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Political Corruption: निराश क्यों करते हैं जन आंदोलनों से निकले राजनीतिक दल?

Political Corruption: स्वतंत्रता के बाद बीते 75 सालों में भारत ने तीन बड़े राजनीतिक आंदोलन देखे हैं। पहला, जेपी आंदोलन दूसरा, वीपी आंदोलन और तीसरा अन्ना आंदोलन। जेपी आंदोलन को छोड़ दें तो वीपी सिंह का आंदोलन और अन्ना आंदोलन कांग्रेस के भ्रष्टाचार के ही खिलाफ थे।

Political Corruption: Why do political parties emerging from mass movements disappoint?

इन तीनों ही आंदोलनों की समय समय पर समीक्षा होती रहती है और आगे भी होती रहेगी। लेकिन एक सवाल का जवाब कभी नहीं मिलता कि इन आंदोलनों से निकले दल और नेता कालांतर में उन्हीं आरोपों से क्यों घिर गये जिनको मुद्दा बनाकर आंदोलन किया था? जय प्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ जनता को एकजुट किया था। इसलिए उनके पीछे जो जन आंदोलन खड़ा हुआ उसका मुद्दा सरकारी भ्रष्टाचार ही नहीं बल्कि इंदिरा गांधी की लोकतंत्र विरोधी तानाशाही भी थी।

लेकिन वीपी सिंह ने तो कांग्रेस से विद्रोह ही भ्रष्टाचार के मुद्दे पर किया था। 1989 में लोकसभा चुनाव से पहले जो जनता दल बना था उसमें जनमोर्चा, जनता पार्टी, कांग्रेस (एस) और लोकदल समाहित हो गये थे। वो सब राजीव गांधी के खिलाफ एक सशक्त आवाज उठाना चाहते थे जिसमें नेहरु-गांधी परिवार द्वारा बोफोर्स में ली गयी दलाली को मुद्दा बनाया गया था।

वीपी सिंह की इमेज एक स्वच्छ राजनेता की थी। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री और केन्द्र में वित्त मंत्री रहते हुए उन्होने अपनी मिस्टर क्लीन की छवि बनायी थी। शायद इसीलिए इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने उन्हें हमेशा भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे रहनेवाले रक्षा मंत्रालय का जिम्मा दे दिया। लेकिन रक्षामंत्री बनते ही उन्होंने बोफोर्स तोपों की खरीद की आंतरिक जांच शुरु करवा दी जिसका नतीजा ये हुआ कि तीन महीने के भीतर ही उन्हें रक्षामंत्री के पद से हटा दिया गया।

1989 के लोकसभा चुनाव में बोफोर्स ही बड़ा मुद्दा बना और राजीव गांधी की कांग्रेस चुनाव हार गयी। केन्द्र में वीपी सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी। जिस जोश और जज्बे से कई सोशलिस्ट दलों को मिलाकर जनता दल बना था, वह जोश और जज्बा इतना हावी रहा कि दो साल के भीतर सरकार भी गयी और जनता दल भी बिखरने लगा। इस बिखराव से कई छोटे छोटे दल निकले जो आगे चलकर यूपी, बिहार, हरियाणा, कर्नाटक के क्षेत्रीय क्षत्रप बने। लेकिन वीपी सिंह बुरी तरह असफल हुए। उन्होंने संभवत: मान लिया कि सरकार में बैठकर भ्रष्टाचार के दाग से बचना मुश्किल है इसलिए दूसरी बार जब 1996 में संयुक्त दलों द्वारा उन्हें प्रधानमंत्री बनाने का प्रयास हुआ तो मना करके वो कुछ घण्टों के लिए घर छोड़कर ही चले गये।

अपने पहले कार्यकाल में ही सरकार चलाने का इतना कड़वा अनुभव उन्हें हो गया था कि दूसरी बार सबके कहने के बावजूद वो प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार नहीं हुए। प्रधानमंत्री बनने के बजाय बीमारी से घिर चुके वीपी सिंह ने कविता लिखने और पेन्टिन्ग बनाने को अपने लिए ज्यादा सुगम रास्ता समझा और बाकी के जीवन में इसी काम में व्यस्त रहे। उनकी जगह 1996 में देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बने और उस सरकार का क्या हुआ यह सबने देखा था।

नब्बे के दशक के भीषण राजनीतिक उथल पुथल के बाद इक्कीसवीं सदी की शुरुआत अपेक्षाकृत स्थायित्व लिए हुई थी। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना कार्यकाल पूरा किया था और एक बार फिर कांग्रेस सत्ता में लौट आयी। इस बार सोनिया गांधी ने सूझ बूझ से मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए नामित किया क्योंकि उन पर व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं था। लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार के कई संगीन आरोपों से घिर गयी। इसमें कोल स्कैम, टूजी स्कैम और कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला प्रमुख थे।

इन्हीं आंदोलनों की पृष्ठभूमि में 2011 में अन्ना आंदोलन का जन्म हुआ जो दो साल चलता रहा। इस आंदोलन से भी एक राजनीतिक पार्टी का जन्म हुआ जिसका नाम आम आदमी पार्टी है। जिन दिनों जंतर मंतर पर आंदोलन अपने चरम पर था उस समय कांग्रेस के नेता बार बार आंदोलनकारियों को चुनौती देते थे कि बाहर बैठकर भ्रष्टाचार की शिकायत करना आसान है, एक बार सिस्टम में बैठकर देखो तब समझ में आयेगा कि सरकार चलाना कितना कठिन काम है। कांग्रेस के नेता आंदोलनकारियों को अपना राजनीतिक दल बनाने की सलाह भी देते थे।

जब राजनीतिक दल बनाने की बात आयी तब आंदोलनकारियों में ही मतभेद हो गया। एक गुट चाहता था कि आंदोलनों की परिणिति राजनीतिक दल के रूप में नहीं होनी चाहिए। जबकि दूसरा गुट इसके पक्ष में था। जो गुट इसका विरोध कर रहा था उसमें ज्यादातर वो लोग थे जो जेपी आंदोलन और वीपी आंदोलन से निकले दलों का हाल देख चुके थे। खुद अन्ना हजारे भी इसके समर्थन में नहीं थे। लेकिन दल बना और उस दल की दो राज्यों में सरकार भी बनी।

आज वह दल उसी तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा हुआ है जिस तरह के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में उसका जन्म हुआ था। राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप अपनी जगह लेकिन मूल सवाल तो यही है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलनों से निकले राजनीतिक दल ही भ्रष्टाचार के आरोपों से क्यों घिर जाते हैं? क्या राजनीति और सत्ता तंत्र की मजबूरी है कि बिना भ्रष्टाचार के वो सरकार चला ही नहीं सकते?

कुछ हद तक इसका उत्तर है, हां। हमारी राजनीतिक व्यवस्था ऐसी बनती गयी है जिसमें भ्रष्टाचार उसका अनिवार्य हिस्सा हो गया है। जिन दिनों जंतर मंतर पर भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन चल रहा था, उन दिनों वकील और डॉक्टर भी भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना समर्थन देने आते थे। वो क्यों आते थे भला? उन पर तो खुद ग्राहकों से लूटपाट और भ्रष्ट आचरण का आरोप लगता रहता है तो फिर वो किस भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होना चाहते थे?

इसका जवाब इतना सरल नहीं है कि एक समूह या वर्ग को भ्रष्ट बताकर हम बाकी सबको क्लीन चिट दे दें। राजनीति अब एक मंहगा सौदा है। चुनाव आयोग चाहे जितनी निगरानी करे एक उम्मीदवार का चुनाव लड़ने का खर्चा करोड़ों में होता है। इसके अलावा जनता के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए भी उसे नियमित बड़ी रकम खर्च करनी होती है ताकि वह लोगों की मदद करके उनके बीच अपनी विश्वसनीयता बना सके। जनता भी नेता से यही उम्मीद करती है कि अगर वह आया है तो कुछ देकर जाए। फिर अगर अगला चुनाव जीतना है तो जनता के सौ उल्टे सीधे काम उसे करने पड़ते हैं, वह चाहे या न चाहे। अगर कोई ईमानदारी का बैनर लटका लेगा तो सबसे पहले उसका समर्थक वर्ग ही उससे नाराज हो जाएगा।

जब अर्थव्यवस्था पूंजीवादी हुई है तो समाज व्यवस्था वैराग्यवादी कैसे हो जाएगी? इसलिए नौकरशाह अगर अपना घर भरने के लिए भ्रष्टाचार करता है तो नेता अपनी राजनीति चलाये रखने के लिए भ्रष्टाचार करता है। यही यथास्थिति है जिसे हम चाहें न चाहें हमें स्वीकार करना होगा। आज के समय में राजनीतिक दल बनाना और उसे चला लेना एवरेस्ट चढने से ज्यादा कठिन काम है। वह समय गया जब जनता के चंदे से नेता राजनीति करते थे और निजी जीवन में भी सत्यनिष्ठ रहते थे। अब राजनीति भी बदल गयी है और राजनेता भी। ईमानदार से ईमानदार नेता भी सीधे न सही तो परोक्ष रूप से करप्शन करता ही है वरना उसकी राजनीति का खर्चा ही नहीं निकलेगा।

इसका आशय यह नहीं कि सत्ता में बैठकर नेताओं द्वारा किये जानेवाले भ्रष्टाचार को सही मान लिया जाए। आशय सिर्फ इतना है कि समाजवादी दौर के राजनीतिक सिद्धांत पूंजीवादी दौर में लागू नहीं हो सकते। पूंजीवाद में भ्रष्टाचार वह शिष्टाचार है जिसको निभाये बिना व्यापारिक अवसर नहीं भुनाये जा सकते। इसलिए अब या तो भविष्य में राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई आंदोलन होगा नहीं, अगर हुआ तो उसे जनता का समर्थन ही नहीं मिलेगा। अगर ये दोनों बातें संभव हो गयीं और उस आंदोलन से भी कोई राजनीतिक दल पैदा हो गया तो वह भी उसी दलदल का हिस्सा होगा जिसके खिलाफ आवाज बुलंद करके उसने अपना आकार पाया है।

जनता को भी ऐसे राजनीतिक आंदोलनों की क्षणभंगुरता को समझ लेना चाहिए। हमारा जोर राजनीति को ठीक करने की बजाय जिस दिन समाज को ठीक करने पर हो जाएगा, राजनीति अपने आप सुधर जाएगी। इसके लिए फिलहाल कोई राजनीतिक दल प्रयास करेगा, इसकी दूर दूर तक कोई संभावना नहीं है। फिलहाल तो वो समाज को फुटबॉल समझकर उससे खेलने में लगे हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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