Nitish Kumar: इंडी एलायंस की मजबूरी बन चुके हैं नीतीश
ललन सिंह का जेडीयू के अध्यक्ष पद से हटना राष्ट्रीय चर्चा का मुद्दा बन गया, जबकि अपने आप में यह कोई बड़ी घटना नहीं थी। बिहार से बाहर तो कोई जानता ही नहीं था कि जेडीयू का अध्यक्ष कौन है, जेडीयू की पहचान सिर्फ नीतीश कुमार से है।
अध्यक्ष कोई भी हो, पार्टी की कमान नीतीश कुमार के हाथ में ही होती है। जैसे अध्यक्ष कोई भी हो, कांग्रेस की कमान सोनिया-राहुल के हाथ में है, और अध्यक्ष कोई भी हो, भाजपा की कमान मोदी-शाह के हाथ में है।

नीतीश कुमार चाहते, तो वह ललन सिंह को हटाने के लिए पटना में ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलवा सकते थे। लेकिन उन्होंने कांग्रेस और इंडी एलायंस के बाकी घटक दलों को संदेश देने के लिए कार्यकारिणी की बैठक दिल्ली में बुलाई। उन्हें कई दिन से एहसास हो रहा था कि कांग्रेस तो उनसे धोखा कर ही रही थी, लालू यादव भी धोखा देने की तैयारी कर रहे थे। हालांकि नीतीश कुमार की भारतीय जनता पार्टी के साथ किसी स्तर पर कोई बातचीत शुरू नहीं हुई थी। फिर भी उन्होंने जेडीयू की दिल्ली में बैठक बुला कर यह संदेश दे दिया कि अगर कांग्रेस और इंडी एलायंस ने उन्हें वैसा सम्मान नहीं दिया, जिसके वह हकदार हैं, तो वह भाजपा के साथ जा सकते हैं।

भारतीय जनता पार्टी के कई नेता भी नीतीश कुमार की रणनीति से दहशत में आ गए थे, इसलिए उन्होंने अमित शाह का सितंबर में दिया गया भाषण याद करवाना शुरू कर दिया कि नीतीश कुमार के लिए भाजपा के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं। लेकिन उस भाषण की काट में यह दलील भी दी जाने लगी थी कि राजनीति में कुछ भी संभव है, किसी भी संभावना को नकारा नहीं जा सकता।
नीतीश कुमार ने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि उन्हें लगने लगा है कि भाजपा का साथ छोड़ना गलत फैसला था। और वह इसके लिए मुख्य तौर पर अपनी पार्टी के दो लोगों को जिम्मेदार मानते हैं। एक हैं पार्टी के पूर्व अध्यक्ष आरसीपी सिंह और दूसरे हैं ललन सिंह। दोनों नीतीश कुमार के आँख कान थे, एक पर भाजपा की गोदी में बैठने का आरोप लगा, तो दूसरे पर लालू यादव की गोदी में जा बैठने का आरोप लगा है।
आरसीपी सिंह अब जेडीयू छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं, लेकिन ललन सिंह पार्टी के अध्यक्ष बने हुए थे। अब ललन सिंह का भी दिल्ली में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी से इस्तीफा हो गया है। वह अभी भी जेडीयू में बने हुए हैं, और इन आरोपों को पूरी तरह नकार रहे हैं कि उन्होंने लालू यादव के साथ मिल कर नीतीश कुमार का तख्ता पलटने की योजना बनाई थी।
खबर यह थी कि लालू यादव जेडीयू के 11-12 विधायक तोड़कर नीतीश कुमार का तख्ता पलट कर तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने की साजिश रच रहे हैं, जिसमें ललन सिंह की अहम भूमिका है। क्या लालू यादव और ललन सिंह सचमुच ऐसा कर रहे थे? इसके पीछे की कहानी यह है कि नीतीश कुमार इंडी एलायंस में अपनी अनदेखी से तो निराश थे ही, लालू यादव जेडीयू के लिए 17 लोकसभा सीटें छोड़ने को भी तैयार नहीं थे। वह दुबारा भाजपा के साथ गठबंधन की संभावना टटोल रहे थे।
20 दिसंबर को राहुल गांधी ने नीतीश कुमार से फोन पर बात की थी और उनसे आग्रह किया था कि वह लालू यादव के साथ मिल कर आपस में समस्याओं का हल निकालें। दोनों की मुलाक़ात हुई भी, लेकिन कोई हल नहीं निकला था। इसी बीच यह खबर बड़े जोर से उछली कि लालू यादव उनका तख्ता पलटने की योजना पर काम कर रहे हैं।
इन खबरों के बाद ही नीतीश कुमार ने दिल्ली में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाने का फैसला किया। जिसमें ललन सिंह का हटाया जाना इसलिए बड़ी खबर बना क्योंकि वह ललन सिंह और आरसीपी सिंह ही थे, जिनके कारण नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ छोड़कर लालू यादव और बाद में इंडी एलायंस का दामन थामा था। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नीतीश कुमार ने इतनी भड़ास किसी अन्य पर नहीं निकाली, जितनी आरसीपी सिंह पर निकाली। ललन सिंह को हटाया जाना वैसे तो सिर्फ जेडीयू का अंदरूनी मामला है, लेकिन क्योंकि ललन सिंह जेडीयू-राजद गठबंधन के सूत्रधार थे, इसलिए इस फैसले के कई राजनीतिक संकेत थे।
बिहार प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने वक्त रहते पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को अवगत करवा कर बात को संभालने की पहल करने को कहा था। वह पहल हुई भी। सिर्फ राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने ही नहीं बल्कि केसी वेणुगोपाल और शरद पवार ने भी नीतीश कुमार से बात करके स्थितियों को संभालने की कोशिश की।
लालू यादव तख्ता पलट की योजना से पीछे हटे हैं और नीतीश कुमार को इंडी एलायंस का संयोजक बनाने का फिर से वादा किया गया है। इसीलिए 27 दिसंबर की रात को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पास किए जाने वाले राजनीतिक प्रस्ताव की भाषा में बदलाव करके भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार पर हमलावर रूख अपनाया गया।
अगर उन तीन चार दिनों में नीतीश कुमार के लिए भाजपा के दरवाजे बंद करने का अलाप नहीं अलापा जाता तो राजनीतिक प्रस्ताव में उतनी कड़वी भाषा का इस्तेमाल नहीं होता, जितनी कड़वी भाषा का इस्तेमाल किया गया। नीतीश कुमार के इस कदम से उनकी सरकार भी बच गई और इंडी एलायंस भी बच गया।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नीतीश कुमार पूर्व अध्यक्ष आरसीपी सिंह के खिलाफ जमकर बोले, जबकि वह जुलाई 2022 में ही पार्टी छोड़ चुके हैं। इसका कारण यह है कि नीतीश कुमार यह मानते हैं कि अगर आरसीपी सिंह ने उन्हें धोखा देकर सीधे मोदी से संबंध नहीं बनाए होते, तो उनके एनडीए छोड़ने की नौबत ही नहीं आती।
असल में इंडी एलायंस की नींव जुलाई 2021 में पड़ गई थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरसीपी सिंह को अपनी सरकार में मंत्री पद की शपथ दिलाई थी। नीतीश कुमार ने 2021 में मोदी सरकार में शामिल करने के लिए आरसीपी सिंह और ललन सिंह के नाम भेजे थे, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जेडीयू से एक ही मंत्री बनाना तय किया और बिना नीतीश कुमार से पूछे आरसीपी सिंह को शपथ दिला दी। यह बहुत ही आश्चर्यजनक था कि नीतीश कुमार से उनकी पहली चॉइस पूछने के बजाए अमित शाह ने उन्हें सूचना दी कि हम आरसीपी सिंह को मंत्री बना रहे हैं।
उस समय ललन और आरसीपी दोनों ही नीतीश कुमार के करीबी थे, इसलिए उन्होंने कोई विरोध नहीं किया। आरसीपी सिंह उस समय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। मंत्री बनने के तीसरे दिन नीतीश कुमार ने उनसे इस्तीफा लेकर ललन सिंह को पार्टी अध्यक्ष बना दिया, लेकिन ललन सिंह के मन में यह बात बैठ गई थी कि आरसीपी सिंह ने नीतीश कुमार को दरकिनार कर सीधे भाजपा से संबंध बना लिए हैं। बस यहीं से जेडीयू के एनडीए से निकलने की भूमिका तय हो गई थी।
ललन सिंह ने उसी दिन भाजपा से गठबंधन तोड़कर लालू यादव से गठबंधन बनाने की साजिश रचना शुरू कर दिया था। हालांकि वह ललन सिंह ही थे, जिन्होंने लालू यादव के चारा घोटाले की फाईल खोली थी, उन्हें भ्रष्टाचारी कह कर उनके खिलाफ आन्दोलन किया और आखिरकार उन्हें जेल पहुंचाया। लालू यादव के रेलमंत्री रहते समय हुए लैंड फॉर जॉब घोटाले को भी ललन सिंह ने खोला था, वह घोटाले के सबूत लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिले थे। लेकिन उन्हीं ललन सिंह ने ठान लिया था कि वह नीतीश कुमार का भाजपा से गठबंधन तुड़वा कर ही रहेंगे।
आरसीपी सिंह ने नीतीश कुमार से दूरी बना कर आग में घी डालने का काम किया। इस बीच बिहार के भाजपाई नेताओं का यह बयान नीतीश कुमार को नागवार गुजरा कि वह भाजपा की मेहरबानी से मुख्यमंत्री हैं। नीतीश कुमार ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से शिकायत भी की थी, लेकिन किसी ने बिहार के नेताओं को नहीं रोका। तब नीतीश कुमार ने खुद ललन सिंह से कहा कि लालू यादव से बात की जाए। ललन सिंह ने लालू यादव से संपर्क किया और बात आगे बढ़ी।
जुलाई 2022 में जब नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह को राज्यसभा टिकट नहीं दिया, तो उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। नीतीश कुमार ने मोदी को कोई वैकल्पिक नाम नहीं भेजा और एक महीने के भीतर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर एनडीए से बाहर निकल गए। राज्यपाल को इस्तीफा देकर वह ललन सिंह के साथ ही सीधे राबड़ी देवी के घर पहुंचे थे, जहां लालू यादव और तेजस्वी यादव ने उनका दिल खोल कर स्वागत किया। लालू यादव ने भी ललन सिंह को माफ़ कर दिया।
उस दिन से लालू और ललन के संबंधों में सुधार होता गया। नीतीश कुमार ने एनडीए छोड़ने के बाद विपक्षी एकता का बिगुल बजाना शुरू कर दिया था। जिसकी परिणिति 23 जून को पटना में विपक्ष की पहली बैठक में हुई, जो बाद में 28 दलों का इंडी एलायंस बना।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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