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Purvanchal: क्या मुख्तार की मौत प्रभावित करेगी पूर्वांचल की पॉलिटिक्स?

भारतीय समाज में कई उलटबांसियां हैं। राष्ट्रीय या प्रांतीय स्तर पर जिसकी छवि माफिया, सांप्रदायिक, गुंडा या बदमाश की होती है, जमीनी स्तर पर उसके प्रति आदर का भाव रखने वालों की अच्छी-खासी संख्या होती है। बांदा जेल में सजा काट रहे गाजीपुर के माफिया डॉन मुख्तार अंसारी की भी स्थानीय स्तर पर कुछ ऐसी ही पहचान रही है। इसलिए उसकी मौत से खुश नजर आ रहे लोगों की संख्या की बनिस्बत स्थानीय स्तर पर दुखी लोगों की संख्या भी कम नहीं है।

इसमें शक नहीं कि मुख्तार और उसके परिवार के हाथ तमाम अपराधों के रंग से रंगे हैं। लेकिन यह भी सच है कि मुख्तार एक ऐसे राजनीतिक परिवार का सदस्य रहा है, जिसका भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में स्थान रहा है। इस वजह से यह मानने वालों की संख्या भी कम नहीं है कि मौजूदा आम चुनावों में पूर्वी उत्तर प्रदेश की सीटों पर मुख्तार की मौत का असर पड़े बिना नहीं रहेगा।

Mukhtar Ansari News

मुख्तार बुनियादी रूप से भले गाजीपुर का रहने वाला हो, लेकिन उसके परिवार का प्रभाव पास-पड़ोस के जिलों मसलन बलिया, आजमगढ़, मऊ, बनारस में भी रहा है। गाजीपुर समेत इन सभी जिलों के विशेषकर मुस्लिम जनसंख्या में मुख्तार परिवार का खासा असर रहा है।

पोस्टमार्टम करने वाली डॉक्टरों की टीम के अनुसार मुख्तार की मौत हृदयाघात से हुई है। लेकिन चुनावी माहौल में मौत को लेकर स्थानीय स्तर पर कहानियां सुनी-सुनाई जा रही हैं। चूंकि कुछ दिन पहले ही मुख्तार और उसके परिवार ने अदालत में आरोप लगाया था कि जेल में मुख्तार को धीमा जहर दिया जा रहा है, लिहाजा एक वर्ग इसी थ्योरी को मानकर चल रहा है।

चुनावी माहौल में इसे विशेषकर गैरभाजपा दल प्रकारांतर से बढ़ावा भी दे रहे हैं। बेशक बांदा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने न्यायिक अधिकारी गरिमा सिंह और जिला अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल ने एडीएम वित्त और राजस्व को मुख्तार की मौत की जांच का जिम्मा सौंपा हो, लेकिन स्थानीय स्तर पर एक वर्ग यह मान चुका है कि मुख्तार को धीमा जहर देकर ही मारा गया है। मुख्तार परिवार ने स्थानीय पोस्टमार्टम की बजाय एम्स से पोस्टमार्टम कराने की मांग रखी है। इसकी वजह से भी मुख्तार परिवार के चहेतों और मुस्लिम समुदाय की ओर से आ रही प्रतिक्रियाएं भी इसी लाइन पर दिख रही हैं।

मुख्तार की मौत के बाद अल्पसंख्यक समुदाय की प्रतिक्रियाओं से जाहिर है कि आगामी चुनावों में अल्पसंख्यक वोट बैंक एक बार फिर उसी तरह गोलबंद होगा, जैसे उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में हुआ था। जिसका साथ यादव और अन्य पिछड़ा वर्ग की गैर कोइरी और नोनिया जातियों ने दिया था। इसका असर जमीनी स्तर पर साफ नजर आया।

पिछले चुनाव में पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर क्षेत्र में जहां भाजपा की लहर रही, वहीं सटे हुए आजमगढ़ और गाजीपुर में भाजपा का खाता तक नहीं खुला। बलिया में भी पार्टी की सीटें घटकर सिर्फ दो रह गईं, जबकि 2017 में बलिया में भाजपा को पांच सीटें मिली थीं। मुख्तार की मौत के बाद होने वाली गोलबंदी को समझने के लिए विशेषकर गाजीपुर, आजमगढ़, बलिया और मऊ जिलों के जातीय और धार्मिक समीकरण को देखना होगा।

गाजीपुर में करीब चार लाख यादव वोटर हैं, जबकि करीब पौने दो लाख मुस्लिम वोटर हैं। यहां भाजपा के कोर वोटर ब्राह्मणों की संख्या करीब एक लाख, क्षत्रियों की संख्या करीब पौने दो लाख और वैश्य की संख्या करीब एक लाख है। जबकि गैर राजभर और नोनिया ओबीसी की संख्या करीब तीन लाख है।

मुख्तार की मौत के बाद यहां की यादव और मुस्लिम वोटरों की गोलबंदी तेज होगी। मुख्तार की मौत के बाद गाजीपुर के सवर्णों विशेषकर भूमिहार बहुल इलाकों में हुई आतिशबाजी के चलते गैर राजभर जातियां भी विरोध में गोलबंद हो सकती हैं। भारतीय समाज अजूबा है, वह अपराधी की भी मौत पर खुलकर आतिशबाजी नहीं स्वीकार कर पाता। इसकी वजह से बीजेपी समर्थक जातियों के कुछ मतदाता बिदक जाएं तो हैरत नहीं होनी चाहिए।

गाजीपुर से सटी घोसी लोकसभा सीट है, जहां सबसे ज्यादा संख्या दलितों की है, जो करीब चार लाख हैं, मुस्लिम वोटर यहां दूसरे नंबर पर हैं, जिनकी संख्या करीब ढाई लाख है। जबकि यादवों की संख्या करीब पौने दो लाख है। यहां बीजेपी के कोर वोटर ब्राह्मणों की संख्या करीब साठ हजार, भूमिहार करीब 35 हजार, वैश्य करीब 80 हजार और मौर्य यानी कोइरी करीब 40 हजार और क्षत्रिय करीब 70 हजार है। इसी तरह चौहान एवं राजभर करीब सवा-सवा लाख है।

बगल की आजमगढ़ लोकसभा आजमगढ़ लोकसभा सीट पर यादवों की संख्या 26 फीसदी और मुस्लिम वोटरों की संख्या 24 फीसदी है यहां तीसरे नंबर पर 20 फीसदी आबादी के साथ दलित तीसरे नंबर पर हैं।

आजमगढ़ की ही लालगंज लोकसभा सीट पर मुस्लिम पंद्रह फीसद, और यादवों की संख्या भी अच्छी खासी है। हालांकि यहां सबसे ज्यादा आबादी दलित वर्ग की है। इस सीट पर बीजेपी के कोर वोटरों की संख्या करीब 35 फीसद है। गाजीपुर से सटी बलिया लोकसभा सीट पर करीब नौ फीसद ही मुस्लिम वोटर हैं। यहां करीब तीन लाख ब्राह्मण वोटर हैं, जबकि यादव, राजपूत व दलितों की संख्या करीब ढाई-ढाई लाख है।

सलेमपुर लोकसभा सीट पर सबसे ज्यादा संख्या कोइरी वोटरों की है, जो करीब दो लाख 60 हजार हैं, दूसरे नंबर पर ब्राह्मणों की संख्या है, जो करीब सवा दो लाख है। तीसरे नंबर पर करीब दो-दो लाख की संख्या के साथ दलित वोटर हैं, जबकि पौने दो लाख की संख्या में वैश्य वोटर हैं। यहां राजभर वोटरों की संख्या करीब डेढ़ लाख और यादवों की संख्या करीब सवा लाख और मुस्लिमों की संख्या करीब एक लाख है।

मुख्तार की मौत के बाद गाजीपुर में मुख्तार समर्थक और विरोधियों की जैसी प्रतिक्रियाएं आई हैं, उसका असर पड़ोसी जिलों पर पड़े बिना नहीं रहेगा। इसकी वजह यह है कि इन जिलों की राजनीतिक और जातीय सोच एवं संस्कृति कमोबेश समान है। इसलिए जैसी गोलबंदी गाजीपुर में होगी, कमोबेश वैसी ही गोलबंदी दूसरे जिलों में भी दिखेगी। बेशक भारतीय जनता पार्टी यादव वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है, इसके बावजूद बहुसंख्यक यादव वोटर अब भी अखिलेश यादव के साथ ही जुड़ा हुआ है। यही हाल मुस्लिम वोटरों का भी है।

मुख्तार की मौत के बाद मुस्लिम वोटरों में क्षोभ भी नजर आ रहा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर और उसके आसपास के जिलों में जैसा जातीय समीकरण है, उसकी वजह से गाजीपुर, आजमगढ़ और घोसी की लोकसभा सीट कम से कम भारतीय जनता पार्टी के लिए एक बार फिर चुनौतीपूर्ण होने जा रही है। हालांकि पार्टी ने ओमप्रकाश राजभर को साथ लाकर समीकरण को संतुलित करने की कोशिश जरूर की है। लेकिन यह तय है कि अब इन इलाकों में वोटिंग का पैटर्न मुख्तार की मौत को लेकर बनी कॉन्स्पीरेसी थ्योरी ही तय करेगी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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