OBC Politics: मध्य प्रदेश में भी महत्वपूर्ण हुई ओबीसी वोट की राजनीति

OBC Politics: इतिहास स्वयं को दोहराता है किंतु इस बार उल्टा हो रहा है। जातियों की जकड़न से हिन्दू समाज को निकालने की मंशा से हिंदुत्ववादी राजनीति की शुरुआत हुई और अब हिंदुत्ववादी राजनीति के उभार को समाप्त कर हिन्दू समाज को पुनः जातियों के फेर में बांटने की साजिश रची जा रही है। 'जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी' का राग भी वे नेता अलापने में लगे हैं जिन्होंने हिस्सेदारी न होते हुए भी राजनीति में पूरी भागीदारी से अपना आधिपत्य स्थापित किया हुआ है।

हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश के शाजापुर में ओबीसी आरक्षण और जातिगत जनगणना पर बोलते हुए कहा, 'हिंदुस्तान को 90 अफसर चलाते हैं। यह लोग कानून बनाते हैं। कितना पैसा कहां जाना है, यह तय करते हैं। बीजेपी की दस साल से सरकार है। ओबीसी की आबादी कितनी है, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। जातिगत जनगणना नहीं हुई है। ओबीसी की आबादी हिंदुस्तान में लगभग 50 प्रतिशत है। 90 अफसरों में सिर्फ तीन अफसर ओबीसी के हैं। यह देश की सच्चाई है।"

OBC vote politics becomes also important in Madhya Pradesh elections

ओबीसी राजनीति को हवा देते हुए राहुल गांधी ने आगे कहा कि "हिंदुस्तान का बजट लाखों-करोड़ों का है। ओबीसी अफसर की भागीदारी बजट में कितनी है? यह कितने रुपये पर निर्णय लेते हैं? तकरीबन 43 लाख करोड़ रुपये का बजट है। किसी को पता ही नहीं है। सच्चाई यह है कि हिंदुस्तान के पूरे बजट में पांच प्रतिशत की भागीदारी ओबीसी के अफसरों के हाथ में है। सही में मोदी ओबीसी के लिए काम करते हैं तो 90 अफसरों में उनकी संख्या तीन क्यों है? ओबीसी की जेब से पैसा चोरी हो रहा है।'

राहुल गांधी के भाषण के अगले दिन ही बिहार सरकार ने जातिगत जनगणना के आंकड़ें सार्वजनिक कर देश की राजनीति में उबाल ला दिया है। उबाल तो मध्य प्रदेश की राजनीति में भी आया है जहां अब ओबीसी केन्द्रित चुनाव होना तय है।

2018 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के एक बयान 'माई का लाल' ने 15 वर्ष बाद प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनवा दी थी। गौरतलब है कि 2018 में आरक्षण विवाद के चलते अनुसूचित जातियों और सवर्ण जातियों का बड़ा हिस्सा सरकार से नाराज हो गया था। हालांकि डेढ़ वर्ष पश्चात ही मध्य प्रदेश में पुनः भाजपा की सरकार बनी किन्तु उसके बाद सरकार ने जातीय समीकरण साध लिए। मध्य प्रदेश में उत्तर भारतीय राज्यों की भांति जातिवाद राजनीति में कम ही घुला था किन्तु 2023 के विधानसभा चुनाव अब इससे अछूते नहीं रहे हैं।

बीते एक वर्ष में भाजपा और कांग्रेस ने जमकर जातीय सम्मेलन किए हैं। यहां तक कि दोनों ही राजनीतिक दलों ने जातियों के हिसाब से उनके महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि पर सार्वजनिक अवकाश की चुनावी घोषणा भी कर दी है। 2011 की जनगणना के अनुसार मध्य प्रदेश की जनसंख्या में 21.1 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और 15.6 प्रतिशत अनुसूचित जाति की हिस्सेदारी है जबकि प्रदेश की 50.09 प्रतिशत जनसंख्या अन्य पिछड़ा वर्ग की है। 230 सीटों वाली विधानसभा में कुल 82 सीटें (47 अनुसूचित जनजाति और 35 अनुसूचित जाति) इन वर्गों के लिए आरक्षित हैं। विंध्य क्षेत्र सवर्ण बहुल है तो चंबल पिछड़ी जातियों का गढ़ है।

मालवा-निमाड़ वनवासी बहुल क्षेत्र है तो मध्य भारत और महाकोशल संभाग में ओबीसी अधिक हैं। ऐसे में हर क्षेत्र के हिसाब से राजनीतिक दलों को अपनी गोटियां फिट करना पड़ रही हैं। प्रदेश की 20-25 अनारक्षित विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां राजनीतिक दल जीतने के लिए सवर्ण के बजाए ओबीसी प्रत्याशी उतारते रहे हैं। इस बार ओबीसी कार्ड के चलते ऐसी सीटों पर और अधिक ओबीसी प्रत्याशी उतारना मजबूरी बन गई है।

प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री कांग्रेस नेता स्व. पंडित रविशंकर शुक्ल (1952-56) से लेकर प्रदेश के सातवें मुख्यमंत्री कांग्रेस नेता स्व. श्यामा चरण शुक्ल (1969-72,1975-77) तक प्रदेश की राजनीति ब्राह्मणों के इर्द-गिर्द घूमती रही जिसका तिलिस्म स्व. अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में टूटा और प्रदेश में राजपूत समुदाय की राजनीति हावी होने लगी जिसे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने जमकर हवा दी।

2003 में भाजपा नेतृत्व ने ओबीसी में आने वाली लोधी जाति की उमा भारती को कमान सौंपी और उसके बाद बाबूलाल गौर (यादव) तथा शिवराज सिंह चौहान (किरार) के चलते उसे पिछड़ी जातियों का भरपूर समर्थन प्राप्त हुआ। वर्तमान में ओबीसी वर्ग से भाजपा के 40 विधायक हैं जबकि कांग्रेस के 19 विधायक ओबीसी समुदाय से हैं।

हालांकि मध्य प्रदेश में जातीय जनगणना के संभावित परिणाम और आरक्षण को लेकर अभी उतनी चर्चा नहीं है जिसके चलते यह वर्ग भाजपा से जुड़ा हुआ है किन्तु कांग्रेस ने जाति आधारित जनगणना की मांग करके इस वर्ग को भाजपा से दूर करने का दंभ भर दिया है जिससे अब तक एकतरफा नजर आ रहा विधानसभा चुनाव कांटे की टक्कर का हो गया है।

इसके अलावा मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण 1984 में लागू हुआ था जो 14 प्रतिशत था। 08 मार्च, 2019 को तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने मध्य प्रदेश में एक्ट बनाकर आरक्षण का दायरा 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया जिसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई जिसका फैसला भाजपा-कांग्रेस दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगा।

हालांकि सर्वोच्च न्यायालय यह कह चुका है कि मध्य प्रदेश जैसे राज्य में जहां अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का आरक्षण 36 प्रतिशत है वहां ओबीसी का 27 प्रतिशत आरक्षण समझ से परे है। चूंकि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती अतः मध्य प्रदेश में भी आरक्षण का मामला उलझा हुआ है। ऐसे में प्रदेश में जातीय समीकरणों को साधने की जुगत से जातिगत जनगणना की मांग उठाना, प्रदेश में जातीय जहर बोने जैसा है जिसकी शुरुआत कांग्रेस ने कर दी है।

इसके अलावा मध्य प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की वेबसाइट पर जारी एक सूची के अनुसार मुस्लिम समुदाय में शामिल 38 जातियां भी ओबीसी में शामिल की गई हैं जिसमें रंगरेज, भिश्ती, हेला, धोबी, मेवाती, मनिहार, कसाई, मिरासी, बढ़ई, हज्जाम, हम्माल शामिल हैं। इस मामले में भी तुष्टिकरण की राजनीति शुरू हो चुकी है। देखना दिलचस्प होगा कि मध्य प्रदेश में ओबीसी राजनीति का ऊँट किस करवट बैठता है और किसे अपनी सवारी करवाता है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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