MP Elections: नेताओं के बड़े बोल और मतदाताओं की चुप्पी
MP Elections: एक दशक से भाजपा हर छोटा-बड़ा चुनाव जिस उत्सवधर्मिता से लड़ती दिखती है, कांग्रेस उसके पासंग भी नहीं है। यही कारण है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व एकजुटता से चुनावों में सक्रिय हो जाता है जबकि कांग्रेस में प्रादेशिक स्तर पर "कपड़ा फाड़" प्रतियोगिता चलाने लगती है तथा आलाकमान "देखो और इंतजार करो" की स्थिति धारण कर लेता है।
कई पुराने दिग्गज भाजपाई जो पार्टी से बगावत कर चुके हैं उन्हें पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है। ऐसे 36 भाजपायी अब "पूर्व" होकर या तो निर्दलीय चुनावी मैदान में हैं अथवा पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के विरूद्ध जनमानस बनाने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं कांग्रेस ने 39 ऐसे साथियों को "हाथ" से झटक दिया है जो बागी हुए हैं। अंतर मात्र इतना है कि भाजपा के बागी 5 से 7 सीटों पर पार्टी की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं जबकि कांग्रेस में इनकी संख्या 10-12 से अधिक हो गई है।

दिलचस्प यह है कि भाजपा के बागी को कांग्रेस पसंद कर रही है और कांग्रेस के बागी भाजपा के दुलारे बने बैठे हैं गोयाकि बागियों की दसों उंगलियाँ घी में और सर कढ़ाई में है। हालांकि दोनों ही दलों के समक्ष एक यक्ष प्रश्न है कि क्षेत्र की एंटी-इनकंबेंसी को कैसे संभला जाए? कांग्रेस भी इस समस्या से दो-चार हो रही है क्योंकि ऐसी 30 विधानसभा सीटें हैं जहां "हाथ" को जनता का साथ दशकों से मिल रहा है। यहां एंटी-इनकंबेंसी का चेहरा "दूसरा" है।
मतदाता की चुप्पी, दोनों दलों पर भारी
मध्य प्रदेश में इन दिनों एक प्रश्न हर किसी की जुबान पर है कि किसकी सरकार बन रही है? किसे कितनी सीटें मिलेंगी? कौन जीत रहा है? अमूमन आम आदमी इसका उत्तर "कांटे की टक्कर है" में दे रहा है जबकि राजनीतिक दल के कार्यकर्ता निश्चित तौर पर अपने दल की सरकार बनवा रहे हैं। हालांकि अंदरूनी तौर पर देखें तो कमोबेश हर प्रत्याशी की सांसें फूली हुई हैं क्योंकि इस बार मतदाता चुप है और 2018 में जब मतदाता ने चुप्पी साधी थी तो "शिव का राज" जाता रहा था। इस बार की चुप्पी पिछली बार की तुलना में अधिक रहस्यमयी है क्योंकि कोई भी खुलकर अपनी राय नहीं रख रहा।
मतदाता जितनी आत्मीयता से भाजपा प्रत्याशी का स्वागत कर रहा है उतने ही प्रेम से कांग्रेस प्रत्याशी को भी सम्मान दे रहा है। दोनों ही दलों के घोषणा-पत्र भी अमूमन समान ही हैं जिसके कारण चुप्पी बढ़ी है। ऐसे में प्रत्याशी का स्थानीय प्रभाव, मतदाताओं में उसकी पकड़, उसकी उपलब्धता जैसे फ़ैक्टर अहम हो गए हैं। चेहरे का प्रश्न बड़ा हो गया है और भाजपा का कार्यकर्ता केंद्रित चुनाव लड़ना उसके लिए कहीं न कहीं पेशानी का सबब बनता जा रहा है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी गारंटी मतदाताओं को दे रहे हैं। वे हर उस विधानसभा क्षेत्र में जा रहे हैं जहां भाजपा प्रत्याशी की स्थिति कमजोर है।
कांग्रेस भी मतदाता की चुप्पी से परेशान है क्योंकि कई सीटों पर जहां वह दशकों से काबिज है, मतदाता मूक दर्शक बना हुआ है। इस बार का मप्र विधानसभा चुनाव ऐतिहासिक है क्योंकि तमाम चुनाव पूर्व सर्वे किसी के पक्ष में नहीं हैं। अलबत्ता सभी ने 50-60 सीटें ऐसी अवश्य बताई हैं जहां जीत-हार का अंतर 5000 से कम रहने वाला है। ऐसी स्थिति 2013 में 43 तथा 2018 में 46 सीटों पर बनी थी और तब भी मतदाता मौन था। 2018 में 10 सीटें तो ऐसी थीं जहां जीत-हार का अंतर 1000 वोट का था। वर्तमान में लगभग एक चौथाई विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां कांटे की टक्कर है और यहां मतदाता का मौन दोनों प्रमुख दलों पर भारी पड़ रहा है।
भाजपा की दुखती रग
कांग्रेस का हर छोटा-बड़ा नेता अपनी सभा और रैलियों में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के दावेदार का नाम पूछकर भाजपा की दुखती रग पर हाथ रख रहा है और पार्टी है कि इस मामले में भ्रम की स्थिति बनाए हुए है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जिस अंदाज में तूफानी तेजी से सभा और रैलियां कर रहे हैं, यह संकेत देता है कि यदि भाजपा जीती तो केंद्रीय नेतृत्व का उन्हें नकारना जनता हजम नहीं करेगी और 2014 के लोकसभा चुनाव में इसका असर केंद्र के लिए सुखद नहीं होगा। किंतु जब-जब भाजपा सामूहिक नेतृत्व और कार्यकर्ता केंद्रित चुनाव लड़ने की अपनी बात पर आगे बढ़ती है, कांग्रेस का "मुख्यमंत्री कौन" का प्रश्न उसे कई कदम पीछे धकेल देता है।
गृहमंत्री अमित शाह ने चंचौड़ा-राजगढ़ की सभा में "चेहरे" के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया तथा शिवराज सिंह चौहान का नाम तो लिया किंतु इससे बड़े भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है। नरेंद्र सिंह तोमर पहले ही दिमनी विधानसभा में चतुकोणीय मुक़ाबले में घिरे हैं और अब उनके बड़े बेटे देवेंद्र प्रताप सिंह तोमर उर्फ रामू भैया के करोड़ों के लेनदेन के कथित दो वीडियो वायरल होने से मामला उलझ गया है। जो भाजपा नेता छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठा रहे थे, वे मप्र में बचाव की भूमिका में आ गए हैं।
ज्योतिरादित्य सिंधिया विधानसभा चुनाव में उतरे नहीं हैं, फिर अमित शाह को उनका नाम लेने की आवश्यकता क्यों पड़ी, यह बड़ा प्रश्न है। दिग्विजय सिंह के गढ़ में सिंधिया का नाम लेकर क्या अमित शाह एक तीर से कई निशान साध रहे हैं? क्या वे राजा के सामने महाराजा को एक बार पुनः खड़ा करना चाहते हैं? क्या हिमंत विस्वा शर्मा के बाद भाजपा दूसरे मूल कांग्रेसी को मुख्यमंत्री बनाने का मन बना रही है? क्या शाह सिंधिया की राजनीतिक ताकत आंकना चाहते हैं? जनता और राजनीतिक विश्लेषक इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढने का प्रयास करेंगे किंतु "चेहरे" का प्रश्न क़यासों के चलते भाजपा कार्यकर्ता में भी भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रहा है। इतने पर भी भाजपा नेतृत्व मतदाताओं को भरोसा दे रहा है कि अंत भला तो सब भला।
कांग्रेस का संकल्प विकल्प
कांग्रेस जनता को अपने संकल्प पत्र के वादों की याद दिलाते हुए उसे सुनहरे भविष्य के सपने दिखा रही है किंतु सच यह है कि वह स्वयं भाजपा की 18 वर्षों की सरकार के विरूद्ध चल रही एंटी-इनकंबेंसी पर अधिक निर्भर है। प्रदेश में जमीन पर न के बराबर संघर्ष करने वाली देश की सबसे पुरानी पार्टी कमलनाथ युग में सोशल मीडिया के माध्यम से चुनाव लड़ने जा रही है और उसने भाजपा को यहां कड़ी टक्कर देते हुए अपना वर्चस्व दिखाया है।
वैसे भी इस बार का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए साख का विषय है क्योंकि 2018 में जीत के बाद भी कांग्रेस को डेढ़ साल के अंदर ही सत्ता गंवानी पड़ी थी। लिहाजा इस बार कमलनाथ फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं और 101 वादों के साथ जनता के समक्ष जा रहे हैं।
इसके अलावा जीत के बाद 2018 जैसी बगावत न हो, इसके लिए अधिकांश टिकट उन्होंने अपनों को दिए हैं। युवा वर्ग को साधने के साथ ही वे नेतृत्व के स्तर पर स्वयं को प्रोजेक्ट कर रहे हैं। हालांकि उनकी राह में दिग्विजय सिंह चुनौती बनकर उभरे हैं। बेटों को स्थापित करने की जद्दोजहद में कांग्रेस का कितना नुकसान होगा, यह देखना दिलचस्प होगा। फ़िलहाल तो प्रदेश का मतदाता मोदी की गारंटी, भाजपा का भरोसा और कांग्रेस के संकल्प के बीच बेहतर चुनने की मंशा से सभी विकल्पों को मौन रहकर तौल रहा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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