Pakistan at Crossroads: टूटकर बिखर जाना ही पाकिस्तान की नियति है

पाकिस्तान के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वहां के मुल्ला मिलिट्री अलायंस ने उसे बर्बाद कर दिया। ये आधा सच है। पूरे सच में फ्रस्टेटेड ज्युडिशियरी और करप्ट पोलिटिशियन भी शामिल हैं।

Pakistan at Crossroads

Pakistan at Crossroads: ब्रिटिश शासन में यूपी के मुल्ला मौलवी और मुस्लिम लीगी किसी ऐसे इस्लामिक स्टेट का स्वप्न देख रहे थे जिसमें अरब के रेगिस्तान का कानून लागू किया जा सके। लाहौर में इल्मुद्दीन की फांसी के बाद अल्लामा इकबाल इस अधपके विचार के खानसामा बन गये। 1930 में इलाहाबाद में मुस्लिम लीग के जलसे में उन्होंने जो खुतबा दिया उसका लब्बोलुआब यही था कि भारत के उत्तर पश्चिम में एक इस्लामिक राज्य क्यों जरूरी है। हालांकि उन्होंने कोई अलग देश नहीं मांगा था। उन्होंने तो ब्रिटिश हुकूमत से खैबर और पश्चिमी पंजाब के इलाकों को मिलाकर एक इस्लामिक राज्य की मांग रखी थी जहां एक मॉडल इस्लामिक राज्य बसाया जा सके।

ब्रिटिश हुकूमत ने कितना सुना पता नहीं, लेकिन इकबाल ने अपने खुतबे में कहा कि वो जिस मॉडल इस्लामिक राज्य की मांग कर रहे हैं वह अरब की नकल नहीं होगा। उसका इस जमीन से ताल्लुक होगा। वह एक मॉडल इस्लामिक राज्य होगा जिससे हिन्दुओं को भयभीत होने की जरूरत नहीं होगी। हर समुदाय को विकसित होने का पूरा अवसर होगा। मुस्लिम लीग ने उनकी अलग इस्लामिक राज्य वाली बात तो सुनी लेकिन भेदभाव और अरब की नकल न करने वाली बात सुनकर अनसुनी कर दी। इकबाल अल्लामा यानी विद्वान जरूर कहे जाते थे लेकिन मुस्लिम लीगी अच्छे से समझते थे कि भारत में इस्लामिक राज्य का अर्थ अगर अरब की नकल करना नहीं है तो फिर भला वह इस्लामिक राज्य क्योंकर होने लगा?

इसलिए जब पाकिस्तान बन गया तो एक ओर अचानक जहां जिन्ना को स्टेट चलाने के लिए सेकुलर वैल्यू याद आ गए वहीं मुल्ला मौलवी समुदाय उस अधूरे काम को पूरा करने में लग गया जिसके लिए पाकिस्तान बना था। अर्थव्यवस्था, समाज, जीवनशैली सबको 'इस्लामिक अकीदत' के अनुसार ढालने का काम शुरु हो गया। सरकारें या फिर ब्रिटिश मॉडल की सेकुलर अदालतें भी इससे इंकार नहीं कर सकती थीं। इसलिए अदालत, फौज, नेता और मुल्ला मौलवी के बीच 1950 से ही चूहे बिल्ली का खेल शुरु हो गया। कौन किसको कहां दबोचकर इस्लाम नाफिस कर देगा, इसके प्रयास में हर गिरोह पहले दिन से लग गया।

मुल्ला मौलवी को ऐसा इस्लामिक राज्य चाहिए था जो पैगंबर की शिक्षाओं और उनकी जीवनशैली पर आधारित हो। इसलिए पाकिस्तान बनते ही सबसे पहला दंगा पंजाब में उन अहमदियों के खिलाफ हुआ जिन्होंने पाकिस्तान बनाने में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। मांग की गयी कि उन्हें गैर मुस्लिम घोषित किया जाए। वो 'खत्म-ए-नबूवत' पर ईमान नहीं लाते, इसलिए उनको मुसलमान नहीं कहा जा सकता। 1953 में हुए इन दंगों में लगभग दो हजार अहमदी मारे गये और हजारों बेघर हो गये। पाकिस्तान बनते ही पहला हमला मंदिरों पर नहीं हुआ, बल्कि उनकी मस्जिदों पर हुआ जिन्हें अहमदिया, कादियानी या लाहौरी मुसलमान कहा जाता है।

अल्लामा इकबाल और मोहम्मद अली जिन्ना तो जा चुके थे लेकिन जो कुछ बड़े आलिम बचे थे वो इन दोनों को उतना ही मानते थे जितने में उनका फायदा था। इनमें सबसे बड़ा नाम था जमात ए इस्लामी वाले मौलाना मौदूदी का। मौलाना मौदूदी ने पचास के दशक में जब इस्लामिक सोसाइटी और शरीयत की मांग उठाई तो एकदम से पाकिस्तान उनके ही खिलाफ हो गया। फैशनेबल पैण्ट शर्ट पहनने वाले वहां के नौजवान और साड़ी व सलवार सूट वाली महिलाएं एकदम से सलवार कमीज और बुर्का धारण करने को तैयार नहीं थे। कोर्ट और अयूब शासन ने भी मौदूदी को बर्दाश्त नहीं किया। उनके जलसों पर रोक लगा दी। लेकिन इन तमाम प्रतिबंधों के बावजूद मौदूदी को जो करना था, वो करने में सफल रहे। उनके अधूरे ख्वाबों को जनरल जिया उल हक ने पूरा करने का प्रयास किया।

इसी पचास के दौर में अंग्रेजियत में पले बढ़े और कुछ साल पहले तक ब्रिटिश अदालतों के जज रह चुके मीलार्ड लोगों को भी ख्याल आया कि क्यों न सही इस्लाम का पता लगाया जाए। अहमदिया मुसलमानों के खिलाफ हुए दंगों की जांच के लिए बनी जस्टिस मुनीर कमेटी ने 1954 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। अपनी जांच के दौरान हर फिरके के मुसलमान को अपने पास बुलाया और पूछा कि आपकी दृष्टि में इस्लामिक स्टेट का आशय क्या है? इसके लिए इकबाल का इलाहाबाद वाला खुतबा तथा जिन्ना का पाकिस्तान असेम्बली में दिया पहला भाषण याद दिलाया, जिन्होंने पाकिस्तान का ख्वाब देखा वो तो भेदभाव नहीं चाहते थे। वो तो सेकुलर स्टेट के हिमायती थे। क्या आप उनके विचारों से सहमत हैं? उनके सामने आने वाला हर फिरके का मुल्ला साफ मुकर गया। काफिर मोमिन में मानवता को बांटने वालों के लिए बिना भेदभाव के कैसा इस्लामिक स्टेट?

हालांकि मीलार्ड लोग फिर भी बहुत बदले नहीं और 1860 में अंग्रेजों द्वारा बनाये आईपीसी के अनुसार ही चलते रहे जिसे पाकिस्तान बनने के बाद पीपीसी कह दिया गया था। लेकिन जब पाकिस्तान को माल ए गनीमत मानकर मुल्ला टूट पड़े थे तो फौजी भला क्योंकर पीछे रहते? पाकिस्तान तो बन गया था लेकिन अभी तक सदर ए रियासत (प्रेसिडेन्ट) वाली व्यवस्था नहीं बनी थी इसलिए गवर्नर जनरल ही पाकिस्तान के चीफ हुआ करते थे। 1953 में सर मलिक गुलाम मोहम्मद गवर्नर जनरल थे और उन्होंने एक चुनी हुई पूर्ण बहुमत की सरकार को बर्खास्त कर दिया। यहां से चुनी हुई सरकारों को उखाड़ फेंकने की जो शुरुआत हुई तो पाकिस्तान की फौजी रिवायत ही बन गयी।

1956 में पहली बार पाकिस्तान में प्रेसिडेन्ट चुना गया, यानी सदर ए रियासत। पहले सदर ए रियासत बने इसकदार मिर्जा। बंगाली मूल के मिर्जा भी मलिक गुलाम मोहम्मद की तरह सिविल सर्वेन्ट थे। लेकिन दो साल बाद 1958 में जनरल अयूब खान ने इसकदार मिर्जा को ही सदर ए रियासत से हटा दिया और खुद को सदर ए रियासत घोषित कर दिया। वो इस पद पर करीब दस साल रहे। लेकिन जनरल अय्यूब ने पाकिस्तान में प्रजातंत्र को जो ठेंगा दिखाया तो आवाम लगभग 34 साल फौजी जनरल का ठेंगा ही देखती रही और खुश होती रही।

जिस देश के 75 साल के इतिहास में 34 साल फौजी बूटों की आहट गूंजती रही वहां कैसा प्रजातंत्र विकसित हुआ होगा, इसका सहज अंदाज लगा सकते हैं। 1977 में पाकिस्तान पर कब्जा करने वाले जनरल जिया उल हक ने फौजी शासन को लोकप्रिय विकल्प बनाने के लिए मुल्ला मौलवी बिरादारी को अपने साथ लेने की पहल शुरु की। उस सच्चे इस्लामिक स्टेट को साकार करने का सपना जिया उल हक ने अपने हाथों में लिया जिसमें तबला व पखावज हराम थे लेकिन बंदूक व गोली हलाल। अपने लगभग 11 साल के शासन में उन्होंने जो मिलिट्री मुल्ला अलायंस बनाया उसकी फसल अच्छी आयी। देखते ही देखते पाकिस्तान एक रोग स्टेट में परिवर्तित हो गया।

हालांकि ये सब देखने के लिए खुद जिया उल हक जिन्दा नहीं रहे लेकिन इस बीच कुछ राजनीतिक हलचल भी होती रही। सोशलिस्ट से इस्लामिस्ट बनने की कोशिशों में शहीद हुए जुल्फिकार अली भुट्टो की विरासत उनकी बेटी बेनजीर ने संभाली तो इधर अमृतसर के जाति उमरा गांव से लाहौर गये शरीफ परिवार ने राजनीतिक विरासत अपने हाथ में ली। लेकिन जिस इस्लामिक राज्य में ये बात लोगों के मन में बिठाई जा रही हो कि डेमोक्रेसी हराम है, वहां कौन सी प्रजातांत्रिक पद्धति विकसित होती? अपने इलाहाबाद वाले खुतबे में अल्लामा इकबाल ने भी तो इसी आधार पर अलग इस्लामिक राज्य मांगा था कि उस खित्ते से सबसे अधिक फौजी ब्रिटिश फौज में आते हैं। फिर उस खित्ते की फौज अगर 'जिहाद फी सबीलिल्लाह' के नारे के साथ युद्ध करने जाती है तो सच्चे इस्लामिक अवाम का समर्थन उसे क्यों नहीं मिलेगा?

इस तरह 75 साल की पाकिस्तानी यात्रा में चार अलग अलग हाईवे बन गये। चौथा हाईवे ज्यूडिशियरी का है जो इधर के सालों में ज्यादा मुखर हुआ है। यह पाकिस्तान में ही संभव है कि वहां का सुप्रीम कोर्ट खुद से इलेक्शन की घोषणा कर दे तो सरकार इलेक्शन करवाने का पैसा ही न जारी करे। स्वाभाविक है पंजाब में इमरान खान के प्रभाव में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव का आदेश तो दे दिया लेकिन शरीफ सरकार ने चुनाव तो दूर, कानून बनाकर मीलार्ड लोगों के ही अधिकार छीन लिये। अभी मीलार्ड लोग बेंच बनाकर अपने अधिकारों में की गयी कटौती की समीक्षा ही कर रहे थे कि रेंजर्स ने इमरान खान को ही गिरफ्तार कर लिया।

मतलब, मुल्ला मौलवी, पोलिटिकल लीडरशिप, फौजी लीडरशिप और ज्यूडिशियल लीडरशिप सब आपस में गुत्थमगुत्था हैं कि पाकिस्तान में किसकी चलेगी। कौन सबसे ऊपर है और सबसे अधिक ताकतवर भी। स्वाभाविक है ये सारी खींचतान ऐसे समय में हो रही है जब जून के बाद सैलेरी देने के लिए वहां की सरकार के पास पैसा नहीं है। विश्व की वित्तीय संस्थाएं क्रेडिट रेटिंग गिरा रही हैं और उसके दिवालिया होने का अंदेशा जता रही हैं। लेकिन इसकी फिक्र किसे है? माल ए गनीमत के रुप में मिले पाकिस्तान में माल ए गनीमत वाली मानसिकता कैसे मर जाएगी?

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    इसलिए ये खींचतान कितने साल चलेगी और चलते हुए कहां पहुंचेगी, इसको समझने की जरूरत नहीं है। जो जानने की जरूरत है वो यह कि खींचतान में चीजें हमेशा टूट जाया करती हैं। आज नहीं तो कल पाकिस्तान की ये खींचतान उसके टूट जाने का कारण बनेगी। यह टूट शायद वैसी न हो जैसी बांग्लादेश के रूप में हुई लेकिन ये टूट पाकिस्तान को कबिलाई वार लॉर्ड्स की ओर लेकर जाएगी। ठीक वैसे ही जैसे अफगानिस्तान गया और वह लौटकर वापस नहीं आ पाया। सच्चे इस्लाम की तलाश में भटक गये लोगों का इससे सुखद अंत भला और क्या होगा?

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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