्बली भंग होने के 90 दिनों के भीतर चुनाव होने चाहिए। लेकिन सत्ताधारी पीडीएम कई बहाने कर चुनाव टालता रहा। चुनाव आयोग भी जल्दी चुनाव कराने में अपनी असमर्थता जताता रहा। पर सदर अल्वी ने अचानक एकतरफा 9 अप्रैल को चुनाव कराने की घोषणा कर सबको चैका दिया।
हालांकि पीडीएम ने अल्वी के सारे प्रयास को विफल कर दिया और सुप्रीम कोर्ट भी कुछ नहीं कर पाया। अप्रैल 2023 में एक और विवाद सदर अल्वी के नाम जुड़ गया। जब उन्होंने संसद से पास सुप्रीम कोर्ट (प्रैक्टिस एंड प्रोसिजर) विधेयक 2023 को लौटा दिया। इस विधेयक के जरिए शहबाज शरीफ सरकार स्वतंः संज्ञान के मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के कुछ अधिकारों में कटौती करना चाहती थी। सदर अल्वी द्वारा इस विधेयक के लौटाए जाने के बाद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने यह बयान दिया था कि सदर अल्वी ने अपने इस कदम से यह सिद्ध किया है कि वह इमरान खान के हुक्म पर काम करते हैं ना कि संविधान के रक्षक के रूप में।
डा आरिफ उर रहमान अल्वी पूरा नाम है, पाकिस्तान के इस सदर का। पेषे से दंतचिकित्सक रहे सदर अल्वी इमरान के काफी करीबी रहे हैं। बल्कि वह इमरान खान की पार्टी तहरीक ए इंसाफ के संस्थापक सदस्य रहे हैं। सितंबर 2018 में उन्हें इमरान खान की पार्टी ने ही सदर बनाया और सितंबर 2023 में उनका कार्यकाल भी पूरा हो रहा है। परंतु अगर वे इस्तीफा ना दे तो आगे भी राष्ट्रपति बने रह सकते हैं, क्योंकि इस समय पाकिस्तान में नेशनल असेम्बली और प्रोविंस ऐसम्बली भंग हो चुके हैं। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को छोड़कर पूरे पाकिस्तान में इस समय कामचलाऊ सरकारें चल रही हैं। तत्काल चुनाव होता भी दिखाई नहीं दे रहा है। नई वोटरलिस्ट से चुनाव कराए जाने के फैसले के बाद उम्मीद लगाई जा रही है कि चुनाव अगले साल मार्च में होंगे। तब तक सदर आरिफ अल्वी राष्ट्रपति के रूप में बने रहेंगे और संभवतः विवादों में भी।
बहरहाल विवाद बढ़ने पर दिखावे के लिए उन्होंने लापरवाही का बहाना बनाकर अपने सचिव को ओहदे से हटाने की सिफारिश तो की है, पर यह मामला सदर अल्वी के गले भी पड़ सकता है, क्योकि सचिव वकार अहमद ने मीडिया में पत्र जारी कर खुलासा कर दिया है कि सदर अल्वी ने ना तो विधेयकों पर हस्ताक्षर किए और ना ही निश्चित समय सीमा के भीतर उन्हें वापस लौटाने का कोई लिखित निर्देश ही दिया।
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