Opposition Alliance: ममता ने इंडी एलायंस का नुकसान बहुत गहरा किया

19 दिसंबर से यह चर्चा खत्म नहीं हो रही कि ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री पद के लिए मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम का प्रस्ताव क्यों रखा। कुछ घाघ किस्म के राजनीतिज्ञों का कहना है कि ममता को राहुल गांधी का नाम सामने आने का खतरा था, जिसे वह विपक्ष के लिए आत्महत्या जैसा मानती हैं। आम धारणा यही है कि जब तक मोदी के सामने राहुल गांधी का चेहरा है, मोदी को कोई नहीं हरा सकता।

मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम के दूसरे प्रस्तावक अरविन्द केजरीवाल थे, जिनसे ममता बनर्जी ने बैठक से पहले बात कर ली थी। उद्धव ठाकरे भी वीर सावरकर की आलोचना करते रहने वाले राहुल गांधी को पसंद नहीं करते। राहुल गांधी ने महाराष्ट्र में अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान वीर सावरकर को कायर कह कर उद्धव ठाकरे की राजनीति को बहुत नुकसान पहुंचाया है। जिसका नतीजा उद्धव ठाकरे और शरद पवार ने भी पंचायत चुनावों के नतीजों में देख लिया है।

Opposition Alliance: Mamata Banerjee caused deep damage to Indi Alliance

अरविन्द केजरीवाल 2014 से ही खुद को मोदी के विकल्प के रूप में तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने पहला लोकसभा चुनाव भी इसीलिए मोदी के सामने वाराणसी से लड़ा था, उसके बाद से वह लगातार नरेंद्र मोदी पर हमलावर होते रहे हैं, ताकि देश की जनता उन्हें विकल्प के तौर पर देखे। राहुल गांधी भी खुद को प्रधानमंत्री पद के लिए तैयार कर रहे हैं, इसलिए 2014 से वह भी नरेंद्र मोदी पर हमलावर बने हुए हैं, ताकि देश की जनता उन्हें मोदी के विकल्प के रूप में देखे।

Opposition Alliance: Mamata Banerjee caused deep damage to Indi Alliance

कुछ साल पहले तक ममता बनर्जी भी खुद को नरेंद्र मोदी का विकल्प बनाने की कोशिश कर रही थीं। पश्चिम बंगाल में 2020 का विधानसभा चुनाव जीतने के बाद विपक्षी एकता की शुरुआत उन्होंने ही की थी। वह कई राज्यों में गईं थीं और भाजपा विरोधी दलों के नेताओं से मिलीं थी। मई और जून 2022 में राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष का साझा उम्मीदवार खड़ा करने की बैठकें उन्होंने ही बुलाईं थीं। उनकी बुलाई मीटिंग में सोनिया गांधी भी पहुंची थी।

ममता की कोशिश थी कि शरद पवार, फारूक अब्दुल्ला या गोपाल कृष्ण गांधी में से कोई चुनाव लड़े, लेकिन कोई भी तैयार नहीं हुआ तो ममता बनर्जी ने अपनी ही पार्टी के नेता यशवंत सिन्हा को प्रतीकात्मक उम्मीदवार बना दिया, जिसे 19 दलों ने समर्थन दिया था। लेकिन धीरे धीरे कई दल खिसक गए, जैसे उद्धव ठाकरे की शिवसेना और हेमंत सोरेन का झारखंड मुक्ति मोर्चा।

ममता बनर्जी को लगा कि राहुल गांधी ने राष्ट्रपति पद के साझा उम्मीदवार की उनकी कोशिशों को पंक्चर करने का काम किया था। राष्ट्रपति पद के चुनाव के समय ही उनकी प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी खत्म हो गई थी, क्योंकि वह विपक्ष को एकजुट नहीं रख पाई। इस कड़वे अनुभव के बाद ममता बनर्जी ने उपराष्ट्रपति पद के लिए साझा उम्मीदवार में उतनी दिलचस्पी नहीं दिखाई, और कांग्रेस पर आरोप भी लगाया कि उसने बिना सबकी सहमति लिए मारग्रेट अल्वा को उम्मीदवार बना दिया।

राष्ट्रपति पद के लिए साझा उम्मीदवार खड़ा करना विपक्ष को एकजुट करने का पहला प्रयास था। लेकिन जिस तरह विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा की दुर्गति हुई, उसके बाद ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल खुद प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बनना चाहते। लेकिन वे यह भी नहीं चाहते कि राहुल गांधी का नाम आगे हो। इसलिए जिस तरह नरेंद्र मोदी ने अपर कास्ट यशवंत सिन्हा के सामने आदिवासी द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना कर विपक्ष की एकता को भंग कर दिया था। उसी तरह ब्राह्मण ममता बनर्जी और बनिए अरविन्द केजरीवाल ने दलित चेहरे मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम आगे बढ़ाकर राहुल गांधी का पत्ता काट दिया।

इन दोनों ने विपक्ष के प्रधानमंत्री पद के चेहरे का मुद्दा उठाकर कांग्रेस की उस रणनीति को भी पंक्चर कर दिया, जो बिना चेहरे के चुनाव लड़ने की थी। मल्लिकार्जुन खड़गे शुरू से ही कहते रहे हैं कि प्रधानमंत्री पद का फैसला चुनाव जीतने के बाद होगा, फिलहाल भाजपा को हराने का लक्ष्य साध कर चुनाव लड़ना चाहिए। कांग्रेस की इसी रणनीति के कारण भाजपा विपक्ष से बार बार प्रधानमंत्री पद का चेहरा पूछ कर उसे बैकफुट पर लाने की कोशिश कर रही थी। ममता बनर्जी ने मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम लेकर विपक्ष के चेहरे को चुनावी मुद्दा बना दिया है, जबकि कांग्रेस इससे बचना चाहती थी।

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस दलित चेहरे के तौर पर मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम आगे नहीं करना चाहती, लेकिन उससे पहले जरूरी है कि सभी दलों के साथ सीटों का बंटवारा तो हो जाए, अभी तो यह भी तय नहीं है कि कौन गठबंधन में रहेगा, कौन नहीं रहेगा। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, यूपी, बंगाल, महाराष्ट्र में सीटों का बंटवारा कोई आसान काम नहीं है।

अगर सीटों का बंटवारा हो भी जाता है, और ममता, केजरीवाल, अखिलेश, उद्धव ठाकरे गठबंधन में बने भी रहते हैं, तो इस बात का भी आकलन करना होगा कि दक्षिण भारत का दलित चेहरा आगे करने से उत्तर भारत में कोई फायदा होगा या उलटे नुकसान हो जाएगा। आकलन की बात यह भी है कि उत्तर भारत का प्रमुख दलित चेहरा मायावती अपने प्रदेश में ही नहीं चल पा रही। पिछले लोकसभा चुनावों के बाद जितनी भी विधानसभाओं के चुनाव हुए है बहुजन समाज पार्टी का वोट बैंक घटता चला गया है। उत्तर प्रदेश में जहां कभी वह अपने बूते पर बहुमत पा गई थी, इस बार के विधानसभा चुनाव में सिर्फ एक सीट और 21 प्रतिशत वोट से घटकर 13 प्रतिशत वोट पर आ गई।

जब उत्तर भारत में मायावती के रूप में लोकप्रिय दलित चेहरा होने के बावजूद दलित वोट भारतीय जनता पार्टी की तरफ खिसक गया है, तो दक्षिण भारतीय दलित चेहरा उत्तर भारत में कैसे चलेगा। कांग्रेस अध्यक्ष बनने से पहले कोई मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम तक नहीं जानता था, वह मोदी के पहले शासनकाल में पांच साल तक लोकसभा में कांग्रेस के नेता थे, इसके बावजूद उत्तर भारत के दलित तक उन्हें नहीं जानते थे। किसी को यह भी नहीं पता था कि वह दलित समुदाय से आते हैं।

पांच साल तक लोकसभा में कांग्रेस का चेहरा होने के बावजूद खुद खड़गे के निर्वाचन क्षेत्र के वोटरों ने 2019 में उन्हें ठुकरा दिया था। सोनिया गांधी उनके दलित होने का फायदा उठाना चाहती हैं, इसीलिए गुलाम नबी आज़ाद, कपिल सिब्बल और आनन्द शर्मा जैसे बड़े चेहरों को किनारे कर के मल्लिकार्जुन खड़गे को राज्यसभा में लाकर विपक्ष का नेता बनाया गया और फिर कांग्रेस का अध्यक्ष भी बनाया गया।

कांग्रेस इस तरह की कोशिश में थी कि मायावती इंडी एलायंस में शामिल हों, मल्लिकार्जुन खड़गे और मायावती की जोड़ी पूरे देश में दलित वोटरों को एकजुट करके भारतीय जनता पार्टी से उन्हें तोड़े। जिस तरह कर्नाटक में दलित-मुस्लिम का तालमेल बना, वैसा ही उत्तर भारत में भी बने। पिछड़ों को लालू यादव, नीतीश कुमार और अखिलेश यादव नेतृत्व दें। इस तरह उत्तर भारत की हिन्दी पट्टी में दलित, मुस्लिम और पिछड़ों का समीकरण बने।

इसी रणनीति को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस के कई नेता मायावती से संपर्क बना रहे थे, लेकिन ममता बनर्जी ने वक्त से पहले मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम सामने रख कर कांग्रेस की सारी रणनीति पर पानी फेर दिया। उधर अखिलेश यादव को जैसे ही इस बात की भनक लगी कि कांग्रेस के नेता मायावती से संपर्क कर रहे हैं, उन्होंने इंडी एलायंस की बैठक में मायावती को लेकर सवाल उठा दिया कि उनसे कौन बात कर रहा है।

अखिलेश यादव नहीं चाहते कि मायावती गठबंधन में शामिल हों, क्योंकि विधानसभा चुनावों में उन्होंने मायावती पर बढ़त बना ली है, और वह नहीं चाहते कि गठबंधन में शामिल होकर वह अपनी जमीन फिर से हासिल करे। जबकि मायावती शुरुआती ना नुकुर के बाद इंडी एलायंस में शामिल होने में फायदा देख रही हैं।

दूसरी तरफ अखिलेश यादव 2019 के कड़वे अनुभव को भूले नहीं हैं। मायावती से चुनावी गठबंधन करके समाजवादी पार्टी को कोई फायदा नहीं हुआ, बल्कि गैर यादव पिछड़ी जातियों का वोट ही खिसक कर भाजपा के साथ चला गया, क्योंकि मायावती के शासनकाल में अनुसूचित जाति क़ानून का सबसे ज्यादा शिकार पिछड़ी जातियों के लोग हुए थे, इसलिए वे मायावती को कतई पसंद नहीं करते। कांग्रेस को पता है कि अखिलेश यादव के पास उत्तर प्रदेश में सिर्फ यादव वोट ही बचा है, जबकि मायावती के पास पूरे उत्तर भारत में एक से 13 प्रतिशत तक वोट है। इसलिए वह अखिलेश यादव के छोड़कर जाने की कीमत पर भी मायावती को शामिल करने की कोशिश में थी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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