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Renaming Locations: दिल्ली को मुगल मानसिकता से बाहर निकालकर भारतीय पहचान देने की जरूरत

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्थान या सड़कों के नामकरण को लेकर पूरी नीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। केवल व्यक्ति आधारित नाम में बदलाव के बजाय इसके जरिए राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने की जरूरत है।

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Renaming Locations: सड़कों या स्थान का नाम बदलने को लेकर भारतीय मीडिया का एक वर्ग बहुत संवेदनशील रहता है। अगर कहीं नाम में बदलाव हो, खासकर नाम के जरिए भारतीय सभ्यता को प्रकट किया जाए तो यह वर्ग मातम करने पर उतर आता है। कुछ इस तरह से प्रलाप करता है मानों भारत की पहचान बदली जा रही है।

मुगल गार्डेन को 'अमृत उद्यान' नाम देने पर दबे स्वर में यही मातम सुनाई दिया। इलाहाबाद को प्रयागराज और फैजाबाद को अयोध्या कैंट किया गया तब भी मातम करने वालों की यह टीम सक्रिय नजर आयी थी। ये वही लोग हैं जो भारत की 'अभारतीय' पहचान को 'भारतीय पहचान' बताकर समाज को भ्रम में रखना चाहते हैं। वो मुगल को तो भारतीय पहचान मानते हैं लेकिन अमृत उन्हें विष नजर आता है।

मुगल गार्डेन के अतिरिक्त राष्ट्रीय राजधानी का वो हिस्सा जिसे लुटियन्स जोन कहा जाता है, वहां सड़कों का नामकरण व्यक्ति आधारित किया गया है। भारत पर जितने मुस्लिम आक्रमणकारी आये, यहां लूटपाट की, नरसंहार किए और बाद में अत्याचार पूर्ण शासन किया, उनके नाम से ही लुटियन जोन की पहचान हैं। इसमें तुगलक रोड, लोधी रोड, फिरोजशाह रोड, बाबर रोड, शाहजहां रोड, अकबर रोड, हुमायूं रोड, सफदरजंग रोड प्रमुख हैं। कुछ साल पहले तक औरंगजेब रोड का नाम भी इस लिस्ट में शामिल था लेकिन अब उसे बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड कर दिया गया है।

इन नामों को देखेंगे तो एक बात साफ समझ आती है कि मुगल काल कहे जाने वाले इस्लामिक शासकों को ही प्रमुखता दी गयी है। मान सिंह को भी किसी सड़क पर जगह इसलिए दी गयी क्योंकि वो भी मुगलों के हितैषी थे। हां, पृथ्वीराज चौहान का नाम जरूर पहले से मौजूद है।

मुगलकालीन शासकों या तुर्क इस्लामिक शासकों के अलावा ब्रिटिश उपनिवेशवाद के अवशेष आज भी मौजूद हैं। इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं। आखिर इस लुटियंस दिल्ली को बसाया तो ब्रिटिश शासकों ने ही था। पूरा लुटियंस जोन स्वतंत्रता के समय तक ब्रिटिश राजा, उनका परिवार, उनके प्रमुख सलाहकार या फिर भारतीय वॉयसरॉय तथा गवर्नर जनरल के नामों को ही समर्पित था। किंग्स को समर्पित किंग्स वे था जो राजपथ के बाद अब कर्तव्य पथ बन गया है। क्वीन्स रोड जनपथ बन गया।

लार्ड क्लाइव रोड को त्यागराज मार्ग और डूप्ले रोड को कामराज नाम दे दिया गया। क्वीन मैरिज एवेन्यू को पंडित पंत मार्ग तो प्रिंस एडवर्स प्लेस को विजय चौक बना दिया गया। ड्यूक ऑफ कनॉट के नाम पर बनाया बाजार कनॉट प्लेस अब राजीव चौक हो गया है। इसी तरह लेडी हार्डिंग रोड शहीद भगत सिंह मार्ग हो गया तो इरविन रोड बाबा खड़क सिंह मार्ग बन गया। तिलक मार्ग, कस्तूरबा गांधी मार्ग, पंत मार्ग, मोतीलाल नेहरु रोड, राजेन्द्र प्रसाद रोड, रफी मार्ग और माधवराव सिंधिया मार्ग भी समय समय पर किसी न किसी ब्रिटिश हुक्मरान का नाम हटाकर जोड़ा गया है।

लुटिसन्स दिल्ली में अगर किसी के नाम पर कोई रोड नहीं है तो वह स्वयं सर एडवर्ड लुटियन हैं जिन्होंने 1912 में में इसे डिजाइन किया था।

खैर, नामों का बदलना कोई नयी बात नहीं होती। जैसे लोग सत्ता में होते हैं वो अपने आदर्शों के अनुकूल सड़कों और जगहों का नामकरण कर देते हैं। अतीत में जब तक कांग्रेस की सरकार रही तो उसने अंग्रेजों के नाम हटाकर भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों या आदर्श पुरुषों के नाम पर सड़कों के नाम रखे। लेकिन उन्होंने मुगलों और मुस्लिम शासकों के नाम पर बनी सड़कों को नहीं छुआ। अब केन्द्र में भाजपा की सरकार आयी तो औरंगजेब रोड का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड करने के बाद मुगल गार्डन को अमृत उद्यान कर दिया।

भाजपा सरकार के सामने बार बार ये मांग भी दोहराई जाती है कि वो मुगल या इस्लामिक आक्रमणकारियों के नाम को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से बाहर कर दे। भाजपा सरकारें इस बारे में पहल तो करती हैं लेकिन आधी अधूरी। जैसे उन्होंने औरंगजेब रोड का नाम तो बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड किया लेकिन उसी रोड से जुड़े औरंगजेब लेन का नाम बदलना भूल गये।

लेकिन यहां हम इस बात को छोड़ देते हैं कि दिल्ली की सड़कों पर किसका नाम होना चाहिए या नहीं होना चाहिए। उससे बड़ा सवाल ये है कि नाम बदलने की इस बहस में एक बुनियादी बात हमेशा छूट जाती है। वह यह कि व्यक्तियों के नाम पर सड़कों का नाम रखने पर इतना जोर क्यों दिया जाता है? क्या यह भारतीय समझ है? नामकरण में व्यक्तियों को प्रमुखता वो लोग अधिक देते हैं जो आक्रमणकारी होने में गर्व का अनुभव करते हैं। वही हैं जो आक्रमण करके संसार की सभ्यताओं को अपने जैसा बना देने का प्रयास करते हैं।

फिर वो चाहे भारत में आनेवाले मुस्लिम आक्रमणकारी हों या ब्रिटिश उपनिवेशवादी। दोनों हमें एक नयी पहचान देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने हमारे ऊपर अपनी श्रेष्ठता साबित करने की कोशिश की। यह काम सिर्फ हमारी पहचान मिटाकर ही हो सकती थी, इसलिए उन्होंने अपने व्यक्तिवादी नामकरण किये ताकि हमें बार बार ये अहसास होता रहे कि हम उनके अधीन हैं।

भारतीय दर्शन इसके ठीक उलट है। हम व्यक्तिवादी संस्कृति की बजाय स्थानीय संस्कृति को महत्व देते हैं। हम किसी को अपने अनुरूप बदलने की बजाय उसको उसी के रूप में स्वीकार करने का प्रयास करते हैं। इसलिए अगर हम एक व्यक्ति का नाम हटाकर दूसरे व्यक्ति का नाम दे रहे हैं तो वह व्यक्ति भले ही भारतीय हो लेकिन यह सोच उन्हीं आक्रांताओं वाली है।

भारत की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र या लुटियंस जोन का भारतीकरण करने का एकमात्र तरीका है कि उसमें भारतीय सोच के अनुसार सांस्कृतिक बदलाव किये जाएं। यहां व्यक्तियों को महत्व देने की बजाय सनातन सभ्यता को महत्व दिया जाए। इसका एकमात्र तरीका है कि राष्ट्रीय राजधानी के लुटियन्स जोन की सड़कों के नाम व्यक्तियों पर रखने की बजाय भारत के सभ्यतामूलक प्रतीकों के नाम पर सड़कों का नामकरण होना चाहिए।

भारत सांस्कृतिक रूप से इतना समृद्ध देश है कि यहां नदियों, जंगलों और पर्वतों के नामकरण किये गये हैं। ये नामकरण किसने किये किसी को पता नहीं लेकिन उस क्षेत्र या फिर पूरे भारत के लोग उन नामों से एक खास लगाव अनुभव करते हैं।

गंगा को गंगा नाम किसने दिया यह कोई नहीं जानता लेकिन भारत का व्यक्ति गंगा नाम से जो जुड़ाव महसूस करता है वह किसी व्यक्ति के नाम से कर सकता है? इसी तरह गोमती, कावेरी हो या सिन्धु, गोदावरी। सतपुड़ा के जंगल हों या काजीरंगा का जंगल, सुन्दरवन हो या गीर के जंगल इन नामों को सुनकर ही हमारा भावनात्मक जुड़ाव हो जाता है। इसी तरह पर्वतों का नामकरण है। हिमालय हो या अरावली पर्वत माला, विन्ध्य पर्वत हो नीलगीरि पर्वत। इन नामों के साथ भारत का सामान्य नागरिक जो जुड़ाव महसूस करता है वो किसी व्यक्ति के नाम से महसूस करता है?

अगर राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों के नाम भारत के जंगलों, नदियों और पर्वतों के साथ साथ क्षेत्रीय सांस्कृतिक प्रतीकों पर रखा जाए तो इससे जहां एक ओर पूरे देश के लोग दिल्ली से अपना जुड़ाव महसूस करेंगे, वहीं दूसरी ओर इसके कारण किसी तरह का कोई विवाद नहीं होगा। टकराव के उलट ऐसा करने से उस राज्य या क्षेत्र के लोग जब भी राष्ट्रीय राजधानी में आयेंगे तो यहां से अपना जुड़ाव महसूस करेंगे। इसके कारण राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में भी मदद मिलेगी।

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    इस तरह का एक छोटा प्रयोग दिल्ली के ही जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में किया गया है। वहां देश के नदियों और पहाड़ों के नाम पर सड़कों और हॉस्टलों का नाम रखा गया है। इसके कारण देशभर के छात्र जब वहां पढ़ने आते हैं तो वहां से अपना जुड़ाव महसूस करते हैं। इस प्रयोग को ही अब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में लागू करने की जरूरत है।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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