Parliament Deadlock: सत्ता पक्ष की चौधराहट या विपक्ष की बौखलाहट?

Parliament Deadlock: हम भारतीयों का स्वभाव है कि हम सिर्फ संकट में एक होते हैं। जैसे ही संकट बीतता है हम आपस में फिर से लड़ने लगते हैं। कम से कम इस बार संसद सत्र में यही नजारा दिखाई दे रहा है। अभी 13 दिसंबर को सभी सांसद संसद भवन पर हमले में बलिदान होनेवाले रक्षकों को श्रद्धांजलि देकर आये ही थे कि एक बार फिर लोकसभा में हमलावर घुस गये। लोकसभा में जैसे ही बाहरी हमलावर घुसे तो पलक झपकते सभी सांसद एक हो गये। कुछ सांसदों ने मिलकर हमलावरों की पिटाई तक कर दी।

उस समय न कोई भाजपाई था न कांग्रेसी। न तृणमूल वाला और न ही कोई और। पलक झपकते सब आपसी दुश्मनी भुलाकर उन हमलावरों के खिलाफ एकजुट हो गये। लेकिन जैसे ही संकट टला, सत्ता पक्ष और विपक्ष ने उसी हमले को ही अपने लिए लड़ने का मुद्दा बना लिया। अब विपक्ष कह रहा है कि गृहमंत्री उस पूरे मामले में बयान दें और जब तक ऐसा नहीं होगा वो संसद नहीं चलने देंगे। इस बहिर्गमन के बीच ही संसद भवन के दरवाजे पर कुछ सांसद धरने पर बैठ गये। यहां तक कि तृणमूल के सांसद कल्याण बनर्जी उसी धरने में राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ की नकल तक उतारने लगे।

Parliament winter session bjp vs opposition over Parliament Deadlock

यहां से विवाद का दूसरा अध्याय खुल गया। स्वयं जगदीप धनखड़ ने इस पर दुख जताते हुए कह दिया कि यह उनका नहीं बल्कि सभापति के आसन, किसान समाज और उनकी जाति का मजाक उड़ाया गया है। उनके इस बयान ने आग में घी का काम किया। यह सीधे सीधे राजनीतिक बयान था जिस पर प्रतिक्रिया आनी ही थी। अब विपक्षी सांसदों को नया मुद्दा मिल गया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने यहां तक कह दिया कि "कई बार मुझे बोलने का मौका नहीं दिया जाता तो क्या अब मैं ये कहूं कि मेरे दलित होने के कारण मुझे सदन में बोलने नहीं दिया जाता?"

इस पूरे मामले में जगदीप धनखड़ कल्याण बनर्जी की मिमिक्री से अधिक राहुल गांधी की वहां मौजूदगी से दुखी थे। कांग्रेस के नेताओं को इशारों इशारों में उन्होंने यह बात बताई भी लेकिन खुद राहुल गांधी से जब मीडिया द्वारा इस पर सफाई मांगी गयी तो उन्होंने इस मामले पर कुछ न बोलते हुए वही पुराना अडाणी राग अलाप दिया। उनके मुताबिक संसद में विपक्षी सांसदों को बोलने नहीं दिया जा रहा है। मोदी सरकार अपनी मनमानी कर रही है।

इस बीच ऐतिहासिक रूप से 143 सांसदों को सदन की कार्रवाही से बर्खास्त किया जा चुका है। इनमें 97 लोकसभा के और 46 राज्यसभा के सांसद हैं। इनकी बर्खास्तगी के आदेश में कहा गया है कि निलंबन की अवधि के दौरान संसद भवन की सीढियों पर चढ़ने तक की अनुमति नहीं होगी। इन बर्खास्त सांसदों का दैनिक भत्ता भी रोक दिया गया है। जाहिर है दोनों सदनों के प्रमुखों की ओर से की गयी ये बड़ी सख्त कार्रवाई है जो विपक्ष को यह कहने का मौका देगी कि सत्ता पक्ष अपनी तानाशाही कर रहा है। कांग्रेस के कार्ति चिदंबरम ने कहा भी है कि अब यही चलन बनने जा रहा है। जो मेरा रास्ता है वही सही है। अगर आप उस रास्ते पर नहीं चलेंगे तो आपको उठाकर बाहर फेंक दिया जाएगा।

इस बीच संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही जारी है और केन्द्र सरकार जरूरी विधेयकों को एकतरफा पारित भी करती जा रही है। लेकिन आम आदमी के लिए सवाल तो यह है कि इस संसदीय गतिरोध के लिए दोषी कौन है? अगर आम आदमी पक्ष और विपक्ष दोनों ही ओर से संसदीय मर्यादा और विशिष्ट आचरण की उम्मीद करता है तो इसके दिन लद गये। अब संसद भवन शिष्टता, शालीनता और चुटीले अंदाज में अपनी बात कह देने की जगह नहीं रही। उसकी जगह लाइव प्रसारण वाली संसद एक ऐसा अखाड़ा बन गयी है जहां दोनों ही पक्ष के लोग अपने अपने वोटरों को साधने की कोशिश करते हैं।

अगर आज सत्ता पक्ष को कल्याण बनर्जी की मिमिक्री बुरी लग रही है तो विपक्ष को लगता है सत्ताधारी पार्टी का नेता तो खुद ऐसा करता है फिर किस मुंह से बीजेपी ऐसे आरोप लगाती है? मतलब गिरावट और पतन में दोनों पक्ष एक दूसरे की बराबरी करने में ज्यादा सहज हैं। दोनों ही पक्षों का अपना अपना एजंडा है और कोई भी इससे पीछे हटना नहीं चाहता। जो दल सरकार में होता है उसका प्रयास होता है कि अधिक से अधिक संसदीय कार्यवाही हो और उसके विधेयक पारित हो जाएं। वहीं विपक्ष का अब ऐसा स्वभाव बनता जा रहा है कि जैसे भी हो सदन ही न चलने दिया जाए।

इस तरह यह संसदीय गतिरोध न पहला है और न आखिरी। संसद न चलने देने का रिकार्ड बनाना हो तो भाजपा हो या कांग्रेस, विपक्ष में रहते हुए कोई पीछे नहीं रहता। लेकिन जो नया चलन देखने को मिल रहा है वह यह कि अब संसद के बाहर के मुद्दों पर संसद गतिरोध तो होता ही है, संसदीय गतिविधि को लेकर भी बार बार गतिरोध पैदा हो रहा है। संसद के भीतर की समस्याओं को लेकर सांसद सदन के बाहर धरना दे रहे हैं और मार्च कर रहे हैं।

इसलिए ऐसे हालात में न तो किसी एक पक्ष को दोषी करार दिया जा सकता है और न ही दूसरे पक्ष को निर्दोष। दोनों ही पक्ष अपनी अपनी राजनीति कर रहे हैं जिससे अगर किसी को नुकसान है तो उस संसदीय गरिमा का जो लोकतंत्र में राजनीतिक समुदाय के व्यवहार को प्रदर्शित करता है। बार बार संसद में होनेवाले इस तरह के हंगामे, गतिरोध के कारण आम आदमी की संसदीय कार्रवाही में लाइव प्रसारण के बाद भी कोई रुचि नहीं रहती। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष दोनों को इस बात को समझना चाहिए कि अगर जनता ही उनकी गतिविधियों से विमुख हो गयी तो फिर यह सारा हंगामा और प्रदर्शन कर किसके लिए रहे हैं?

भारत के संसदीय लोकतंत्र का इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सत्ता में जो भी दल बैठ जाए या विपक्ष में जो भी बैठ जाए, उसका व्यवहार नहीं बदलता। कल तक कांग्रेस सत्ता पक्ष थी तो बीजेपी से उम्मीद करती थी कि वह सदन को चलने में मदद करे। आज बीजेपी सत्ता में है तो यही उम्मीद वह कांग्रेस या अन्य विपक्षी सांसदों से कर रही है। जो दल सत्ता में होता है वह चौधरी हो ही जाता है और जो विपक्ष में रहता है उसके विरोध को बौखलाहट बता ही दिया जाता है। कुछ सालों से इसमें तो कोई बदलाव आया नहीं है। भविष्य में आ जाए तो इसे भारत के संसदीय लोकतंत्र का पुनर्जीवन ही कहा जाएगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+