Parliament: जगदीप धनखड़ और ओम बिड़ला की निष्पक्षता पर विपक्ष के सवाल
क्या मोदी तानाशाह हैं? क्या देश की जनता ने दो बार एक तानाशाह को चुना है? क्या मोदी ने लोकसभा और राज्यसभा को सिर्फ कागजी बना दिया है? क्या लोकसभा स्पीकर निष्पक्ष हो कर सदन नहीं चलाते? क्या स्पीकर प्रधानमंत्री के दबाव में काम करते हैं? क्या राज्यसभा के सभापति भी स्पीकर की तरह मोदी के सामने दब्बू बन गए हैं? राहुल गांधी ने कई बार आरोप लगाया कि जब वह लोकसभा में बोलने के लिए खड़े होते हैं तो स्पीकर उनका माईक बंद करवा देते हैं। यह आरोप राज्यसभा में भी सभापति पर लगा है।
कांग्रेस मोदी सरकार पर यह आरोप तो शुरू से लगाती रही है कि उनके राज में सरकारी स्वायत संस्थाओं का अवमूल्यन हुआ है। लेकिन अब यह आरोप संसद को लेकर भी लग रहा है। विपक्ष ने कुछ ऐसे आंकड़े पेश किए हैं, जिनमें कहा गया है कि लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा के सभापति तानाशाह हो गए हैं। इन आंकड़ों में मनमोहन सिंह सरकार के दस सालों की मोदी सरकार के साढ़े नौ सालों से तुलना की गई है।

बताया यह जा रहा है कि किसकी कमीज ज्यादा दागदार है। जुलाई 2022 में जब लोकसभा के चार और राज्यसभा के 22 सांसदों को निलंबित किया गया था, तो विपक्ष ने संसद के भीतर 50 घंटे का धरना दिया था। स्पीकर ओम बिड़ला और और राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू के खिलाफ इस तरह का धरना इन दोनों के प्रति अविश्वास का ऐसा पहला उदाहरण नहीं था। कई बार पहले भी इस तरह की घटनाएं होती रही हैं, लेकिन इस तरह का धरना पहली बार हुआ था।
इस धरने में पहली बार जयराम रमेश ने कहा था कि मनमोहन सरकार के समय के मुकाबले मोदी सरकार के समय सांसदों के निलंबन में 170 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। अब इन आंकड़ों का राजनीतिक इस्तेमाल शुरू हो गया है। आंकड़े ये बताते हैं कि मनमोहन सिंह सरकार के समय स्पीकरों ने दस साल में 50 सांसदों को निलंबित किया था, जब कि मोदी राज के दौरान लोकसभा स्पीकर ने 94 सांसदों को निलंबित कर दिया है, जबकि वर्तमान लोकसभा के अभी दो सत्र बाकी हैं।
लेकिन इस आंकड़े को बड़ी चालाकी से दिखाया जा रहा है। इनमें से एक ही बार 2015 में कांग्रेस के 25 स्दस्स्यों को नियमों का उल्लंघन करके सदन में प्लेकार्ड दिखाने और वेल में आकर नारे लगाने के लिए, एक बार अन्नाद्रमुक के 24 सांसदों को कावेरी मुद्दे पर हंगामा करके कार्यवाही बाधित करने के लिए निलंबित किया गया था। इसी तरह टीडीपी के चौदह सांसदों को सदन में प्लेकार्ड दिखाकर प्रदर्शन करने के लिए निलंबित किया गया था।
हाल ही में अधीर रंजन चौधरी के आख़िरी निलंबन तक मोदी के दूसरे कार्यकाल में उनके अब तक के साढ़े चार साल में सिर्फ 11 सांसदों को निलंबित किया गया, जिनमें सिर्फ एक आम आदमी पार्टी के भगवंत मान थे, जिन्हें सदन की कार्यवाही की वीडियो रिकोर्डिंग करने के लिए निलंबित किया गया था, और बाकी सब कांग्रेसी थे, जिन्होंने सदन के नियमों का उल्लंघन कर सदन के वेल में आकर प्लेकार्ड दिखाए और नारेबाजी की।
दूसरी तरफ 2014 से 2019 तक राज्यसभा से एक बार भी किसी सांसद को निलंबित नहीं किया गया था। जबकि दूसरे कार्यकाल में जिन 48 सांसदों को पिछले साढ़े चार साल में निलंबित किया गया, उनमें से 23 एक सत्र के और 8 एक सत्र के हैं। तीनों ही बार आम आदमी पार्टी के तीनों सांसदों ने नियम कायदे ताक पर रख कर वेल में आकर नारे लगाए थे और सभापति पर कागज के गोले फेंके थे। जिसका विपक्ष के अन्य दलों ने समर्थन किया और वैसा ही हंगामा किया। एक घटना तो अधिकारी के साथ मारपीट की और गिलास तोड़ने की भी हुई, जिस कारण निलंबन किया गया। सवाल यह नहीं है कि किसके राज में सांसदों को ज्यादा निलंबित किया गया, सवाल यह भी है कि सांसदों के किस व्यवहार के कारण उन्हें निलंबित किया गया।
लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ पर भेदभाव का भी आरोप लगाया जा रहा है कि वे भाजपा सांसदों और विपक्ष के सांसदों पर कार्रवाई में भेदभाव करते है। विपक्ष के सांसदों को निलंबित कर देते हैं और भाजपा के सांसदों को चेतावनी दे कर छोड़ देते हैं। भेदभाव का ताज़ा उदाहरण रमेश विधूड़ी और अधीर रंजन चौधरी का दिया जा रहा है।
मानसून सत्र में अधीर रंजन चौधरी ने मणिपुर का जिक्र करते हुए अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी को धृतराष्ट्र कहा था। कांग्रेस राहुल गांधी को रावण बताने वाले पोस्टर पर बहुत एतराज जता रही है, लेकिन अधीर रंजन चौधरी ने तो सदन में मोदी को धृतराष्ट्र कहा था। उन्होंने कहा था कि जैसे हस्तिनापुर में द्रोपदी की इज्जत लूटी जा रही थी, और राजा चुप रहा था, वैसे ही अब मणिपुर को लेकर "राजा" चुप्पी साधे हुए है। इस पर जब भाजपा के सांसदों ने एतराज किया और अधीर रंजन माफी मांगने के बजाए अपने बयान को दोहराते रहे, तो स्पीकर ने उन्हें निलंबित कर दिया था। विपक्ष अब इसकी तुलना रमेश विधूड़ी वाले मामले में कर रहा है।
विशेष सत्र के दौरान 21 सितंबर को जब भाजपा के रमेश विधूड़ी बोल रहे थे, तो बसपा के दानिश अली उन्हें बार बार टोक रहे थे। उस टोकाटाकी से परेशान विधूड़ी ने उन पर कई ऐसी टिप्पणियाँ की, जो कथित तौर पर मुसलमानों की धार्मिक पहचान से जुड़ी थीं। इस पर थोड़ा बहुत हंगामा भी हुआ, लेकिन ओम बिड़ला ने विधूड़ी को सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ दिया और उनकी टिप्पणियों को लोकसभा के रिकॉर्ड से हटा दिया गया।
इस घटना के बाद सदन की कार्यवाही बिना बाधा चलनी शुरू हो गई, और अंत तक बिना बाधा चलती रही। किसी ने विधूड़ी के खिलाफ कार्रवाई की मांग नहीं की। बाद में सदन के रिकॉर्ड से निकाले जाने के बावजूद मीडिया के एक वर्ग ने रिकॉर्डेड क्लिप वायरल करके हंगामा खड़ा कर दिया। इस पर भाजपा ने जवाबी कार्रवाई करते हुए दानिश अली को ही यह कह कर कटघरे में खड़ा कर दिया है कि पहले उन्होंने मोदी को नीच कहा, जिसके जवाब में विधूड़ी ने उन्हें जो भी कहा, उस पर विवाद हो गया। अब दानिश अली के खिलाफ मिली शिकायतों की विशेषाधिकार समिति जांच कर रही है, जिसमें अधिकांश भाजपा सदस्य शामिल हैं।
दानिश अली को घिरता देख अब मोदी विरोधी मीडिया ने मनमोहन सरकार के समय के स्पीकरों और सभापतियों का मुकाबला मोदी काल के स्पीकरों और सभापतियों से करना शुरू कर दिया है। राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने भी संजय सिंह और राघव चड्ढा को मानसून सत्र के लिए निलंबित कर दिया था। सदन में दोनों का व्यवहार पूरी तरह असंसदीय था। संजय सिंह तो वेल में आ गए, और महासचिव की टेबल पर चढ़ कर नारेबाजी की थी।
लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ को लेकर विपक्ष के हमले योजनाबद्ध ढंग से हुए हैं। जिसकी शुरुआत राहुल गांधी ने की थी। जब उन्होंने यह कह कर लोकसभा स्पीकर को कटघरे में खड़ा किया था कि वह जब भी बोलने के लिए खड़े होते हैं, तो वह उनका माईक बंद करवा देते हैं। यह बात राहुल गांधी ने सदन से बाहर निकल कर मीडिया के सामने कही थी। अगले दिन स्पीकर ओम बिड़ला ने सदन के भीतर उनके आरोपों को खारिज किया, लेकिन राहुल गांधी अपने आरोप पर अड़े रहे, और उन्होंने अपने आरोपों को विदेशों में जाकर भी दोहराया था। अब इन दोनों की राजस्थान विधानसभा चुनावों में बढ़ती दिलचस्पी और राजस्थान में हो रहे दौरों को लेकर कांग्रेस ने उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं।












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