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Unclaimed Bodies: पहचान के इंतजार में हैं बालासोर ट्रेन दुर्घटना में मारे गये 81 लोगों के शव

Unclaimed Bodies: बीते 2 जून को उड़ीसा के बालासोर में हुई रेल दुर्घटना में 291 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना के लगभग एक महीने बाद भी रेलवे 81 मृतकों की पहचान सुनिश्चित करने में असमर्थ रहा है। ये सभी शव भुवनेश्वर स्थित एम्स में रखे हुए हैं और उन शवों के निशान दिल्ली स्थित केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (सीएफएसएल) को भी भेजे गये हैं। लेकिन मुश्किल ये हो रही है तमाम वैज्ञानिक उपायों के बाद भी 81 लाशों की शिनाख्त नहीं हो पा रही है और वो सभी लावारिस शव इस इंतजार में हैं कि कब उनके सगे संबंधियों को उन्हें सौंपा जा सकेगा।

दुर्घटना में मारे गये लोगों की लावारिश लाशों की शिनाख्त के लिए प्रत्येक मृतक के बाल, दांत, हड्डी, नाखून और मांसपेशियों के ऊतकों के नमूने नई दिल्ली फॉरेंसिक विभाग में भेजे गये हैं। लेकिन फॉरेन्सिक अधिकारियों का कहना है कि उनके पास लाए गए नमूनों से डीएनए निकालना बहुत चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। उदाहरण के लिए कुछ नमूनों में दातों से डीएनए निकालना इसलिए कठिन है, क्योंकि दांत तंबाकू के सेवन से लगभग नष्ट हो गए हैं। कुछ मामलों में मांसपेशियों के उत्तक अत्यधिक विघटित हो गए हैं।

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फॉरेंसिक विभाग का कहना है कि प्रत्येक डीएनए टेस्ट के लिए पीसीआर तकनीक का उपयोग किया जाता है। इसे जांच की चक्रीय प्रणाली कहते हैं ताकि सटीक डीएनए परिणाम प्राप्त किया जा सके। लेकिन बालासोर ट्रेन दुर्घटना में मारे गये 81 लोगों की लाश का कई चक्र के परीक्षण के बाद भी संतोषजनक परिणाम नहीं मिल पाया है। फॉरेंसिक मेडिसिन टॉक्सिकोलॉजी विभाग के वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे-जैसे चक्र दोहराए जाएंगे जटिलताएं और भी बढ़ेंगी। विभाग का यह भी कहना है कि एकाएक 81 की बड़ी संख्या में नमूनों पर एक साथ काम करना भी चुनौतीपूर्ण है तथा इसमें निष्कर्ष पर पहुंचने में अभी और अधिक समय लग सकता है।

उड़ीसा के बालासोर ट्रेन हादसे में 291 लोगों की मौत हुई थी और 11 सौ से ज्यादा लोग घायल हुए थे। दुर्घटना के लगभग एक महीने बाद भी 81 मृतकों के शव उड़ीसा के एम्स में रखे गए हैं तथा डीएनए टेस्ट के लिए फॉरेंसिक साइंस लगातार काम कर रहा है। मालूम हो कि शवों की संख्या और उन पर दावा दर्ज करने वालों की संख्या के बीच विसंगति का भी मसला है। रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कुल शव 81 हैं और दावेदार हैं 84 परिवार। सभी दावेदारों ने मृतकों के रक्त संबंधी होने का दावा करते हुए एम्स में पंजीकरण कराया और अपने दावे को सिद्ध करने के लिए रक्त के नमूने जमा किए हैं। ऐसे में रेलवे शवों को सौंपते हुए किसी भी त्रुटि से बचने के लिए सावधानी बरत रहा है, क्योंकि इसमें 15 लाख रूपए का मुआवजा दिया जाना भी शामिल है। इसलिए अब इन शवों की पहचान में एम्स दिल्ली के फॉरेंसिक मेडिसिन और टॉक्सिकोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों को भी पहचान प्रक्रिया में शामिल किया गया है।

मालूम हो कि एम्स दिल्ली सीएफएसएल द्वारा चलाए जा रहे प्रोजेक्ट (उम्मीद) के तहत अज्ञात शवों का डीएनए निष्कर्षण किया जाता है। 2019 से 2022 तक कुल 670 अज्ञात शवों की भौतिक विशेषताओं को दर्ज किया गया जिसमें केवल 569 मामले का डीएनए निष्कर्षण संभव हो सका था। 111 मामले में डीएनए निष्कर्षण असमर्थ रहा। मौजूदा मामले में एक साथ आए 81 नमूनों की जांच की सफलता दर 100% होने की गारंटी विभाग नहीं दे सकता। ऐसे में शवों की कुल संख्या से अधिक संख्या में खड़े रिश्तेदारों के दावों का निपटारा कैसे होगा?

इस बीच बिहार और पश्चिम बंगाल के असहाय परिजन रेल अधिकारियों से सुनवाई का इंतजार कर रहे हैं। रेल अधिकारी स्पष्ट समय सीमा देने में असमर्थ है। अधिकांश लोग एम्स भुवनेश्वर, जहां शव रखे गए हैं, वहां डेरा डाले हुए हैं। वहीं इनके रिश्तेदार और सगे संबंधी दिल्ली का चक्कर काट रहे हैं। भटकने वालों में उन लोगों के परिजन भी शामिल हैं जिनके शव दुर्घटना के एक सप्ताह बाद गलती से दूसरे पक्षों को सौंप दिए गए थे।

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले के रहने वाले शिवकांत राय भी नतीजों के इंतजार में है। उनके मृत बेटे विपुल राय की पहचान सुनिश्चित नहीं हो सकी है। शिवकांत ने शव की तस्वीर देखकर अपने बेटे विपुल राय की पहचान का दावा किया था लेकिन वह शव बिहार के किसी अन्य दावेदार के साथ भेज दिया गया। गुजरते दिन के साथ पीड़ितों के परिजनों की बेचैनी बढ़ रही है, वहीं फॉरेंसिक अधिकारी दबी जुबान से यह डर व्यक्त कर रहे हैं कि डीएनए मिलान से मृतक के परिवारों को बहुत कुछ हासिल नहीं हो सकेगा।

बालासोर दुर्घटना पीड़ितों में अधिकांश कम आय वर्ग के लोग हैं, जो ट्रेन के सामान्य डिब्बों में सामान्य टिकट पर यात्रा कर रहे थे। रेलवे में आरक्षित टिकटों का एक सामान्य लेखा-जोखा रेल विभाग के पास मौजूद होता है लेकिन जनरल टिकट का ब्यौरा वैसा नहीं होता जिसके आधार पर टिकट धारक की पहचान सुनिश्चित की जा सके। ऐसे में सामान्य टिकट पर अगर आधार नंबर दर्ज होता तो संभव है उसके जरिए इनमें से कई पीड़ितों की शिनाख्त आसानी से हो चुकी होती।

सौ तालों की एक चाबी के रूप में देश के नागरिकों का आधार कार्ड बनाया गया था ताकि वह कहीं भी रहे उनकी एक क्लिक में शिनाख्त की जा सके। रेलवे के सामान्य डिब्बे में सामान्य टिकट पर सामान्य श्रेणी के जो यात्री हर दिन यात्रा करते हैं क्या वे भारत के नागरिक नहीं है? क्या उनके बारे में मुकम्मल जानकारी रखने की जिम्मेवारी रेलवे की नहीं है? भारतीय रेलवे अपने बुनियादी ढांचे पर भारी भरकम रकम खर्च करता है। यात्रियों की सुरक्षा संरक्षा पर होने वाले खर्च का आकार भी कोई कम नहीं है। ऐसे में भारतीय रेलवे की इच्छा शक्ति हो तो दुर्घटना की स्थिति में सामान्य टिकट पर यात्रा करने वाले नागरिकों की भी शिनाख्त की जा सकती है। इसके लिए आधार नंबर को सामान्य टिकट से जोड़ा जा सकता है ताकि अगर कभी कोई ऐसी दुर्घटना हो तो लाश को अपने वारिस की तलाश में लावारिश न बन जाना पड़े।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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