Nitish vs Vijay Sinha: बिहार में "तुम" पर क्यों बरपा है हंगामा?
बिहार के छपरा में जहरीली शराब से अब तक 39 लोग मारे गये हैं लेकिन बिहार विधानसभा में इन मौतों से अधिक तुम के संबोधन पर हंगामा हुआ।

Nitish vs Vijay Sinha: एक ओर जहां आये दिन संसद या विधानसभाओं में हंगामे की खबरें आती रहती है, वहीं बिहार विधानसभा में एक ऐसी बात पर हंगामे की खबर आयी जो किसी मुद्दे से नहीं बल्कि भाषाई संस्कार से जुड़ा हुआ है। बुधवार को विधानसभा में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विपक्ष के नेता विजय कुमार सिन्हा को तुम से संबोधित कर दिया। बस इसी बात को इतनी बड़ी अशिष्टता और अभद्रता समझा गया कि विधानसभा में हंगामा हो गया।
इस हंगामे को समझने के लिए बिहार के भाषा संस्कार को समझना पड़ेगा। बिहार में झगड़ा भी आप के संबोधन से होता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश या हरियाणा में जहां तम या तुम एक सामान्य संबोधन समझा जाता है, वहीं बिहार में तुम का संबोधन अपमानजक माना जाता है। अपने से किसी वरिष्ठ को तुम से संबोधित करना गाली देने जैसा होता है।
बिहार में भाषाई संस्कार को लेकर बिहार में खास सतर्कता बरती जाती है। जैसे "मैं" की जगह "हम" और "मेरे" की जगह "हमारे" का प्रयोग करने वाले को सुनते ही लोग समझ लेते है कि वह बिहार की भाषाई भूमि पर पला बढ़ा शख्स है। इसी तरह बिहार में "आप"और "तुम" के प्रयोग को लेकर स्पष्ट भेद है। गली, मोहल्लों में तुम कहना क्रोध, रोष और हंगामे का आधार बन जाता है। अपने से उम्र अथवा पद में बड़े या सम्मानित व्यक्ति को "तुम" कह देना अमर्यादा है। इसे अभद्रता और गंदी गाली की श्रेणी में रखा जाता है।
यही बिहार विधानसभा में हुआ। विजय सिन्हा एनडीए की सरकार में वरीयता के आधार पर विधानसभा अध्यक्ष हुआ करते थे। बिहार की भाषाई मर्यादा के अनुसार उनसे जूनियर नीतीश कुमार उन्हें तुम से संबोधित नहीं कर सकते। लेकिन उन्होंने ऐसा किया तो इसे गाली गलौज की भाषा में बात करना बता दिया गया।
असल में बिहार विधानसभा में सारण के दोइला गांव में नकली शराब से हुई मौतों पर हंगामा मचा था। विपक्ष के हंगामे पर गुस्से से आवेशित मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्ष से जोर जोर से कहने लगे, "क्या हो गया तुमको, चुप रहो... शराबबंदी के फैसले के समय साथ थे कि नहीं।" इससे आवेशित भारतीय जनता पार्टी ने प्रतिपक्ष के नेता को "तुम" कहने पर मुख्यमंत्री के माफी मांगने तक सदन की कार्यवाही का बहिष्कार करने का फ़ैसला लिया है।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर राजनीति में आए नीतीश कुमार उज्ज्वल बिहारी अस्मिता के वाहक रहे हैं। बिहार के धवल पक्ष को बुलंद करने के लिए अप्रैल 2016 में नीतीश कुमार की सरकार ने शराबबंदी का सख्त कानून लागू किया था। हज़ारों करोड़ रुपए के राजस्व नुकसान वाले फैसले के वक्त भारतीय जनता पार्टी नीतीश सरकार में शामिल थी। नीतीश कुमार के दूसरी बार पाला बदलने से भाजपा फिर विपक्ष में है। शराबबंदी के दौरान सस्ती ज़हरीली शराब पीने से हो रही मौतें विपक्ष के लिए प्रमुख मुद्दा है। इसे भाजपा सिर्फ बिहार विधानसभा ही नहीं संसद के शून्य काल में भी जोर शोर से उठा रही है।
ऐसे में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का विधानसभा की कार्यवाही के बीच प्रतिपक्ष के नेता विजय कुमार सिन्हा को अंगुली दिखाकर आवेश में कहना कि "अब तुम्हें क्या हुआ, चुप रहो", बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना है। वैसे विजय सिन्हा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राह में उन दिनों भी रोड़े बिछाने का काम कर चुके हैं जब विधानसभा अध्यक्ष हुआ करते थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लोग मुख्यमत्री के एनडीए से नाता तोड़ने की एक वजह विजय सिन्हा की ओर से सदन में नीतीश कुमार के साथ किए गए सामान्य व्यवहार को मानते हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री का प्रतिपक्ष के नेता विजय सिन्हा को तुम तड़क की गलती का हो जाना पिछली घटना की नाराजगी का नतीजा बताया जा रहा है।
एक समय नीतीश कुमार ने बिहारी अस्मिता से जुड़े सम्मान की प्रधानता को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया था। बिहारी डीएनए पर सवाल को लेकर पटना से दिल्ली तक की फिज़ा को गर्मा दिया था। प्रतिपक्ष के तीक्ष्ण हमलों से घिरकर वह सदन में बार बार आपा खो दे रहे हैं। कुछ लोग उन पर इसे उम्र का असर तो कई लोग स्वभाव के विपरीत गठबंधन करने की विवशता का नतीजा बता रहे हैं।
मुख्यमंत्री नीतीश दूसरी बार पाला बदलकर तब के विपक्ष राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन की सरकार चला रहे हैं। पड़ोसी देश नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा, एवं पश्चिम बंगाल, झारखंड और उत्तर प्रदेश की राज्य सीमा से घिरे बिहार में शत प्रतिशत शराबबंदी लागू कर पाना नीतीश कुमार सरकार के लिए निरंतर चुनौती बनी हुई है।
सरकार की सख्ती के बीच शराब की डिमांड की भरपाई के लिए चोरी से नकली शराब बनाने वालों की चांदी कट रही है। शराब तस्करी को लेकर राज्य की बदनामी बढ़ी है। नकली, सस्ती और जहरीली शराब पीकर गरीब ग्रामीणों के मरने का सिलसिला जारी है। इन मौतों को लेकर राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यू के गठबंधन की सरकार को विपक्ष ने निशाने पर ले रखा है। विपक्ष में बैठी भाजपा का दावा है कि जहरीली शराब बेचने वालों की हिम्मत लचर कानून व्यवस्था की वजह से बढ़ी हुई है।
जहरीली शराब से हो रही मौतों से इतर भाषाई संस्कार के मुद्दे ने बिहार की राजनीति में ठीक उसी तरह गर्माहट पैदा की है, जैसी कभी बिहारियों के डीएनए को नीतीश कुमार की पार्टी ने बिहारी अस्मिता का मुद्दा बनाकर पैदा की थी। 2015 में भाजपा से अलग जाकर राजनीति कर रहे नीतीश कुमार ने दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली कर राज्य के वाशिंदों से ब्लड सैंपल देने का आह्वान किया था। उन्होंने प्रधानमंत्री को खत लिखकर पचास लाख बिहारियों का ब्लड सैंपल भेजने की सियासी दावेदारी की थी। ताकि उसकी जांच से अस्मिता के उज्ज्वल पक्ष को उजागर किया जा सके। अब इन्ही नीतीश कुमार पर बिहार में प्रचलित भाषाई गरिमा को तिलांजलि देने का आरोप है। तुम कहकर अमर्यादित आचरण करने के लिए क्षमायाचना करने को कहा जा रहा है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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