Politics of Caste: जातीय बहुसंख्यकवाद की राजनीति का भविष्य नहीं

Politics of Caste: हमारे देश की राजनीति में कुछ भी सीधा सपाट नहीं है। सब उलझा-उलझा और विरोधाभासों से भरा है। जैसे संवैधानिक रूप से हम एक सेकुलर देश हैं लेकिन इस सेकुलर देश में रिलीजियस माइनोरिटी और मेजोरिटी भी हैं। हमारा संविधान सभी नागरिकों को अवसर की समानता देने की बात करता है लेकिन समय समय पर हम आरक्षित वर्ग पैदा करके इस अवसर की समानता को कम करते रहते हैं। संवैधानिक रूप से किसी भी नागरिक के साथ जाति, भाषा या धर्म के नाम पर भेदभाव नहीं किया जा सकता लेकिन हम सवर्ण, पिछड़ा और दलित के नाम पर एक दूसरे का कुर्ता फाड़ने को क्रांति समझते हैं।

ऐसे अनेकों राजनीतिक विरोधाभाषों का यह देश दशकों से शिकार है। इसमें जो सबसे जटिल विरोधाभाष है वह अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक वाला ही है। इस देश में किसे अल्पसंख्यक कहा जाए और किसे बहुसंख्यक ठीक-ठीक इसको तय करना असंभव है। क्योंकि ऐसा करते समय हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल तो यही होगा कि किसी को अल्पसंख्यक या फिर बहुसंख्यक घोषित करते समय हम आधार क्या तय करें? धार्मिक, जातीय या फिर भाषाई?

Politics of Caste: no future for the politics of ethnic majoritarianism

राजनीतिक विचारकों ने इस पर जितना विचार किया है, उतना ही विरोधाभास गहरा हो गया है। अगर भारत एक देश है और यहां रहनेवाले सब बराबर के नागरिक तो फिर अल्पसंख्यक कौन हुआ भला? लेकिन सवाल यहां खत्म नहीं होता। सवाल यहां से शुरु होता है। यहां से भाषा, जाति, धर्म और इन तीनों के बीच उपभाषा, उपजाति और संप्रदायों का जो सिलसिला शुरु होता है तो सामाजिक रूप से हर समुदाय अल्पसंख्यक ही नजर आता है। यहीं से अंग्रेजों से लड़ते हुए 'बांटो और राज करो' का पाठ पढ़ चुके राजनेताओं का राजनीतिक दिमाग काम करना शुरु करता है।

एक लंबे समय तक धार्मिक अल्पसंख्यकवाद को भारतीय राजनीति की मुख्यधारा बनाकर रखा गया। इसके विरोध में जब हिन्दुत्व की राजनीति मुखर हुई तो राजा वीपी सिंह ने बतौर प्रधानमंत्री राजा बीपी मंडल आयोग द्वारा 1979 में बनायी गयी एक पुरानी रिपोर्ट को लागू कर दिया जिसमें जातीय रूप से पिछड़े वर्ग की पहचान की गयी थी। इस वर्ग को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया गया। लेकिन इसका लाभ समस्त पिछड़े वर्ग के पिछड़ों को न मिलना था और न मिला। लाभ उन्हें मिला जो पिछड़ों में बहुसंख्यक थे।

अल्पसंख्यकवाद की राजनीति के विकल्प में हिन्दू बहुसंख्यकवाद जो अभी ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाया था वह नये प्रकार के जातीय बहुसंख्यकवाद के सामने डमगमा गया। जबसे 2014 में मोदी के नेतृत्व में हिन्दुत्व की राजनीति ने पुन: प्रचंड बहुमत से अपने आपको स्थापित कर लिया तब से जातीय राजनीति से सत्ता सुख लेनेवाले दलों के सामने संकट पैदा हो गया था। वोटों का धार्मिक ध्रुवीकरण सीधे सीधे भाजपा के पक्ष में था क्योंकि भाजपा के अलावा कोई भी धार्मिक बहुसंख्यक को हाथ नहीं लगाना चाहता था।

इसकी काट एक बार फिर उसी फार्मूले के तहत खोजी गयी जो वीपी सिंह 1990 में इस्तेमाल कर चुके थे। लीड किया एक और समाजवादी नीतीश कुमार ने। 2021 में जब कोरोना के कारण देश सामान्य जनगणना न करा सका तो 2022 में नीतिश कुमार ने बिहार में जाति जनगणना करवा दी। इस जाति जनगणना से कुछ स्थापित सत्य लोगों के सामने आ गये जो अभी तक केवल नेताओं को ही पता रहते थे। मसलन किस जाति के कहां कितने वोटर हैं ये हर राजनीतिक दल को पता है। उसी के अनुसार वो अपनी रणनीति भी बनाते हैं परंतु ऐसी बातें सार्वजनिक सतह पर नहीं लाते।

लेकिन नीतीश कुमार और उनके सहयोगी तेजस्वी यादव ने ऐसा कर दिखाया। अब जबकि बिहार की जाति जनगणना की रिपोर्ट सबके सामने है तो सवाल घूम फिरकर वहीं पहुंच जाता है कि धार्मिक बहुसंख्यकवाद के विरोधी दल जातीय बहुसंख्यकवाद का समर्थन कैसे कर सकते हैं? अगर धार्मिक रूप से बहुसंख्यक का शासन बहुसंख्यकवाद है तो जातीय रूप से बहुसंख्यक का शासन सामाजिक न्याय कैसे हो जाएगा?

दलीय राजनीति करनेवाले नेता इस बात को समझते थे कि भारत में राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर किसी जाति की ऐसी हैसियत नहीं है कि वह सिर्फ जाति के आधार पर राजनीतिक नेतृत्व ले सके। इसलिए जातियों का क्लब बनाया गया। जातियों के इन्हीं क्लब का नाम एससी, एसटी और ओबीसी है। लेकिन अब तक का भारत का इतिहास ऐसा रहा है कि जातियों के ये राजनीतिक क्लब एकजुट होकर किसी के साथ नहीं गये हैं।

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू यादव ने ओबीसी राजनीति के नाम पर जो सफलता हासिल की, उसके पीछे उनके साथ ओबीसी जातियों का जुड़ाव नहीं बल्कि यादव मुस्लिम गठजोड़ रहा है। दोनों ही राज्यों में यादव परिवार आज तक ओबीसी समुदाय में शामिल जातियों का नेतृत्व हासिल नहीं कर पाया है। अगर ओबीसी जातियों का ही वोटिंग पैटर्न देखा जाए तो वह ओबीसीवाद से अधिक राष्ट्रवाद के नाम पर बीजेपी के साथ है।

असल में किसी जाति की जातीय राजनीति उस जाति के नेता से चलती है। मुलायम सिंह यादव या लालू यादव अपने अपने राज्यों में अपनी जाति को इसलिए गोलबंद कर सके क्योंकि उनकी जाति ने उन्हें एक बड़े नेता के तौर पर देखा। लेकिन यादवों से बाहर ओबीसी समुदाय में शामिल किसी दूसरी जाति ने दोनों यादव परिवारों को नेता मानने की बजाय बीजेपी, कांग्रेस या नीतीश कुमार को महत्व दिया। इसके बावजूद अगर ये दोनों परिवार अपने-अपने राज्यों में सफल रहे तो उसका कारण ओबीसी राजनीति नहीं बल्कि यादव मुस्लिम गठजोड़ ही रहा।

अब बिहार में जाति जनगणना के बाद स्वाभाविक है लालू और मुलायम परिवार की ओर से ओबीसी समुदाय का नेता होने की कोशिश की जाएगी लेकिन फिलहाल ऐसा होना संभव नहीं है। दोनों ही राज्यों की राजनीतिक सच्चाई यह है कि अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कोई जाति यादवों के साथ जाना नहीं चाहती। उत्तर प्रदेश के बीते विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव की ओर से इसकी भरपूर कोशिश की गयी थी लेकिन सफल नहीं हो पाये। राजभर और निषाद समुदाय का मुलायम परिवार से अलग होकर भाजपा के साथ मिल जाना इसी बात का उदाहरण है।

बिहार की ताजा जाति जनगणना के परिणामों को ही देखें तो कुल 215 जातियों में 190 जातियां ऐसी हैं जिनकी जनसंख्या 1 प्रतिशत के नीचे है। 7 जातियां तो ऐसी हैं जिनकी जनसंख्या दो सौ भी नहीं है। भास्कर जाति लिखनेवाले लोग तो सिर्फ 37 हैं। 20 जातियां ऐसी हैं जिनकी जनसंख्या हजार के नीचे है। इस तरह 27 जातियां तो ऐसी निकलकर सामने आयी हैं जो लगभग समाप्तप्राय है। संभव है कुछ समय में इनमें से कुछ का अस्तित्व ही मिट जाए।

जाति जनगणना में सिर्फ 25 जातियां ही ऐसी गिनी गयी हैं जिनकी संख्या प्रदेश में अच्छी खासी है। इसमें यादव सबसे अधिक 14.26 प्रतिशत है। इसके बाद दुसाध 5.31 प्रतिशत और रविदासी/चमार 5.25 प्रतिशत है। कुशवाहा 4.21 प्रतिशत, मुस्लिम शेख 3.82 प्रतिशत, ब्राह्मण 3.65 प्रतिशत, मोमिन 3.54 प्रतिशत, राजपूत 3.45 प्रतिशत, मुशहर 3.08 प्रतिशत, भूमिहार 2.86 प्रतिशत, तेली 2.81 प्रतिशत, मल्लाह 2.60 प्रतिशत, बनिया 2.31 प्रतिशत, कानू 2.21 प्रतिशत, धानुक 2.14 प्रतिशत हैं।

स्वाभाविक है जो 25 जातियां 2 प्रतिशत से ऊपर हैं वो अपनी जातीय गोलबंदी करेंगी। इसमें सबसे बड़ा सवाल नेतृत्व का ही पैदा होगा। तो क्या आज जो ओबीसी राजनीति की पैरोकारी कर रहे हैं वो इन जातियों का नेतृत्व कर सकेंगे? क्या वहां वही बहुसंख्यक जाति के शासन का सवाल नहीं उठ खड़ा होगा जो हिन्दुत्व की राजनीति के नाम पर खड़ा किया जा रहा है?

भारतीय राजनीति की उलटबांसियों में जो एक बात सीधी सपाट दिखती है वह यह कि यहां राजनीति या सार्वजनिक जीवन में जब एक जाति का वर्चस्व कायम होने लगता है तो बाकी सभी जातियां उसके खिलाफ खड़ी हो जाती हैं। भारत में ब्राह्मणवाद का विरोध हो, ठाकुरवाद का विरोध हो, जाटवाद का विरोध हो या यादववाद का। बिहार, यूपी, हरियाणा सब जगह आपको इसके प्रमाण मिल जाएंगे कि समय समय पर वर्चस्ववादी जाति के खिलाफ कैसे एक स्वर से बाकी जातियां एक हो जाती हैं।

किसी एक बड़ी या प्रभावी जाति के खिलाफ अन्य जातियों की यह एकता ही असल में वर्चस्ववादी जाति की राजनीति की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। इसलिए भारत में धार्मिक बहुसंख्यकवाद की राजनीति का भविष्य तो हो सकता है लेकिन जातीय बहुसंख्यकवाद की राजनीति का कोई भविष्य नहीं है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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