Opposition Alliance: गठबंधन की गांठ नहीं खोल पा रही कांग्रेस
कांग्रेस को बिहार, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में सीट शेयरिंग के लिए राजद अध्यक्ष लालू यादव, आप अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल, और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के सामने घुटने टेकने पड़े। इन तीनों ही राज्यों की 127 सीटों में से कांग्रेस को सिर्फ 29 सीटें लड़ने को मिली हैं।
पिछली बार इन तीनों राज्यों में कांग्रेस मात्र दो सीटें जीती थीं। पश्चिमी बंगाल और पंजाब में कांग्रेस ने ममता और केजरीवाल के सामने ज्यादा सीटें मांगने की जिद्द की तो दोनों ने सीट शेयरिंग से ही इंकार कर दिया। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा पेच फंसा है, जहां चार पार्टियों में से कांग्रेस चौथे नंबर की पार्टी होने के बावजूद ज्यादा सीटों की मांग पर अड़ी है।

अगर कांग्रेस ने अपनी ज़िद्द नहीं छोडी तो पंजाब, बंगाल की तरह महाराष्ट्र में भी गठबंधन की संभावनाएं खत्म हो जाएँगी। लोकसभा में एनसीपी चार और विधान सभा में 53 सीटें जीती थी, जबकि कांग्रेस लोकसभा में सिर्फ एक और विधानसभा में 45 सीटें जीत कर राज्य में चौथे नंबर की पार्टी बन गई थी।
भाजपा और शिवसेना ने मिल कर चुनाव लडा था। लोकसभा में भाजपा 25 सीटें लड़कर 23 जीती और शिवसेना 23 सीटें लड़कर 18 जीती, इसी तरह विधानसभा में भाजपा 122 सीटें लड़कर 105 जीती और शिवसेना 105 सीटें लड़कर सिर्फ 56 सीटें जीती थी। अब एनसीपी और शिवसेना दोनों टूट चुकी हैं, ओरिजनल शिवसेना और ओरिजनल एनसीपी पर बागियों का कब्जा हो चुका है, और दोनों कब्जाधारी एकनाथ शिंदे और अजीत पवार भाजपा के साथ जा चुके हैं।

शिवसेना के पुराने सुप्रीमो उद्धव ठाकरे और एनसीपी के पुराने सुप्रीमो शरद पवार के पल्ले कुछ नहीं बचा। कांग्रेस के पल्ले पहले ही कुछ नहीं था। इसके बावजूद तीनों दल एक एक सीट के लिए ऐसे लड़ रहे हैं, जैसे प्रधानमंत्री राहुल गांधी, शरद पवार और उद्धव ठाकरे में से कोई बनेगा। इन तीनों दलों की लड़ाई को देखकर इंडी एलायंस के चौथे दल के सुप्रीमो प्रकाश आंबेडकर अपना बोरिया बिस्तर लेकर पहले ही बाहर निकल गए हैं|
उद्धव ठाकरे ने एकतरफा 17 सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर दिए, तो दोनों पार्टियां नाराज हो गई। इनमें से एक सीट सांगली की भी है, जिस पर कांग्रेस ने बच्चों जैसी जिद्द पकड़ ली है। कांग्रेस की जिद्द को देखकर उद्धव ठाकरे की शिवसेना के सबसे मुखर नेता संजय राउत ने कह ही दिया कि कांग्रेस को सांगली सीट न मिली, तो क्या राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने से रह जाएंगे। इंडी एलायंस का कोई घटक राहुल गांधी की इससे ज्यादा खिल्ली और क्या उड़ाएगा।
लालू यादव ने भी राहुल गांधी के साथ कुछ ऐसा ही किया। राहुल गांधी ने लालू यादव से अन्य सीटों के साथ पूर्णिया और बेगुसराय सीटों पर ख़ास तौर पर आग्रह किया था। कांग्रेस पूर्णिया में पप्पू यादव को और बेगुसराय में कन्हैया कुमार को चुनाव लड़ाना चाहती थी। जबकि ये दोनों ही नेता पिछले कई सालों से लालू यादव की आँखों में खटक रहे हैं।
लालू यादव ऐसा मानते हैं कि इन दोनों नेताओं में तेजस्वी यादव के रास्ते का रोड़ा बनने की क्षमता है, इसलिए वह कतई नहीं चाहते कि ये दोनों नेता उन्हीं के कंधों पर सवार हो कर भविष्य में उनके बेटे के सामने चुनौती बनें। पिछले लोकसभा चुनाव में कन्हैया को हरवाने में भी लालू यादव की प्रमुख भूमिका थी।
उन्होंने कन्हैया के सामने एक मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा कर दिया था, भले ही राजद का उम्मीदवार सिर्फ 16 प्रतिशत वोटों पर निपट गया, लेकिन सीपीआई का उम्मीदवार कन्हैया भी सिर्फ 22 प्रतिशत वोटों पर अटक गया। अगर भाजपा के सामने सिर्फ कन्हैया कुमार ही होते, तो भी वह हारते जरुर, लेकिन हार का मार्जिन इतना ज्यादा नहीं होता।
कन्हैया और पप्पू यादव इस उम्मीद से कांग्रेस में शामिल हुए थे कि गठबंधन में उन्हें बेगूसराय और पूर्णिया सीटें मिल जाएँगी। पप्पू यादव की पत्नी रंजीता रंजन पहले से कांग्रेस में हैं, वह राहुल गांधी और प्रियंका से बात करके पप्पू यादव को कांग्रेस में लाई थी। राहुल और प्रियंका ने उन्हें पूर्णिया सीट दिलाने का वादा किया था।
लालू यादव को इस बात की भनक तक नहीं थी कि पप्पू यादव कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। कुछ दिन पहले लालू यादव और तेजस्वी दोनों बाप-बेटा पप्पू यादव को मिलने उनके घर गए थे, वे चाहते थे कि पप्पू यादव पिछली बातें भूल कर आरजेडी की टिकट पर मधेपुरा से चुनाव लड़ें। पप्पू यादव पूर्णिया और मधेपुरा दोनों सीटों से सांसद रह चुके हैं। लेकिन इस बार वह पूर्णिया से चुनाव लड़ने का मन बना चुके थे, जैसे ही वह कांग्रेस में शामिल हुए लालू यादव ने जेडीयू की विधायक बीमा भारती को बुला कर पूर्णिया सीट से उन्हें राजद का लोकसभा टिकट थमा दिया।
इसी तरह कन्हैया की बेगूसराय सीट उन्होंने गठबंधन के सहयोगी दल सीपीआई को दे दी। कन्हैया के दगा देकर कांग्रेस में जाने से खफा सीपीआई के महासचिव डी. राजा ने लालू यादव से मुलाक़ात कर बेगूसराय सीट खुद ही सीपीआई के लिए मांग ली थी। लालू यादव के लिए यह सोने पर सुहागा हो गया कि उन्हें बैठे बिठाए कन्हैया कुमार का पत्ता काटने का बहाना मिल गया।
राहुल गांधी सीट शेयरिंग में लालू यादव से न बेगूसराय ले सके, न पूर्णिया। सीटों के बंटवारे के बावजूद पप्पू यादव पूर्णिया से ही चुनाव लड़ने पर अड़े हुए हैं। 29 मार्च को सीट शेयरिंग हो जाने बाद उन्होंने एक्स पर लिखा कि पूर्णिया सीट कांग्रेस की झोली में डालूँगा। वह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पर दबाव बना रहे हैं कि उन्हें पूर्णिया से कांग्रेस की टिकट पर फ्रेंडली फाईट करने दें। लेकिन ऐसा संभव दिखाई नहीं देता।
इसलिए जिस मकसद को लेकर इंडी एलायंस बना था कि भाजपा के सामने देश भर में सभी सीटों पर विपक्ष का एक ही उम्मीदवार खड़ा किया जाए, वह मकसद पंजाब, बंगाल और महाराष्ट्र में फेल हो गया है। तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और उड़ीसा में पहले ही फेल हो चुका है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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