Kashmir: कश्मीर में उम्मीदों का नया सूर्योदय
Kashmir: अगर सबकुछ ठीक रहता तो इस बार आमचुनाव से पहले कश्मीर तक रेलगाड़ी से सफर शुरु हो जाता। लेकिन सबकुछ ठीक नहीं रहा। ऐन मौके पर 22 जनवरी को कटरा से संगलडैन के बीच टनल-1 में धंसाव हो गया और पूरा काम कुछ महीने के लिए आगे बढ़ गया।
अचानक आये इस अवरोध के बावजूद 20 फरवरी को प्रधानमंत्री मोदी ने संगलडैन से बनिहाल के बीच 48 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन का उद्घाटन किया। इसके बाद अब कटरा न सही, जम्मू संभाग का रामबन कश्मीर से रेलवे लाइन से जरूर जुड़ गया है। इसलिए तकनीकी तौर पर यह तो कहा ही जा सकता है कि इतिहास में पहली बार जम्मू और कश्मीर रेल मार्ग से जुड़ गये हैं।

अब भी अगर सबकुछ ठीक रहा और कोई नया अवरोध नहीं आया तो इस साल जून जुलाई तक कश्मीर पूरे देश के साथ रेलमार्ग से जुड़ जाएगा। यह कश्मीर के इतिहास में एक ऐसी ऐतिहासिक उपलब्धि होगी जिसे पूरा कर पाने में वो ब्रिटिश हुक्मरान भी पीछे हट गये थे जिन्होंने भारत में रेलवे की शुरुआत की।
कश्मीर में रेलगाड़ी ले जाने की घोषणा नरसिम्हा राव सरकार में 1994 में ही हो गयी थी। लेकिन नब्बे के दशक में दिल्ली में जारी राजनीतिक अस्थिरता का असर इस प्रोजेक्ट पर भी पड़ा। 2002 में जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इसे नेशनल प्रोजेक्ट का दर्जा दे दिया, उसके बाद से इसने गति पकड़ी। मनमोहन सिंह की सरकार और मोदी सरकार ने भी इसे पूरा महत्व दिया जिसके कारण जम्मू से ऊधमपुर तक मनमोहन सरकार में और ऊधमपुर से कटरा के बीच मोदी सरकार के समय काम पूरा हुआ।
दूसरी ओर बनिहाल से श्रीनगर होते हुए बारामुला तक ट्रेनों के संचालन को हरी झंडी मनमोहन सिंह सरकार में ही मिल गई थी। लेकिन बनिहाल से कटरा के बीच कश्मीर तक रेलवे लाइन ले जाने का सबसे दुर्गम रास्ता है। इसमें अब जबकि बनिहाल से संगलडैन का काम पूरा हो चुका है तब संगलडैन से श्रीमाता वैष्णोदेवी कटरा तक का काम ही शेष बचा है। इस 63 किलोमीटर लंबे रेलमार्ग में सबसे मुश्किल चेनाब ब्रिज और अंजीखड्ड ब्रिज का काम पूरा कर लिया गया है। सिर्फ सुरंग का काम पूरा होना बाकी है।
उम्मीद करनी चाहिए कि इस साल 2024 तक कश्मीर घाटी पूरे देश के साथ रेलमार्ग से जुड़ जाएगी। भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे दुर्गम रास्ते पर रेल लाइन को पूरा करने के बेहद करीब पहुंच गया है। कटरा से बनिहाल के बीच पूरी रेलवे लाइन लगभग सुरंगों और पुलों पर ही गुजरती है। इस दुर्गम रास्ते पर रेलवे लाइन बिछाकर निश्चित रूप से रेलवे एक इतिहास रचने के करीब है जो न सिर्फ भारत के लिए बल्कि जम्मू कश्मीर के लिए भी एक वरदान साबित होने जा रहा है।
2019 में जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाकर मोदी सरकार ने कश्मीर के संपूर्ण एकीकरण की जो शुरुआत की थी, अब चार साल बाद उसके सुखद परिणाम दिखने लगे हैं। जम्मू कश्मीर में साल दर साल पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है। श्रीनगर में जी-20 की बैठकों का आयोजन करके मोदी ने पहले ही श्रीनगर के टूरिज्म महत्व को उभारा है। अब रेलवे लाइन के शुरु हो जाने के बाद पर्यटकों के लिए एक और आकर्षण पैदा हो गया है। जो पर्यटक बर्फबारी के बीच ट्रेन के सफर का आनंद लेने स्विटजरलैंड जाया करते थे, अब जम्मू से बारामूला के बीच ही उनको वह आनंद मिल सकेगा।
कश्मीर की लगभग पूरी अर्थव्यवस्था दो तीन बातों पर निर्भर रही है। सेब की खेती, बुनकरी तथा कुटीर उद्योग और पर्यटकों की आवक। कश्मीर में आतंकवाद बढने के साथ ही वहां पर्यटन बुरी तरह से प्रभावित हुआ। 1991 में कश्मीर घाटी से हिन्दुओं को पूरी तरह निकाल दिये जाने के बाद देशभर में यह संदेश गया कि कश्मीर जाना सुरक्षित नहीं है। लेकिन मोदी ने जम्मू कश्मीर से मात्र धारा 370 ही नहीं हटायी बल्कि कश्मीर को आर्थिक विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास भी किया। इसके लिए निवेशकों के लिए कश्मीर के दरवाजे खोले गये। भ्रष्टाचार और सरकारी लूट खसूट पर रोक लगायी गयी। अलगाववादियों की धरपकड़ करके उन्हें देश की अलग अलग जेलों में बंद कर दिया गया।
इसके साथ ही पाकिस्तान से आनेवाले हवाला के धन पर भी शिकंजा कसा गया तथा एनआईए को लगाकर कश्मीर में आतंकवाद की शिक्षा देनेवाली संस्थाओं और मदरसों पर भी रोक लगायी गयी। एक ओर यह सब किया गया तो दूसरी ओर स्थानीय लोगों को मुख्यधारा में आने के लिए प्रोत्साहित किया गया। स्थानीय पंचायत चुनाव करवाये गये ताकि स्थानीय लोगों की प्रशासन में भागीदारी बढ़े। केन्द्रीय योजनाओं में पारदर्शिता लाने का प्रयास हुआ जिसका परिणाम यह हुआ कि कल तक कश्मीर की गलियों में पत्थर बरसाने वाले नौजवान भी कश्मीर की इस बदलती आबोहवा में बदल गये।
सिर्फ कश्मीर तक रेलवे ले जाने की बात नहीं है जिसकी प्रशंसा फारुख अब्दुल्ला भी कर रहे हैं। श्रीनगर को संजाने संवारने के साथ ही वहां इलेक्ट्रिक बसों का संचालन शुरु किया गया। इन सबमें एक अच्छी तस्वीर उभरकर जो सामने आ रही है वह यह कश्मीर की लड़कियां खुलकर यू ट्यूब चैनल चला रही हैं और लोगों को बदलते कश्मीर से परिचित करवा रही हैं। याना मीर का ब्रिटेन से वायरल हुआ वह वीडियो इसी की एक कड़ी है जिसमें उन्होंने कहा है कि वो अपने कश्मीर और अपने देश भारत में सुरक्षित हैं।
हालात बदले तो पर्यटकों का रुख फिर से कश्मीर की ओर होने लगा। साल 2022 का आंकड़ा है कि कश्मीर में रिकार्ड 1 करोड़ 84 लाख पर्यटक आये। इसके पहले 2021 में 1 करोड़ 11 लाख पर्यटक जम्मू कश्मीर पहुंचे थे। इसके पहले के दशको में जब से कश्मीर में आतंकवाद का दौर शुरु हुआ था तब से एक करोड़ पर्यटकों का आंकड़ा कभी नहीं पहुंचा था।
निश्चित रूप से कश्मीर में यह उम्मीदों का नया सूर्योदय है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि अलगाववादी खत्म हो गये हैं या फिर पाकिस्तान ने कश्मीर की ओर से अपनी आंखें पूरी तरह से मूंद ली है। पाकिस्तान की आंतरिक परिस्थितियां अच्छी नहीं है इसके बावजूद इसी महीने हुए चुनाव में कश्मीर भी एक चुनावी मुद्दा बना रहा। पाकिस्तान और कश्मीर के अलगाववादी कभी नहीं चाहेंगे कि बदलाव की जो बयार कश्मीर में बह रही है वह स्थाई हो।
हालांकि पाकिस्तान की कमजोर आर्थिक हालत ने अलगाववादी कश्मीरियों को भी यह कहने पर बाध्य किया है कि जब उनके अपने हालात अच्छे नहीं हैं तो वह हमारा ख्याल क्या करेंगे? इसलिए अब स्थानीय कश्मीरियों की जिम्मेवारी है कि वो इस्लामिक कट्टरता को छोड़कर यथार्थ को स्वीकार करें। अलगाववाद कश्मीर में समस्या तो पैदा कर सकता है लेकिन उनके लिए कोई समाधान प्रस्तुत नहीं कर सकता। कश्मीर के लालचौक पर जो तिरंगा आज शान से लहरा रहा है उसकी चमक को बरकरार रखने का जितना जिम्मा भारत सरकार का है उतना ही जिम्मा स्थानीय कश्मीरियों का भी है।
कश्मीरियों को अलगाववाद का जो पाठ पढाया गया है उसे भूलकर उन्हें उस साझा संस्कृति को पुन: अपनाना होगा जो कश्मीर ही नहीं बल्कि भारत की विरासत रही है। इसी में कश्मीर का भविष्य सुरक्षित है और पूरे भारत का भी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications