Parliament Session: गलत रणनीति के कारण मानसून सत्र में परास्त हो रहा विपक्ष
अविश्वास प्रस्ताव लाने की इंडिया एलायंस की रणनीति यह थी कि जब तक लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर फैसला नहीं होगा, तब तक विपक्ष संसद में कोई भी बिल पास नहीं होने देगा। सरकार की वैधता पर सवाल उठा कर लोकसभा के स्पीकर और राज्यसभा के सभापति को बिल पास करवाने से रोका जाएगा।
लेकिन इसके बावजूद दोनों सदनों में बिल पास हो रहे हैं, जबकि अविश्वास प्रस्ताव पर बहस सत्र के आख़िरी दिनों में 8, 9 और 10 अगस्त को होगी। प्रधानमंत्री 10 अगस्त को शाम पांच बजे अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस का जवाब देंगे और उसके बाद अगर विपक्ष ने वाकआउट न किया तो वोटिंग होगी।

विपक्ष ने नौंवे दिन भी दोनों सदनों में हंगामा जारी रखा, लेकिन विपक्ष की आपत्तियों और हंगामे के बीच दोनों सदनों के सभापति बिल पास करवाते रहे। राज्यसभा में कांग्रेस के सांसद दिग्विजय सिंह ने इस पर आपत्ति उठाई है। उनका कहना है कि सदन में बहुमत साबित होने से पहले सरकार कोई बिल कैसे पास करवा सकती है। हालांकि विपक्ष के सदस्य अगर किसी बिल पर मतविभाजन की मांग करते हैं, तो स्पीकर और सभापति बिना मतविभाजन के बिल पास नहीं करवा सकते। विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग से पहले अपनी किरकिरी नहीं करवाना चाहता, इसलिए किसी बिल पर वोटिंग की मांग नहीं कर रहा।

दूसरी तरफ सरकार ने अविश्वास प्रस्ताव पर बहस और मतविभाजन से पहले विपक्ष को मतविभाजन के लिए मजबूर करने की रणनीति बना ली है। गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने पहली अगस्त को ही दिल्ली सेवा बिल लोकसभा में पेश कर दिया। सरकार का इरादा न सिर्फ लोकसभा बल्कि राज्यसभा में भी इसी हफ्ते में बिल पास करवाने का है।
बिल को बीजू जनता दल के समर्थन की घोषणा के बाद अब संसद के दोनों सदनों में बिल पास होने में कोई संशय नहीं रहा। राज्यसभा के 245 सदस्यों में से 7 पद रिक्त हैं, बाकी बचे 238 सदस्यों में से बहुमत के लिए 120 सांसदों की जरूरत है, एनडीए के खुद के 111 सांसद है, और बीजू जनता दल के 9 सांसदों को मिला कर बिल के समर्थन वाले सांसदों की संख्या 120 हो चुकी है।
अब जबकि बिल का राज्यसभा में भी पास होना तय है, तो वाईएसआर कांग्रेस के 9 और टीडीपी के एक सांसद का भी सरकार को समर्थन मिलने की पूरी संभावना हैं। इंडिया एलायंस के पास सिर्फ 99 राज्यसभा सदस्य हैं। उसे बीआरएस के सात सदस्यों ने समर्थन का एलान किया है। बीआरएस को मिलाकर बिल के खिलाफ सिर्फ 106 सांसद हैं। बसपा और जेडीएस के बाकी बचे दो सांसदों का भी बिल के समर्थन में जाने के आसार हैं। ऐसे में 2024 का "सेमीफाइनल" एलायंस इंडिया इसी हफ्ते हार जाएगा। हालांकि संसद में किसी बिल पर मतविभाजन को कभी लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल नहीं कहा जा सकता, लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री ने बिल पर मतविभाजन को लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल कह रखा है।
विपक्ष ने मानसून सत्र के लिए रणनीति बहुत ही कमजोर बनाई, जिस कारण उसे लगातार हार का मुंह देखना पड़ेगा। पहले 2 अगस्त को लोकसभा में और फिर 4 अगस्त को राज्यसभा में दिल्ली सेवा बिल पर। तीसरी बार 10 अगस्त को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव के मतविभाजन के समय भी उसे हार का मुंह देखना पड़ेगा।
विपक्ष ने मणिपुर को मानसून सत्र का मुख्य मुद्दा बनाकर संसद नहीं चलने दी। यह मुद्दा बनाना कहीं भी गलत नहीं है, लेकिन पहले प्रधानमंत्री के बयान की शर्त लगाना गलत था। विपक्ष सरकार के संबंधित मंत्री को सदन में बयान देने के लिए बाध्य कर सकता है, लेकिन प्रधानमंत्री को नहीं। लेकिन अगर प्रधानमंत्री खुद बयान दे भी देते, तो भी लोकसभा में ऐसा नियम नहीं है कि मंत्री या प्रधानमंत्री के बयान के बाद स्पष्टीकरण माँगा जाए या बहस की जाए। राज्यसभा में तो मंत्री के बयान के बाद स्पष्टीकरण मांगने का नियम है। विपक्ष प्रधानमंत्री को लोकसभा में नहीं, राज्यसभा में घेरना चाहता है।
अगर राजनीतिक तौर पर विपक्ष प्रधानमंत्री को दोनों सदनों में बयान देने को बाध्य करने में सफल भी हो जाता, तो उससे क्या फर्क पड़ जाता? बहस तो फिर भी विपक्ष को नियमों के तहत ही करनी पड़ती, जिसका जवाब गृहमंत्री ही देते। नियम यही है कि या तो राज्यसभा में मंत्री के बयान के बाद बहस हो या कोई सांसद सदन में किसी विषय पर बहस की मांग का विधिवत नोटिस दे।
लोकसभा के सांसद शशि थरूर ने विपक्ष की मांग के पक्ष में एक पुराना उदाहरण दिया है। उदाहरण 2002 में गुजरात के दंगे पर राज्यसभा में हुई बहस का है। तब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे। गुजरात के दंगों पर कांग्रेस के सांसद अर्जुन सिंह ने एक प्रस्ताव रखा था कि यह सदन सरकार से गुजरात सरकार के खिलाफ अनुच्छेद 355 के तहत कार्रवाई की मांग करता है। नोटिस के चार दिन बाद 6 मई को सदन में बहस हुई थी।
सदन में पहले विपक्ष के नेता मनमोहन सिंह बोले और बाद में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी बोले। गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने सरकार का पक्ष रखा, और आखिर में अर्जुन सिंह ने बहस का जवाब दिया। शशि थरूर ने यह सारा वृतांत ट्विट करके बताया है कि कौन कितने बजे बोला। लेकिन उनका यह ट्विट और तर्क तो खुद विपक्ष के खिलाफ जा रहा है। यहां सदन में पहले प्रधानमंत्री के बयान की बात कहां है। जैसे उस समय विपक्ष के सांसद अर्जुन सिंह ने बहस का प्रस्ताव रखा था, वैसे ही विपक्ष के किसी सांसद को मणिपुर पर प्रस्ताव रखने से किसने रोका है।
गृहमंत्री अमित शाह ने तो बाकायदा दोनों सदनों में विपक्ष के नेताओं को चिठ्ठी लिख कर कहा कि सरकार बहस को तैयार है, आप प्रस्ताव लाईए। विपक्ष ने मणिपुर को इंडिया एलायंस की एकता दिखाने का राजनीतिक मुद्दा बना दिया, इसीलिए उसने मणिपुर में प्रतिनिधिमंडल भेजा और अब राष्ट्रपति को ज्ञापन देने की रणनीति बनाई है। लेकिन जैसे 2002 में अर्जुन सिंह ने प्रस्ताव रख कर बहस करवाई थी, वैसे संसद में सरकार को कटघरे में खड़ा करने को तैयार नहीं, जबकि विपक्ष का काम सरकार को संसद के भीतर कटघरे में खड़ा करने का होता है। विपक्ष संसद की बजाए मीडिया में सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहा है। इसलिए मानसून सत्र में सदन के भीतर उसकी लगातार तीन हार सुनिश्चित हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications