Noida Engineer Death: डराता रहा पानी-सरिया-अंधेरा...कुहासे में डूबा सिस्टम और गड्ढे में समा गया युवराज
Noida Engineer Yuvraj Mehta Death: नोएडा सेक्टर 150 की उस रात को लोग कुहासे की रात कह रहे हैं, लेकिन सच यह है कि उस रात धुंध सड़कों पर नहीं, पूरे सिस्टम की आंखों पर छाई हुई थी। 27 साल का युवराज मेहता, जो दिनभर कोड लिखकर अपने भविष्य के सपने बुनता था, उसी सिस्टम के गड्ढे में समा गया जिसे हम विकास कहते नहीं थकते। गुरुग्राम से लौटते वक्त उसकी कार एक ऐसे पानी भरे गड्ढे में गिरी, जिसे किसी ने गड्ढा मानने की जरूरत ही नहीं समझी थी।
बरसात का पानी, खुले लोहे के सरिए, टूटी दीवार और लापरवाही से छोड़ी गई एक कंस्ट्रक्शन साइट। यह सब किसी डरावनी फिल्म का सीन नहीं था, बल्कि दिल्ली-एनसीआर के सबसे मॉडर्न कहे जाने वाले इलाके की हकीकत थी। युवराज कार की छत पर चढ़ा रहा, सांसें गिनता रहा और पिता को फोन कर आखिरी उम्मीद के साथ चिल्लाता रहा। सिस्टम ने मानों कान-आंख ही बंद कर लिए हों। सुबह जब जवाब आया, तब सिर्फ एक लाश बची थी।

इसे हादसा कहना भी अब एक तरह का मजाक लगता है। पुलिस आई, अग्निशमन दल आया, एसडीआरएफ भी आई, लेकिन सबके पास एक न एक बहाना था। पानी ठंडा है, नीचे सरिया है, अंधेरा है, रिस्क है। आपदा राहत के नाम पर करोड़ों के बजट वाले विभाग के पास एक लंबी रस्सी तक नहीं थी। उस रात सबसे बहादुर कोई अफसर नहीं, बल्कि एक डिलिवरी बॉय मोरिंदर निकला, जिसने जान जोखिम में डालकर पानी में छलांग लगा दी। युवराज बच नहीं सका, लेकिन इतिहास अगर ईमानदार हुआ तो उस डिलिवरी बॉय को बहादुर और सिस्टम को कायर जरूर लिखेगा।
युवराज की लाश तो निकाल ली गई, लेकिन सवाल जिंदा रह गए। थोड़ी सी मुस्तैदी होती, थोड़ी सी इंसानियत होती, तो शायद एक पिता का बेटा आज जिंदा होता। मौत के बाद बिल्डर गिरफ्तार हुआ, नोएडा अथॉरिटी के सीईओ पद से हटाए गए और अब शायद जांच, इंक्वायरी और फाइलें चलेंगी। मगर जिनके अधीन पूरा प्रशासन, एसडीआरएफ और व्यवस्था आती है, उन पर सवाल उठाना अब भी असुविधाजनक माना जा रहा है।
सेक्टर 150 को कभी Sports City बनाने का सपना दिखाया गया था। आज वहां अपार्टमेंट कुकुरमुत्तों की तरह उग आए हैं। आधे से ज्यादा मकान बिना रजिस्ट्रेशन बिक रहे हैं और किसी को फर्क नहीं पड़ता। सवाल सिर्फ उस बिल्डर का नहीं जिसने पानी भरा बेसमेंट खुला छोड़ा, सवाल उस अथॉरिटी का भी है, जिसने उसे इजाजत दी। सवाल उस दीवार का भी है, जो टूटी और फिर कभी बनाई नहीं गई? सवाल उस RTO का भी है, जिसने ट्रक और ड्राइवर को लाइसेंस दिया? सवाल उस SDRF का भी है जिसे तैरना नहीं आता और उस फायर ब्रिगेड का भी, जिसके पास रस्सी नहीं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या युवराज की जगह अगर कोई बड़ा नेता, अफसर या वीआईपी होता तो भी यही तमाशा होता? क्या तब भी पानी ठंडा लगता, सरिए डराते और अंधेरा आड़े आता? युवराज कोई खास आदमी नहीं था, और शायद यही उसकी सबसे बड़ी गलती थी।
युवराज एक नाम नहीं, एक आम आदमी है। वही आम आदमी जो नमक से लेकर सैलरी तक हर चीज पर टैक्स देता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर जिसकी जान की कीमत शून्य हो जाती है। उस रात कुहासा सिर्फ मौसम का नहीं था, वह हमारी व्यवस्था की सोच का था। और जब तक यह कुहासा नहीं छटेगा, तब तक युवराज जैसे लोग यूं ही सिस्टम के गड्ढों में गिरकर मरते रहेंगे।
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