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Odisha Elections: उड़ीसा के नायक बने रहेंगे पटनायक या मोदी बनेंगे महानायक?

Odisha Elections:लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के एक महीने पहले से प्रधानमंत्री मोदी देशभर में ताबडतोड़ रैलियां कर रहे थे। गैर भाजपा शासित राज्यों में जनता से मुखातिब होते वक्त प्रधानमंत्री मोदी राज्य की मौजूदा सरकार पर जुबानी हमले का कोई मौका नहीं चूकते लेकिन ओडिशा में ऐसा नहीं हुआ था।

5 मार्च को एक कार्यक्रम के दौरान राज्य के मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल के प्रमुख नवीन पटनायक के साथ मंच साझा करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने नवीन पटनायक की तारीफ करते हुए उन्हें अपना दोस्त बताया और बदले में मुख्यमंत्री ने भी प्रधानमंत्री की तारीफ करते हुए कहा कि मोदी ने भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाने की दिशा में काम किया है।

Odisha Elections

जिस वक्त मोदी नवीन पटनायक की तारीफ कर रहे थे, उस समय अमित शाह उड़ीसा में गठबंधन की बातचीत शुरू करने का निर्देश उड़ीसा के स्थानीय नेताओं को दे रहे थे। ऐसा लग रहा था कि 1998 में भाजपा के साथ गठबंधन में जुड़ी और 2009 में भाजपा से अलग हुई बीजू जनता दल 14 साल बाद एक बार फिर एनडीए का हिस्सा बनने जा रहा है।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कई दौर की बातचीत के बाद 22 मार्च को उड़ीसा भाजपा के अध्यक्ष मनमोहन सामन ने सोशल मीडिया पर घोषणा कर दी कि भाजपा प्रधानमंत्री मोदी के दूरगामी नेतृत्व में लोकसभा की सभी 21 सीटों और विधानसभा की 147 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। ठीक उसी समय बीजू जनता दल के संगठन महामंत्री प्रणब प्रकाश दास ने भी एलान कर दिया कि बीजद लोकसभा और विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने जा रही है।

भारतीय जनता पार्टी और बीजू जनता दल के बीच गठबंधन न बन पाने का प्रमुख कारण यह रहा कि भाजपा चुनाव बाद उड़ीसा की नई सरकार में शामिल होना चाहती थी, लेकिन उसके लिए बीजद तैयार नहीं था। बीजू जनता दल को इस बात का पूरा भरोसा है कि वह अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल कर लेगी। ऐसे में वह सत्ता मेें हिस्सेदारी देने का मन नहीं बना सकी। भाजपा ने उड़ीसा सरकार में हिस्सेदारी देने के बदले मोदी सरकार में शामिल होने का प्रस्ताव बीजद को दिया था लेकिन नवीन पटनायक तैयार नहीं हुए।

वर्तमान में उड़ीसा विधानसभा में भाजपा के 23 विधायक और बीजद के 109 विधायक हैं। लोकसभा को देखें तो 21 लोकसभा सीटों में से 8 सीटें भाजपा के पास हैं और 12 सीटें नवीन पटनायक की पार्टी के पास हैं। भाजपा चाहती थी कि नवीन बाबू प्रदेश सरकार में हिस्सा दें और उसके बदले में केन्द्र सरकार में भी शामिल हो। लेकिन नवीन पटनायक को केन्द्र की राजनीति मे कोई रूचि नहीं है।

1998 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और बीजद ने मिलकर राज्य की 16 लोकसभा सीटें जीती थीं। भाजपा को 7 और बीजेडी को 9 सीटें मिली थीं। 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 9 और बीजद ने 10 सीटें जीती। 2004 के लोकसभा चुनाव में बीजद ने 11 और बीजेपी ने 7 लोकसभा सीटें जीती थी।

इसके बाद भाजपा और बीजद का गठबंधन टूट गया। गठबंधन टूटने की बड़ी वजह 2008 में हिंदू संत और वीएचपी के नेता रहे लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या थी। लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के बाद कंधमाल में दंगे हुए। इस दंगे में 38 लोग मारे गए और 20 हजार से ज्यादा विस्थापित हुए। इसके बाद 2009 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में नवीन पटनायक ने भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़ा और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।

2009 में गठबंधन टूटने के बाद से भाजपा उडीसा में अपनीे जड़ें जमाने की लगातार कोशिश कर रही है। लेकिन मोदी की लोकप्रियता के बाद भी उड़ीसा में नवीन पटनायक को सत्ता से बाहर करना अभी भी भाजपा के बूते के बाहर है। नवीन पटनायक सामान्य नेताओं से भिन्न हैं। वह कभी भी दूसरों पर आरोप नहीं लगाते। कभी कठोर शब्दों में जवाब नहीं देते। मीडिया से जब जरूरी हो तभी मिलते हैं। वह देश के ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं जिनकी पार्टी की सरकार बनने के बाद से आजतक सत्ता से बाहर नहीं हुई है। 22 साल से अधिक सत्ता में रहने के बाद भी उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है।

बीजू पटनायक के समय ही उड़ीसा पंचायती राज में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लाने वाला देश का पहला राज्य बना था। नवीन पटनायक ने उसे बढाकर 50 प्रतिशत कर दिया। पूरे उड़ीसा में महिलाओं के छह लाख से ज्यादा सेल्फ हेल्प ग्रुप नवीन पटनायक की देन है। उडीसा में 80 प्रतिशत लोग खाद्य सुरक्षा के घेरे में आते हैं। यह सच है कि सबसे बड़ा पलायन उड़ीसा से ही हुआ है लेकिन इसका दोष वहां की जनता अपने नेता को नहीं देती।

नवीन पटनायक लोकप्रिय जरूर हैं लेकिन उनके सामने भी कई राजनीतिक चुनौतियां हैं। जैसे उन्हें भी परिवारवाद पर अमल करना पड़ रहा है। इसलिए चार नेताओं की पत्नियों को टिकट दिया गया है। इसमें नवरंगपूर से विधायक सदाशिव प्रधानी की पत्नी कौशल्या प्रधानी को, सूरादा से विधायक पूर्ण चंद्र स्वैन की पत्नी संघमित्रा स्वैन को, उमरकोट से सुभाष गौड़ की पत्नी नबीना नायक को, बस्ता विधासभा सीट से रवीन्द्र जैना की पत्नी सुभाषिनी जैना को टिकट दिया गया है।

कटक लोकसभा से छह बार सांसद और बीजद के संस्थापक सदस्यों में रहे भतृहरि महताब के भाजपा का दामन थामने से नवीन पटनायक को तगड़ा झटका लगा है। भाजपा बीजद की अंदरूनी फूट का पूरा फायदा उठाने की कोशिश में है।

पार्टी के नेताओं का आरोप है कि उड़ीसा में नवीन पटनायक के करीबी नौकरशाह पांडियन पार्टी को संचलित कर रहे हैं जो बीजद में नेताओं के नाराजगी का कारण बन रहा है। अभिनेता से नेता बने और बरहमपुर से दो बार के सांसद सिद्धांत महापात्र ने भी भाजपा का दामन थाम लिया है। अभिनेता आकाश दास नायक और अनुभव मोहंती ने भी बीजद का साथ छोड़ भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है। अनुभव मोहंती ने 2019 में केन्द्रपाड़ा लोकसभा सीट से चुनाव जीता था।

भाजपा भले ही बीजद में टूट करवाकर अपने को मजबूत करने की कोशिश कर रही हो, लेकिन विधानसभा चुनाव में नवीन पटनायक का फिर से मुख्यमंत्री बनना तय है। नवीन पटनायक सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री बने रहने की दहलीज पर खड़े हैं।

नवीन पटयानयक यह विधानसभा चुनाव जीतते हैं तो पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु और सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन चामलिंग को पीछे छोड़ सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले मुख्यमंत्री बन जाएगे। उम्र के 51 साल तक राजनीति से दूर रहने वाले व्यक्ति का लगातार 23 साल मुख्यमंत्री बने रहना यह बताता है कि उस राज्य में उसकी कितनी पकड़ है और जनता का उसमें कितना भरोसा है।

बहरहाल जैसा नवीन पटनायक की बहन गीता ने एक बार कहा था कि उनके भीतर अपने पिता की तरह शेर की मांद में खाली हाथ घुस जाने का साहस है। उस साहस की परीक्षा एक बार फिर होनी है। अपने जीवन का संभवत: अंतिम चुनाव लड़ रहे नवीन पटनायक की सरकार और पार्टी का भविष्य क्या होगा यह इसी चुनाव से तय होगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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