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Muslim Castes: मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय के सवाल पर पर्दा डालने का प्रयास

Muslim Castes: बिहार सरकार द्वारा जाति आधारित जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक करने के साथ ही हिन्दू समाज में सामाजिक न्याय का मुद्दा एक बार पुनः राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में आ गया है। मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय के मुद्दे की पहले की तरह ही उपेक्षा जारी है, जबकि इस जाति जनगणना में मुस्लिम समाज की जातियों की भी गिनती हुई है। मुख्यधारा की मीडिया द्वारा इसे नजरंदाज कर केवल हिन्दू जातियों की भागीदारी की बात हो रही है।

एक ओर जहां हिन्दू समाज में जातिवार नाम के साथ उनकी संख्या और उसका प्रतिशत बताया जा रहा है तो वहीं उसी लिस्ट में मुस्लिम समाज की जातिवार नाम की संख्या बताने के बजाय पूरे मुस्लिम समाज की समग्र संख्या को बताया जा रहा है। एक ओर हिन्दू समाज में जातिगत पहचान के आधार पर बात की जा रही है तो दूसरी ओर धार्मिक पहचान को आगे कर मुस्लिम समाज के जातिगत विभाजन पर पर्दा डालने का प्रयास किया जा रहा है।

Muslim Castes: An attempt to cover up the question of social justice in Muslim society

बिहार राज्य की जाति अधारित गणना की रिपोर्ट में बहुत सी मुस्लिम जातियों की संख्या और उनका प्रतिशत स्पष्ट रूप से अंकित किया गया है और बहुत सी ऐसी जातियां (नाई, हलवाई, माली, मल्लाह, बंजारा, बढ़ई आदि) भी हैं जिनमें हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्मों के लोग सम्मिलित हैं। कलाल/एराकी को बनिया के अंतर्गत डाला गया है जबकि इनका गणना कोड 122 था अर्थात इनकी अलग से गणना हुई है। रिपोर्ट में प्रकाशित मुस्लिम जातियों के नामवार संख्या प्रतिशत में निम्नलिखित हैं।

सैय्यद 0.22%, शेख 3.8%, मालिक 0.08%, पठान 0.75%, बुनकर 3.5%, धुनिया 1.4%, कुजड़ा 1.39%, नाई 1.56% ठकुराई 0.11%, दर्जी 0.25% शेरशाहबादी 0.99%, धोबी 0.31% सुर्जापुरी 1.87% कुल्हैया 0.95% सेखड़ा 0.19%, चुड़िहार 0.15%, कसाई 0.10%, चिक 0.038%, साईं 0.50%, डफाली 0.056%, गद्दी 0.044%, हलालखोर(मेहतर) 0.055%, मिरासी 0.011, मुकेरी 0.04%, मीरशिकार 0.051%, सिकलगर 0.014%, रंगरेज 0.033%, मदारी 0.008% मडरिया 0.06% कलंदर 0.0060% गधेड़ी 0.0072% भांट 0.068% भटियारा 0.020% भक्को 0.028% पमअरिया 0.049% नालबंद 0.009% नट 0.047% जट 0.034% गुलगुलिया 0.0013% कागजी 0.0018% संतराश 0.0002% नामशुद्र 0.023%।

कुछ जातियां जिनमें हिन्दू मुसलमान दोनों होते हैं उनकी संयुक्त संख्या दर्ज है जो इस प्रकार हैं। नाई 1.59%, हलवाई 0.60%, माली 0.26%, मल्लाह 2.6% बंजारा 0.006% बढ़ई 1.45% तेली 2.8% कहार 1.64% कुम्हार 1.40% कंजर 0.0057%
किन्नर/हिजड़ा (यह लिंग के आधार पर है न कि जाति के आधार पर), 0.0006% लोहार 0.62% और जोगी 0.0131%।

उपर्युक्त संख्या के आधार पर यह स्पष्ट है कि कुल बिहार की जनसंख्या का लगभग 12.85% देशज पसमांदा मुस्लिम है और लगभग 4.85% अशराफ हैं। अगर केवल मुस्लिम समाज की बात किया जाय तो कुल मुस्लिम आबादी का लगभग 72.59% देशज पसमांदा एवं कुल मुस्लिम आबादी का 27.40% अशराफ हैं।

यहां अशराफ में मलिक जाति को भी जोड़ा गया है जिन्हें फिलहाल पिछड़ा वर्ग में रखा गया है जबकि ये लोग अपने को सर्वश्रेष्ठ सैय्यद होने का दावा करते हैं। (देखें प्रो० मसूद आलम फलाही द्वारा लिखित पुस्तक "जात पात और इस्लाम-मलिक बिरादरी की नस्बी तारीख का तज्जिया")

वरिष्ठ पसमांदा कार्यकर्ता डा० नूर हसन आजाद बताते हैं कि 'मलिक लोगो ने अपने को तेली जाति का बताकर पिछड़ा वर्ग में जगह बना ली है जिसके विरुद्ध उन्होंने हेशामुद्दीन अंसारी, प्रो० किशन दास और प्रो० अब्बास रंगरेज के साथ संयुक्त रूप से पिछड़ा वर्ग आयोग में प्रार्थना पत्र दिया था। जस्टिस धर्मपाल सिंह के नेतृत्व में पिछड़ा वर्ग आयोग ने अपनी ही अनुसंशा के विरुद्ध मलिक जाति को पिछड़ा वर्ग से बाहर करने की सिफारिश सरकार को भेजी है लेकिन अभी तक सरकार ने उस पर अपनी मुहर नहीं लगाई है।'

जहां तक शेख जाति की संख्या अधिक होने की बात है तो उसके पीछे का कारण स्पष्ट करते हुए दलित मुस्लिम समाज के संयोजक वरिष्ठ पसमांदा कार्यकर्ता डा० अय्यूब राईन बताते हैं कि 'बहुत सी दलित पसमांदा मुस्लिम जातियां स्वयं को शेख बताती रहीं हैं। संभव है कि जाति जनगणना में उन लोगो ने खुद को शेख के अंतर्गत दर्ज कराया हो।'

कुछ ऐसी ही बात "हिन्दुस्तान में जात पात और मुसलमान" के लेखक और भाषा विश्वविद्यालय लखनऊ में अरबी विभाग के प्रमुख प्रो० मसूद आलम फलाही ने लिखा था कि 'मुस्लिम धोबी पर अपने रिसर्च के दौरान सर्वे में उन्होंने पाया कि बहुत से धोबी जाति के लोगो ने खुद को शेख में परिवर्तित कर लिया है।' बिहार के पसमांदा कार्यकर्ताओं का यह भी दावा है कि बहुत सी पसमांदा मुस्लिम जातियों का कोई भी गणना कोड नहीं दिया गया था जिस कारण उनकी गणना ही नहीं हो पाई।

बहरहाल इस सर्वे के प्रकाश में आने के बात मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय की बहस रोकने के लिए कुछ सांप्रदायिक लोगों द्वारा धार्मिक आधार पर सभी मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग पुनः उठाकर समाज को मजहब के नाम पर भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि बिहार राज्य में पहले से ही मुस्लिमों की वंचित एवं आरक्षण के लिए योग्य पसमांदा जातियों को पिछड़ा और अति पिछड़ा कैटेगरी में समाहित किया जा चुका है।

आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के आरक्षण को लागू कर देने के बाद से शासक वर्गीय अशराफ वर्ग भी आरक्षण के दायरे में आ गया है। जब सभी प्रकार के मुस्लिम वर्ग आरक्षण की परिधि में आ गये हैं तो फिर मुस्लिम नाम पर आरक्षण की मांग का क्या औचित्य है? इसके पीछे की साफ मंशा तो वोटों के लिए मुस्लिम साम्प्रदायिकता को हवा देने के अलावा कुछ हो नहीं सकता।

मुस्लिम सांप्रदायिकता की राजनीति करनेवाले मुस्लिम समाज की वंचित जातियों (देशज पसमांदा) की भागीदारी की बात नहीं करते। इसके उलट मुस्लिम उप मुख्यमंत्री की साम्प्रदायिक मांग की जा रही है। यह न सिर्फ अनैतिक एवं असंवैधानिक है बल्कि वंचित मुस्लिम जातियों (देशज पसमांदा) की राजनैतिक भागीदारी की मांग को इस्लाम और मुसलमान नाम पर खारिज करने वाली है। इसके पीछे शासक वर्गीय अशराफ वर्ग की राजनैतिक पकड़ को और मजबूत बनाकर मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय को अप्रभावी करने का कुटिल प्रयास ही जान पड़ता है।

जब तक मुस्लिम समाज में भी सामाजिक न्याय की स्थापना को सुनिश्चित नहीं किया जाता तब तक न तो सामाजिक न्याय का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है और ना ही इस देश से मुस्लिम साम्प्रदायिकता को खत्म किया जा सकता है, जो कि हिन्दू साम्प्रदायिकता की जननी है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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