Opposition Agenda: मौके ढूंढता विपक्ष अपने इतिहास से लाचार
भारत और चीन के सैनिकों के बीच अरुणाचल प्रदेश के तवांग में जो झड़प हुई, विपक्ष उसे लेकर केंद्र सरकार को घेरना चाहता था। लेकिन, विपक्ष अपने इतिहास के आगे लाचार नजर आ रहा है।

मोदी सरकार सीमा पर चीन से लड़ रही है, और संसद में विपक्ष से। एक समय था, जब संसद में विपक्ष सरकार की खाल खींच लेता था। लेकिन आज के विपक्ष ने सत्ता में रहते इतनी गलतियां कर रखी हैं कि सरकार संसद के भीतर और संसद के बाहर विपक्ष की खाल खींच रही है। चीन के मुद्दे पर जब जब कांग्रेस कुछ बोलती है, वह खुद घिर जाती है, क्योंकि चीन के मुद्दे पर उसने खुद इतने पाप कर रखे हैं कि मोदी सरकार उसके इतिहास का पिटारा खोल देती है।
चीन वैसे तो कभी लद्दाख में तो कभी अरुणाचल प्रदेश में भारतीय क्षेत्र में घुसने की कोशिश करता ही रहता है, लेकिन भारत अमेरिका के संयुक्त सैन्य अभ्यास के बाद से चीन ज्यादा ही आक्रामक हो रहा है। 8 दिसंबर की रात को चीनी सेना के 300 जवानों ने अरुणांचल के तवांग क्षेत्र में नाला पार कर के एलएसी पार की थी, पूर्वी तवांग में एलएसी के पास यांगस्ते पॉइंट पर एक नाला है। इस नाले के एक तरफ भारत और दूसरी ओर चीन के सैनिक तैनात हैं। भारतीय सेना ने जब मुहंतोड़ जवाब देना शुरू किया, तो चीनी सेना वापस भाग खड़ी हुई।

सोमवार को भारतीय सेना की और से इस घटना पर विस्तृत बयान जारी करके बताया गया कि 17 हजार फीट की ऊंचाई पर हुई झड़पों में भारतीय सेना के 6 जवानों को चोटें आई हैं। यह घटना 15 जून 2020 में हुई गलवान घाटी में हुई घटना जैसी हिंसक नहीं थी, जिसमें भारत के 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए जबकि चीन के 42 से ज्यादा सैनिकों के मारे जाने की बातें सामने आई थीं।
गलवान हिंसा के बाद यह सबसे बड़ी घटना है, लेकिन किसी भारतीय सैनिक को गंभीर चोट नहीं आई है। तवांग सेक्टर में भारत और चीन का दावा है, दोनों अपनी-अपनी सीमा में पेट्रोलिंग करते हैं, लेकिन चीनी सैनिक जब हेकड़ी दिखाने की कोशिश करते हैं तो झड़प हो जाती है। 2006 से इस इलाके में कई बार झड़पें हो चुकी हैं।
रक्षामंत्री राजनाथ सिंह 12 बजे लोकसभा में और 12.30 बजे राज्यसभा में बयान देने वाले वाले थे। 10 बजे उन्होंने विदेश मंत्री जयशंकर, सीडीएस, तीनों सेना प्रमुखों और विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की साझा बैठक बुलाई हुई थी। क्योंकि विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे को कूटनीतिक लेवल पर भी उठाया था। लेकिन विपक्ष ने 11 बजे सदन की कार्यवाही शुरू होते ही हंगामा कर दिया। जिस समय रक्षामंत्री की बैठक चल रही थी, उस समय विपक्ष के नेता कार्य स्थगन प्रस्ताव का नोटिस लिख रहे थे, और सदन में लगाने के लिए नारे गढ़ रहे थे।
भाजपा की सरकार बनने के बाद सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष की कार्यशैली में बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले विपक्ष सरकार को घेरने की पूरी तैयारी के साथ आता था, उसके पास सरकार को कटघरे में खड़ा करने का अच्छा खासा बैक ग्राउंड मेटीरियल हुआ करता था। अब उलटा हो रहा है, विपक्ष सिर्फ हंगामा करता है, सरकार विपक्ष को कटघरे में खड़ा करती है।
हंगामें के बीच जब 12 बजे तक के लिए दोनों सदनों की कार्यवाही स्थगित हो गई, तो संसद भवन के भीतर ही अमित शाह ने मीडिया के सामने आकर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस से इतने सवाल पूछ डाले कि उन्हें जवाब देते नहीं बन पा रहा। गृहमंत्री ने कहा कि कांग्रेस ने सीमा पर झड़प का मुद्दा इसलिए उठाया है, क्योंकि वह राजीव गांधी फाउंडेशन पर हुई एफसीआरए उल्लंघन की कार्यवाही के जवाब से बचना चाहती है।
असल में गृह मंत्रालय ने हाल ही में राजीव गांधी फाउंडेशन के विदेशी धन लेने के लाईसेंस को रद्द कर दिया है, क्योंकि राजीव गांधी फाउंडेशन ने भारत चीन दोस्ती बनाए रखने के नाम पर चीनी दूतावास से 1.35 करोड़ रुपये लिए थे, जबकि राजीव गांधी फाउंडेशन का रजिस्ट्रेशन गरीबों की मदद करने के लिए हुआ है।
अपना हमला जारी रखते हुए अमित शाह ने कांग्रेस के राज में भारत की हजारों किलोमीटर जमीन हड़पने और जवाहर लाल नेहरू की ओर से सुरक्षा परिषद की सदस्यता तश्तरी में रख कर चीन को सौंपे जाने का मुद्दा भी उठाया। अमित शाह ने कहा कि जब तक नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, कोई भारत की एक इंच भूमि पर भी कब्ज़ा नहीं कर सकता।
अरुणाचल प्रदेश के इस इलाके पर चीन अपना अनाधिकृत दावा करता रहा है। कुछ साल पहले जब दलाई लामा अरुणाचल प्रदेश गए थे, तो चीन ने एतराज जताया था। पिछले साल चीन ने अरुणाचल प्रदेश की सीमा से लगे क्षेत्र में 15 स्थानों के नाम चीनी और तिब्बती रख दिए थे। इसके पहले 2017 में भी चीन ने 6 जगहों के नाम बदले थे। चीन दक्षिणी तिब्बत को अपना क्षेत्र बताता है। उसका आरोप है कि भारत ने उसके तिब्बती इलाके पर कब्जा करके उसे अरुणाचल प्रदेश बना दिया।
भारतीय क्षेत्र के तवांग इलाके में अगर चीनी सेना एलएसी पार कर के घुस आने के बाद कुछ क्षेत्र पर कब्जा कर लेती, भारतीय सेना ने उसे वापस नहीं धकेल दिया होता तो यह बहुत ही गंभीर मामला होता। विपक्ष को संसद में सवाल उठाने का पूरा अधिकार है, संसद के बाहर भी सरकार से सवाल पूछने का अधिकार है। लेकिन जब सेना ने एक दिन पहले ही घटना का ब्योरा जारी कर दिया था, तो विपक्ष को सदन में रक्षामंत्री के बयान का इन्तजार करना चाहिए था।
रक्षामंत्री की तरफ से संसद में बयान देना सूचीबद्ध हो गया था, तो फिर संसद में हंगामा करने की क्या जरूरत थी। ऐसा नहीं है कि चीनी सेना को वापस धकेल देने के बाद भारतीय सेना बेफिक्र हो कर बैठ गई है। उस घटना के बाद से भारतीय वायुसेना एक्टिव कॉम्बैट पैट्रोल उड़ानें भर रही है, ताकि चीन पर नजर भी रखी जा सके और अगर पीएलए वायुक्षेत्र का उल्लंघन करती है तो उसे रोका जा सके।












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