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Muslims on UCC: समान नागरिक संहिता के खिलाफ नहीं है पसमांदा मुसलमान

Muslims on UCC: एक बार फिर समान नागरिक संहिता चर्चा में है। 22वें विधि आयोग (लॉ कमीशन) द्वारा एक बार इस मुद्दे पर लोगों तथा धार्मिक संगठनों की राय मांगी गयी है। इससे पहले 2018 में भी विधि आयोग द्वारा इसी तरह के सुझाव मांगे गये थे। इस बार आयोग ने व्यापक स्तर पर जनता और मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठनों के विचारों को जानने का फैसला किया है। इच्छुक व्यक्ति और धार्मिक संगठन आयोग के नोटिस की तारीख से 30 दिनों के भीतर अपने विचार प्रस्तुत कर सकते हैं।

स्वाभाविक है विधि आयोग के इस विचार विमर्श पर राजनीतिक और धार्मिक समुदायों की बयानबाजी भी होगी। लेकिन सवाल यह है कि समान नागरिक संहिता से देश में परेशानी किसे है? समान नागरिक संहिता की जब जब चर्चा होती है तो मुसलमानों के विरुद्ध कुछ इस तरह से दुष्प्रचार किया जाता है कि यदि यूसीसी लागू हुआ तो मुसलमानों की मजहबी आस्था खतरे में पड़ जाएगी। जबकि देश के अन्य कानून समान रूप से सभी नागरिकों पर लागू हैं जिससे किसी भी धर्म के मानने वाले और उसकी धार्मिक आस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। तो फिर विवाह, संबंध विच्छेद, भरण पोषण, उत्तराधिकार, विरासत आदि मामले में यदि समरुपता आती है तो यह कैसे किसी धर्म विशेष के विरुद्ध होगा?

Muslims on UCC Pasmanda Muslims are not against Uniform Civil Code

दूसरी बात यह कि यूसीसी के लिए संविधान में स्पष्ट दिशा निर्देश है कि राज्य इसको लागू करने का प्रयास करें। अगर सरकार ऐसा करती है तो यह संविधान की मंशा के अनुरूप ही होगा। जब तीन तलाक को मोदी सरकार द्वारा गैर कानूनी घोषित किया गया तो मुस्लिम समुदाय के कितने प्रतिशत लोगों ने इसके खिलाफ आवाज उठायी? कितने लोग सड़कों पर उतरे। समुदाय के अधिसंख्यक लोगों ने इसे स्वीकार कर लिया क्योंकि यह उनके हित में ही था।

तीन तलाक के प्रतिबंध को भी मुस्लिम मामलों में सरकार के हस्तक्षेप के रूप में प्रचारित किया गया जबकि सच्चाई यह है कि तीन तलाक से पीड़ित सबसे अधिक पसमांदा महिलाएं और पुरुष थे। धर्मांतरित होने के बाद भी शादी विवाह के मामले में पसमांदा समाज अपने भारतीय कल्चर को ही अपनाता रहा है जिसमें विवाह का टूटना एक कलंक के रूप में माना जाता है। न सिर्फ लड़की के लिए बल्कि लड़के के लिए भी दूसरा जोड़ा लगना एक दुरूह कार्य है। इस प्रकार तलाक से दोनों का जीवन मुश्किलों से घिर जाता था। पुरुष तो फिर भी जैसे तैसे अपना जीवन यापन कर लेता है लेकिन महिलाओं के सामने जीवन गुजारना एक बड़ी चुनौती होती है और जीवन भर पिता भाई के ऊपर निर्भर रह कर जीवनयापन किसी सजा से कम नहीं।

इसके विपरित अशराफ समाज में दूसरा निकाह बहुत आसान होता है क्योंकि उनके कल्चर (अरबी/ईरानी) में दूसरा निकाह और बहु विवाह एक आम सी बात है। इसलिए उन्हें इस मामले में आम तौर से किसी विशेष दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ता है। यही कारण है कि समुदाय के अशराफिया तबके ने जहां इसका विरोध किया वहीं पसमांदा समाज ने इसका स्वागत किया।

इसी तरह जब जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया तब बहुत हंगामा किया गया। लेकिन जम्मू कश्मीर में इसका सर्वाधिक लाभ पसमांदा मुस्लिम समाज को ही मिल रहा है। भारत के हर राज्य के अशराफ वर्ग सभी मामलो में वहां के पसमांदा समाज से बहुत आगे हैं लेकिन कश्मीर में यह अन्तर और भी बड़ा है। केंद्र सरकार की बहुत सी लोक कल्याणकारी परियोजनाएं सहित सामाजिक न्याय का आरक्षण जो अब तक विशेषाधिकार होने के कारण पूरी तरह से लागू नहीं हो पाता था और जिसका सीधा नुकसान वहां का देशज पसमांदा समाज उठाता था, अब पूरी तरह लागू होगा। फलस्वरूप कश्मीर का पसमांदा भी मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के पसमांदा की तरह विकास के समान अवसर का अधिकारी होगा।

सच्चाई तो यह है कि अगर मोदी सरकार समान नागरिक संहिता पर आगे बढ़ती है तो पसमांदा मुस्लिम इस पहल का स्वागत ही करेगा। मुस्लिम समुदाय में सामाजिक न्याय की बात करते हुए वंचित पसमांदा मुसलमानों के दुःख दर्द की बात कर प्रधानमंत्री मोदी जी ने अब तक अछूत समझे जाने वाले पसमांदा विमर्श को राष्ट्रीय स्तर पर बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।

विदित रहे कि सरकारी संस्थाओं और सरकार द्वारा प्रदत्त शिक्षा और नौकरियों में तो पसमांदा समाज की कुछ ही सही भागेदारी दृष्टिगोचर होती है लेकिन मुस्लिम नाम से चलने वाली सरकारी, अर्ध सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं यथा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, मदरसा बोर्ड, उर्दू बोर्ड, वक़्फ़ बोर्ड, बड़े मदरसे, मिल्ली काउंसिल, मजलिसे मुशावरत, इमारते शरिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया और इन्ट्रीगल यूनिवर्सिटी आदि में देशज पसमांदा मुसलमानों की भागीदारी ना के बराबर है।

ऐसी स्थिति न तो मुस्लिम समाज के हित में है और ना ही देश हित में है। इसलिए मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय की बात करना ना सिर्फ 90% मुसलमानों (वंचित पसमांदा) को मुख्य धारा में लाने की कवायद भर है बल्कि यह देश को सुदृढ़ बनाने की प्रक्रिया भी है क्योंकि जैसे ही मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय स्थापित होगा मुस्लिम सम्प्रदायिकता भी कमज़ोर पड़ जाएगी।

मोदी सरकार द्वारा मुस्लिमों से जुड़े मामलों में अब तक जो पहल की गयी है वह व्यापक मुस्लिम समुदाय के हित में ही है। ऐसे में अगर राहुल गांधी अमेरिका में जाकर यह कहते हैं कि मुसलमानों के साथ जो हो रहा है वही दलितों के साथ हो चुका है तो वो मुस्लिम समुदाय के बहुसंख्यक पसमांदा की घोर उपेक्षा कर रहे हैं।

यह बात सच है कि विगत कई वर्षों से मजहबी पहचान के कारण मुसलमानों के साथ कुछ सांप्रदायिक घटनाएं जरूर हुई हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि इस तरह की घटनाएं सिर्फ वर्तमान में ही हुई हैं या हो रही है। कॉन्ग्रेस के शासन काल में भी ऐसी घटनाएं होती रही है। लेकिन मौजूदा सरकार ने कुछ ऐसे बड़े फैसले लिए है जिनसे इस देश के मुसलमानों का फायदा हुआ है, विशेष रूप से भारतीय मूल के मुसलमानों का जिन्हे अब देशज पसमांदा कहा जाने लगा है। फिर चाहे वह कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 की समाप्ति हो, तीन तलाक पर प्रतिबंध हो या फिर मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय की बात हो।

अब अगर मोदी सरकार द्वारा समान नागरिक संहिता पर राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ते हुए इसे लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया जाता है तो व्यापक रूप से यह मुस्लिम हित में ही होगा। विरोध वही करेंगे जिन्हें मुस्लिम लीग सेकुलर पार्टी लगती है, वरना बहुसंख्यक देशज पसमांदा मुस्लिम ने जैसे मोदी के अब तक के फैसलों का स्वागत किया है, समान नागरिक संहिता का भी स्वागत ही करेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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