New Laws: नये कानून बन गये, क्या अब नहीं मिलेगी तारीख पर तारीख?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सोमवार को तीन नए आपराधिक न्याय विधेयकों को अपनी मंजूरी दे दी जिससे यह ऐसे कानून बन जाएंगे जो औपनिवेशिक कानून अर्थात आईपीसी, सीआरपीसी और साक्ष्य अधिनियम की जगह लेंगे। तीनों नए कानून से ब्रिटिश काल से चले आ रहे ब्रिटिश कैलेंडर, क्वीन, ब्रिटिश इंडिया, जस्टिस ऑफ द पीस, लंदन गजट, ज्यूरी, हर हैनिस जैसे 475 शब्दों को निकाल कर न्याय तंत्र को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करने की कोशिश की गई है। लेकिन बिल पेश करते हुए सदन में गृह मंत्री के तारीख पर तारीख युग का अंत सुनिश्चित करने के दावे की राह में अभी कई अड़चनें हैं जिससे पार पाना बाकी है।
मसलन नए आपराधिक कानून लागू होने के बाद पुराने केसों का क्या होगा? पहले से दर्ज प्राथमिकी और लंबित केसों का क्या होगा? क्या नए कानून को लेकर पुलिस विभाग को ट्रेनिंग दी जाएगी? वकीलों के साथ-साथ अदालत में जजों को भी नए और पुराने दोनों कानून को याद करना होगा? आदि-आदि।

संविधान निर्माताओं ने संविधान में सभी नागरिकों के लिए समय पर न्याय सुनिश्चित करने का वादा किया था, लेकिन आजादी के 75 साल गुजर जाने के बाद भी क्या यह वादा पूरा हो पाया या किसी प्रकार होता हुआ दिख रहा है? इसी साल आई तृतीय भारतीय न्याय रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 तक उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों में कुल 4.9 करोड़ मामले लंबित थे। इनमें 1.92 लाख मामले तो 30 वर्षों से अटके हुए थे, जबकि 56 लाख ऐसे थे जो 10 वर्षों से लंबित थे। विभिन्न जेलों में बंद 77% लोग ऐसे थे जिनका मामला विचाराधीन है।
उच्चतम न्यायालय के सामने भी मामलों का अंबार लगा हुआ है। 2 अगस्त 2022 तक शीर्ष अदालत में 71,441 मामले लंबित थे जिनमें से 56,365 दीवानी के और 15,076 मामले फौजदारी के थे। वर्ष 1948 में अपनाए गए मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणा पत्र में न्याय के अधिकार की गारंटी दी गई है। एक लोकप्रिय कहावत है कि न्याय में देरी अन्याय के समान है। न्याय में देरी के दीर्घकालिक दुष्परिणाम होते हैं। धीरे-धीरे लोगों का अपनी न्यायिक प्रणाली में भरोसा खत्म होने लगता है।
इस भरोसे को कायम रखने की गरज से न्यायिक प्रणाली पर बोझ घटाने और उसकी गति बढ़ाने के लिए एक के बाद एक सरकारों ने फास्ट ट्रैक कोर्ट, विशेष न्यायाधिकरण, उपभोक्ता अदालत और लोक अदालतों आदि का गठन किया।
न्याय में देरी के कुछ कारण भी सामने आए हैं। एक तो बड़ा कारण यही निकला कि सरकार ही सबसे बड़ी मुकदमेबाज है। बजट अपर्याप्त है। जनसंख्या के अनुपात में न्यायाधीशों की संख्या बहुत कम है। क्षमताएं और प्रतिबद्धता भी सवालों के घेरे में है। न्यायिक प्रक्रिया लंबी है तो कार्य संस्कृति पर भी प्रश्न है।
ऐसे ही कुछ ज्वलंत सवालों को ध्यान में रख न्याय तक आम आदमी की पहुंच कायम करने तथा तारीख पर तारीख की परिपाटी का अंत सुनिश्चित करने के लिए केंद्र की राजग सरकार ने मौजूदा आईपीसी, सीआरपीसी और इंडियन एविडेंस एक्ट की जगह भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम नामक नए अपराधी कानून पारित किए हैं। त्वरित न्याय की कामना करते हुए नए कानून में व्यापक बदलाव किए गए हैं। भारतीय दंड संहिता की 511 धाराओं के स्थान पर भारतीय न्याय संहिता में कुल 358 धाराएं हैं और उसमें 20 नए अपराध को परिभाषित किया गया है। 33 अपराधों में सजा को बढ़ाया गया है, 83 ऐसी धाराएं या अपराध हैं जिनमें जुर्माने की राशि भी बढ़ा दी गई है।
इसी तरह दंड प्रक्रिया संहिता में कुल 484 धाराएं थी, अब उसकी जगह प्रस्तुत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में 531 धाराएं हैं। कुल 177 ऐसे प्रावधान है जिनमें संशोधन हुआ है, 9 नई धाराएं और 39 उप धाराएं जोड़ी गई है, 14 धाराओं को निरस्त कर दिया गया है। वहीं भारतीय साक्ष्य अधिनियम में 167 प्रावधानों की जगह अब कुल 170 प्रावधान होंगे। कल 24 प्रावधान बदले गए हैं, दो नए प्रावधान और 6 उप प्रावधान जोड़े गए हैं।
राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद तीनों नए आपराधिक कानूनों के प्रभावी होते ही पुलिस और अधिवक्ताओं के माथे पर बल पड़ने वाले हैं, क्योंकि उन्हें नई प्रक्रियाओं को अपनाना पड़ेगा। दशकों से वे जिन धाराओं के तहत मुकदमा तैयार करते थे, उनकी पैरवी करते थे अब उनमें व्यापक संशोधन हो गए हैं। अदालत में जजों को भी नए पुराने के बीच समन्वय स्थापित करना होगा। नए सिरे से पूरे आपराधिक कानून और उनके स्पष्टीकरण को समझने के लिए संशोधनों को पढ़ना पड़ेगा। कानून के विद्यार्थियों के लिए भी मुश्किलें बढ़ने वाली है। उन्हें अपनी पूरी तैयारी अब नए सिरे से करनी पड़ेगी।
उदाहरण के लिए अब हत्या के लिए धारा 101, धोखाधड़ी के लिए धारा 316, अपहरण के लिए धारा 135, बलात्कार के लिए धारा 63, समूह में बलात्कार के लिए धारा 70, छिनैती के लिए धारा 302, राजद्रोह के लिए धारा 150, देश विरोधी गतिविधि के लिए धारा 146, सार्वजनिक स्थान पर हंगामा के लिए धारा 187, देश के खिलाफ षड्यंत्र के लिए धारा 145, शादी का झांसा देकर यौन संबंध बनाने के लिए धारा 69 व्यवहार में लाना होगा।
नए कानून में औपनिवेशिक विशेषण हटाने के साथ-साथ नौ जगहों पर पागल और बेवकूफ जैसे टर्म हटा दिए गए हैं। 44 जगह पर कोर्ट आफ जस्टिस को हटाकर कोर्ट कर दिया गया है। इसी तरह 12 स्थान पर डिनोट्स को कोर्ट में बदल दिया गया है। आतंकवाद से संबंधित अपराध को अब तक यूएपीए तथा संगठित अपराध को मकोका के तहत डील किया जाता रहा है। नए कानून में संगठित अपराध को धारा 111 तथा आतंकी गतिविधि को धारा 113 में रखा गया है। ऐसे में इन विशेष अधिनियमों के औचित्य पर भी संशय है।
चूंकि पहले से जो मामला दर्ज है उसमें पहले के कानून के तहत ही चार्जशीट दाखिल की जाएगी और पहले के कानून के तहत ही उसमें मुकदमा चलेगा। जो मामला अदालतों में पेंडिंग है उन मामलों की सुनवाई भी पहले की ही तरह चलती रहेगी, उन पर असर नहीं होगा। लेकिन अब जो नए अपराध होंगे वह नए कानून के तहत दर्ज किए जाएंगे। नए कानून के हिसाब से मुकदमा चलेगा और नए प्रावधान के मुताबिक सजा होगी। ऐसे में जो वकील पुराने कानून पढ़कर अब तक वकालत करते थे उन्हें नए कानून को भी याद करना होगा। नए मामलों में वकीलों को नए कानून के दायरे में अपनी दलीलें देनी होगी। पुलिस तंत्र को भी नए और पुराने दोनों कानून की धाराओं को याद कर अमल में लाना होगा। पुलिस और वकील के साथ-साथ अदालत में जजों को भी दोनों तरह के कानून से मामलों को देखना होगा।
लेकिन नयी न्याय संहिता बना देने और उसे सदन से पास करवा देने भर से जनता को त्वरित न्याय मिल जाएगा इसकी उम्मीद कम है। बल्कि नये और पुराने कानून के उलझाव में देरी ही होगी। न्याय प्रदान करने का जो ढांचा है वह भी पुराना ही है। उसमें जब तक व्यापक बदलाव नहीं किया जाता नयी न्याय संहिता बन जाने के बाद भी तारीख पर तारीख का सिलसिला खत्म नहीं होगा।
ऐसे में मुकदमों के त्वरित निपटान के लिए उन्हें विभिन्न श्रेणियां में विभाजित करना उपयोगी होगा। समय सीमा तय करने के साथ-साथ जवाबदेही तय करने की भी जरूरत होगी। गड़बड़ियों और दुर्व्यवहार पर निगरानी के लिए विशेष कैडर वाली एजेंसी बनाना चाहिए जिससे कि न्याय मिलने की गति में तेजी आए।
हर स्तर पर प्रशासनिक सहयोग तथा उच्च स्तरीय निगरानी के साथ-साथ यह भी व्यवस्था होनी चाहिए कि प्रत्येक वर्ष में उसकी प्रगति रिपोर्ट संसद के पटल पर रखी जाए। न्यायिक तंत्र में बड़े पैमाने पर भर्तियां करने के साथ-साथ व्यापक प्रशिक्षण प्रदान करने की भी जरूरत होगी। समस्त ढांचे को समुन्नत बनाये बिना त्वरित न्याय संभव नहीं हो पायेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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