Opposition Alliance: यूपीए के नए अवतार की चाबी कांग्रेस के ही हाथ
तीनों हिन्दी भाषी राज्यों में करारी हार के बावजूद इंडी एलायंस में कांग्रेस अपनी रणनीति में कामयाब रही है। कांग्रेस ठंडा करके खाने में विश्वास रखने वाली पार्टी है। कर्नाटक की बैठक में सोनिया गांधी के यूपीए भंग करने के पीछे रणनीति यही थी कि इंडी एलायंस की बागडोर कांग्रेस के हाथ में आ जाए।
वैसे तो बिना किसी फैसले के ही महाराष्ट्र बैठक के बाद कांग्रेस ने गठबंधन की कमान अपने हाथ में ले ली थी। अब 13 जनवरी की ऑनलाइन मीटिंग में मल्लिकार्जुन खरगे को चेयरमेन चुन कर कांग्रेस ने कमान विधिवत अपने हाथ में ले ली है। हालांकि 28 दलों वाले इस गठबंधन की वर्चुअल बैठक में सिर्फ 9 दलों के नेता मौजूद थे। ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे और अखिलेश यादव या उनका कोई प्रतिनिधि बैठक में नहीं आया। देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में इन तीनों दलों के साथ सीट शेयरिंग का क्या कोई फार्मूला निकलेगा या नहीं।

यह शुरू से ही तय था कि कांग्रेस अगर नीतीश कुमार को संयोजक बनाएगी तो चेयरमेन का पद भी सृजित किया जाएगा। यह भी तय था कि चेयरमेन या तो सोनिया गांधी खुद बनेगी या मल्लिकार्जुन खरगे को बनाया जाएगा। कांग्रेस नीतीश कुमार को आगे रख कर चुनाव मैदान में कूदने की कतई इच्छुक नहीं थी। उसकी रणनीति मल्लिकार्जुन खरगे को ही चेयरमेन बनाने की थी, ताकि चुनावों में दलित चेहरे का फायदा हो।
खरगे के नाम से कांग्रेस यह संदेश भी देना चाहती थी कि अगर गठबंधन को सरकार बनाने का मौक़ा मिलता है, तो खरगे को प्रधानमंत्री बनाया जाएगा। हालांकि बैठक के बाद शरद पवार ने वही बात कही है, जो 19 दिसंबर की बैठक के बाद मल्लिकार्जुन खरगे ने कही थी कि पहले इतने सांसद तो जीत कर आएं कि सरकार बनाने का अवसर पैदा हो, उस समय प्रधानमंत्री तय होगा। लेकिन अपना चेयरपर्सन बनवा कर कांग्रेस ने इंडी एलायंस को अपने नियन्त्रण में लेकर विस्तृत यूपीए बनाने में सफलता हासिल कर ली है, यह कांग्रेस की बहुत बड़ी राजनीतिक रणनीतिक उपलब्धि मानी जाएगी।

19 दिसंबर की दिल्ली में हुई बैठक में ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए मल्लिकार्जुन खरगे का नाम आगे किया था। अगर नीतीश कुमार उस पर सहमत होते, तो वह भी ममता बनर्जी के प्रस्ताव का समर्थन कर देते। लेकिन उन्होंने सोचा ही नहीं था कि प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार या चेयरमेन बनाए जाने पर कोई विचार होगा। वह यही मान कर चल रहे थे कि चुनावों से पहले सिर्फ संयोजक बनाया जाएगा, जिसके लिए उनकी पार्टी का दावा भी था।
19 दिसंबर की बैठक में जब नीतीश कुमार को संयोजक बनाने का फैसला नहीं हुआ, तो 29 दिसंबर को जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद पार्टी के महासचिव केसी त्यागी ने कहा था कि इंडी एलायंस के आर्किटेक्ट नीतीश कुमार हैं, इसलिए संयोजक और प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार नीतीश कुमार ही हैं। पार्टी की इस आधिकारिक लाईन का नीतीश की तरफ से खंडन नहीं किया गया। पटना में जब नीतीश कुमार से संयोजक पद के मुद्दे पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने जरुर कहा था कि वह किसी पद के इच्छुक नहीं हैं।
राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा का एलान करते वक्त जब मल्लिकार्जुन खरगे से नीतीश कुमार को संयोजक बनाए जाने पर सवाल पूछा गया था, तो उन्होंने कहा था कि यह सवाल कौन बनेगा करोड़पति जैसा बन गया है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि आने वाले 15 दिन में संयोजक और अन्य पदों पर फैसला हो जाएगा।
यह संकेत काफी था कि नियुक्ति सिर्फ संयोजक पद की नहीं होगी, कांग्रेस अपने प्री प्लान के मुताबिक़ ही चेयरमेन का पद अपने पास रखने की रणनीति पर ही काम कर रही है। इसी के बाद नीतीश कुमार ने कह दिया था कि वह किसी पद के इच्छुक नहीं हैं। 13 जनवरी की वर्चुअल बैठक में भी जब संयोजक पद पर उनके नाम का प्रस्ताव आया, तो उन्होंने वही बात दोहराई कि वह किसी पद के इच्छुक नहीं हैं। लेकिन इसे उनकी नाराजगी के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि उनकी पार्टी कुछ और कह रही थी, और वह खुद कुछ और कह रहे हैं।
बेंगलुरु की बैठक में लालू यादव और तेजस्वी भी इस बात से नाराज हो कर निकले थे कि नीतीश कुमार को संयोजक बनाने का फैसला क्यों नहीं किया जा रहा। जेडीयू ने तो पटना, बेंगलुरु और मुम्बई बैठक स्थलों पर नीतीश कुमार को भावी प्रधानमंत्री बताने वाले होर्डिंग तक लगवाए थे।
नीतीश कुमार की पलटू राम की छवि के कारण कांग्रेस एलायंस की पूरी बागडोर उनके हाथ में देने को कभी भी तैयार नहीं थी। इसीलिए सोनिया गांधी ने बेंगलुरु में यूपीए भंग करने और उसके चेयरपर्सन पद से इस्तीफे का एलान किया था। यह एलान पटना में नहीं किया गया था।
अब जब नीतीश कुमार ने संयोजक बनने से इंकार कर दिया है और श्रीराम जन्मभूमि के शिलान्यास में शामिल होने या नहीं होने पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं, तो उनकी निष्ठा पर फिर सवाल उठने लगा है। उनकी अगली चाल क्या होगी, उसे लेकर इंडी एलायंस में ही आशंका बनी हुई है। वैसे उनकी ओर से पद ठुकराने के और भी कई कारण हैं।
पहला कारण तो यह है कि अखिलेश यादव की तरह वह कांग्रेस को विश्वसनीय नहीं मानते। दूसरा कारण यह है कि उनके लालू यादव के साथ भी उस तरह के रिश्ते नहीं रहे, जैसे मुम्बई बैठक तक बने हुए थे। जेडीयू के 11-12 विधायकों की लालू यादव से मुलाक़ात के बाद दोनों के बीच अविश्वास की गहरी खाई उत्पन हो चुकी है।
नीतीश कुमार पहले कहते थे कि भाजपा जेडीयू को निगल जाना चाहती है, अब उन्हें आशंका है कि लालू यादव उनकी पार्टी को निगल जाना चाहते हैं। इसलिए अब उनकी प्राथमिकता पहले अपना घर सुरक्षित और किला मजबूत करने की है। नीतीश कुमार की नेतागिरी तभी बनी रह सकती है, अगर वह एलायंस में मिली सभी 16 सीटों को जीतें। इसलिए संयोजक बन कर राष्ट्रीय नेतृत्व पर नजर टिकाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल करना। चुनाव बाद उनके हाथ में जितनी ज्यादा सीटें होंगी, उनकी उतनी ज्यादा हैसियत होगी।
हैरानी वाली बात यह हुई कि जब नीतीश कुमार ने संयोजक बनने से इंकार कर दिया, तो किसी अन्य को संयोजक बनाए जाने पर चर्चा ही नहीं हुई। बल्कि बैठक में कहा गया कि संयोजक बनाने की जरूरत ही नहीं। जहां तक इंडी एलायंस का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार प्रोजेक्ट करने की बात है, तो मल्लिकार्जुन खरगे इंडी एलायंस के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार तय नहीं किए गए हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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