Opposition Unity: तीन कन्नौजिया तेरह चूल्हा वाली विपक्षी एकता
Opposition Unity: 2024 के आम चुनाव की पृष्ठभूमि में देश के सारे विपक्षी दल सक्रिय हो गए हैं। भाजपा के चंद सहयोगी दलों को छोड़कर सब का एकमात्र एजेंडा बन गया है कि एन-केन-प्रकारेण भाजपा को सत्ता से अपदस्थ किया जाए। विपक्षी दलों के सामने यह छोटी नहीं बल्कि बहुत बड़ी चुनौती है, क्योंकि ऐसा वे तभी कर सकते हैं जब वे सभी एकजुट हो जाएं, उनके पास विचारगत, नीतिगत और कार्यक्रमबद्ध साझी रणनीति हो। लेकिन इधर जो परिदृश्य दिख रहा है उसमें ऐसी संभावना लगभग क्षीण है।
कांग्रेस विपक्षी एकता की धुरी बनना चाहती है, और उसकी अंतर्निहित शर्त यह है कि एकीकृत विपक्ष का नेतृत्व उसका ही हो। कांग्रेस को लग रहा है कि भारत जोड़ो यात्रा तथा अमेरिका यात्रा के बाद राहुल गांधी भाजपा के विरोधी खेमे के नेतृत्व के लिए पूरी तरह तैयार हो गए हैं। इसीलिए कांग्रेस का पहला शिकार बने नीतीश कुमार। बीते 12 जून को पटना में बुलाई गई बैठक उन्हें स्थगित करनी पड़ी। कांग्रेस ने संदेश दिया कि विपक्षी एकता की अगुवाई किसी और नेता के नेतृत्व में मंजूर नहीं है, और नीतीश कुमार भी गलतफहमी में ना रहें। विपक्षी एकता की अगुवाई कांग्रेस ही करेगी।

मालूम हो कि नीतीश कुमार अभी तक किसी ऐसे दल को विपक्षी एकता की मुहिम से जोड़ नहीं पाए हैं जो पहले से कांग्रेस के साथ न रहा हो। ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और केजरीवाल जैसे तमाम नेता आगे क्या करेंगे, कौन सा राजनीतिक मूव लेंगे, कहा नहीं जा सकता। ऐसे में सवाल है कि एकता के प्रयास में सुशासन बाबू ने अब तक क्या पाया? इस प्रश्न का सीधा और सरल उत्तर तो यही है "बैठक की एक और तारीख"। तारीख पर तारीख से गुजरते हुए अब एक नई तारीख 23 जून 2023 प्रस्तावित की गई है।
23 जून की बैठक के लिए कांग्रेस के बड़े नेताओं सहित पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, एनसीपी के शरद पवार, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन तथा भाकपा माले के नेता दीपांकर भट्टाचार्य ने अपनी सहमति दे दी है। बिहार में भाजपा को 10 से कम सीटों पर समेट देने का दावा करने वाले सुशासन बाबू अपने उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के साथ मिलकर बैठक की तैयारियों में जुटे हुए हैं।
केंद्र की वर्तमान सरकार को दिल्ली की गद्दी से उखाड़ फेंकने के नारे के साथ होने वाली मैराथन बैठक के राजनीतिक मंथन से एकता का कैसा अमृत निकलता है यह तो बैठक के बाद ही स्पष्ट होगा, लेकिन उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती और यहां तक की नीतीश कुमार के अत्यंत करीबी रहे जीतन राम मांझी ने भी बैठक के पहले ही बाय-बाय कह दिया है।
अमेरिका से लौटे राहुल गांधी जरूर आत्मविश्वास से भरे नजर आ रहे हैं। अभी हाल ही में अमेरिका में उन्होंने कहा कि एकता का गणित देख लीजिए आपको समझ में आएगा। उनको पता नहीं है कि ऐसे न जाने कितने गणित कब और कैसे हवा में उड़ गए किसी को पता नहीं चला। साल 1971 में कांग्रेस विरोधी पार्टियों को भी ऐसा ही लगा था। जी-जान लगाकर विपक्ष एक हुआ था पर आंधी चली थी इंदिरा गांधी की। पिछले लोकसभा चुनाव में गणित के चक्कर में मायावती अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी भूल कर बैठी तथा सपा को गेस्ट हाउस कांड के लिए माफ करके उससे हाथ मिला लिया। अब तक पछता रही हैं। ऐसे ही अंकगणित को देखकर ही 2019 में कांग्रेस ने कर्नाटक में जनता दल सेकुलर से गठबंधन कर लिया था। नतीजा यह हुआ कि दोनों का सफाया हो गया।
दूसरी ओर भाजपा बिजली की तेजी से आगे बढ़ रही है। आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी, और चंद्रबाबू नायडू दोनों उसके साथ आने को तैयार है। कर्नाटक में देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल एस को लग रहा है कि राजनीति को बचाना है तो भाजपा के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। बिहार में उपेंद्र कुशवाहा, पूर्वी उत्तर प्रदेश में ओमप्रकाश राजभर भाजपा के लिए एक पैर पर खड़े हैं। पंजाब में अकाली दल ने भी राजनीतिक गणित समझ लिया है कि बगैर भाजपा के सहयोग के सत्ता तक नहीं पहुंचने वाले हैं। इसलिए अब अकाली दल के नेता भाजपा की 'हां' का इंतजार कर रहे है।
सत्तारूढ़ खेमे में नेतृत्व का मुद्दा पहले से ही तय है। सीटों के बंटवारे में कोई समस्या नहीं है। विपक्षी खेमे में नेतृत्व का मुद्दा तय करने के गंभीर प्रयास किये गए तो एकता बनने से पहले टूट सकती है। सीटों का बंटवारा सबसे कठिन काम है। क्षेत्रीय दल चाहते हैं कि कांग्रेस 200 से 225 सीटों पर चुनाव लड़े और बाकी उनके लिए छोड़ दे। विपक्षी एकता (यदि कोई मूर्त रूप लेती है) की सूरत में भी कांग्रेस पार्टी कम से कम 300 सीटों पर अपना उम्मीदवार खड़ा करने का खाका तैयार कर चुकी है।
वर्ष 1989 से 2014 तक के 25 साल का समय क्षेत्रीय दलों की राजनीति के लिए स्वर्ण काल था। वर्ष 2014 में भाजपा के नेतृत्व में बहुमत की सरकार बनने के बाद क्षेत्रीय दलों की भूमिका सीमित हो गई है। यदि वे कांग्रेस का सीट बंटवारे का फार्मूला मान लेते हैं तो उनकी भूमिका और सीमित हो जाएगी। क्षेत्रीय दल इससे भलीभांति परिचित हैं। ममता बनर्जी और अखिलेश यादव पहले ही कह चुके हैं कि उनके लिए विपक्षी एकता का मतलब है बंगाल और उत्तर प्रदेश का मैदान तृणमूल कांग्रेस और सपा के लिए छोड़ दिया जाए।
हालांकि नीतीश कुमार का फार्मूला है कि प्रत्येक लोकसभा सीट पर एक साझा उम्मीदवार खड़ा करने पर सहमति बन जाती है तो भाजपा को पटखनी दी जा सकती है। मौजूदा हालात को देखते हुए यह अभी दूर की कौड़ी जैसी है। वर्ष 1977 और वर्ष 1989 को छोड़ दें तो आजादी के बाद से देश में विपक्षी एकता की हर एक कवायद तीन कनौजिया तेरह चूल्हों वाली ही रही है। जितने दल उतने ज्यादा विवाद। अंत में सबकी खिचड़ी अलग ही पकती है।
मालूम हो कि 2014 के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने अकेले दम पर शानदार सफलता हासिल की। 2014 के मुकाबले 6.36 प्रतिशत वोट और 21 अधिक सीटें हासिल की थीं। उसे अकेले 303 और राजग को कुल 350 सीटें हासिल हुई थी। कांग्रेस को पिछले चुनाव के मुकाबले केवल 0.18% वोट और 8 सीटें ही अधिक मिल पाई थी। दोनों के बीच वोटों का अंतर दोगुने का था। कांग्रेस के 19.49% के मुकाबले भाजपा को 37.36% वोट प्राप्त हुए थे। इस बीच ऐसा क्या खास हो गया कि कांग्रेस के दिन बहुरने की आशा की जाए?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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