MP Assembly Elections: मध्य प्रदेश की ‘तीसरी ताकत’ में कितनी ताकत?

MP Assembly Elections: मध्य प्रदेश की 185 किमी लंबी सीमा उत्तर प्रदेश से लगती है जिसमें ग्वालियर-चंबल संभाग के मुरैना, भिंड, दतिया, शिवपुरी, अशोक नगर, बुंदेलखंड संभाग के सागर, टीकमगढ़, निवाड़ी, छतरपुर तथा विंध्य संभाग के पन्ना, सतना, रीवा, सीधी और सिंगरौली जिले आते हैं। चूंकि इन सभी जिलों की भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक पृष्ठभूमि उत्तर प्रदेश की संस्कृति से मेल खाती है अतः यहां राजनीतिक रूप से भी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को खाद-पानी मिलता रहा है।

इन 14 जिलों की 67 विधानसभा सीटों में से कई पर सपा-बसपा ने जीत दर्ज की है। इसके अलावा मध्य प्रदेश में जेडीयू, एनसीपी, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, राष्ट्रीय समानता दल आदि ने भी विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया किंतु कोई भी दल अपनी छाप नहीं छोड़ पाया। किंतु 2013 के विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा से इतर आम आदमी पार्टी 'आप' की एंट्री से एक बार फिर क्षेत्रीय दलों और उनके प्रभाव तथा तीसरी ताकत बनने की संभावनाओं पर बहस छिड़ गई है।

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हालांकि एक समय बसपा प्रदेश में तीसरी ताकत बनती नजर भी आ रही थी किंतु मायावती पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से प्रदेशवासियों ने 'हाथी' की सवारी करने से इंकार कर दिया जबकि सपा के साथ गुंडागर्दी और 'यादवराज' का दाग चिपका रहा। अब जबकि आप ने राज्य में भ्रष्टाचार, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ने की घोषणा की है और 230 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशियों का चयन किया जा रहा है, हमें पिछले पांच चुनावों में 'तीसरी ताकत' बनने को आतुर सपा-बसपा के प्रदर्शन पर भी ध्यान देना होगा।

पिछले 5 विधानसभा चुनावों में सपा-बसपा का प्रदर्शन

अविभाजित मध्य प्रदेश में 1998 में 330 विधानसभा सीटों पर चुनाव हुए थे जिनमें से सपा ने 94 सीटों पर अधिकृत प्रत्याशी उतारे किंतु विधानसभा की ओर मात्र 4 प्रत्याशियों की साइकिल ही मुड़ पाई। 84 सपा प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई, शेष 6 प्रत्याशी तीसरे-चौथे स्थान पर रहे। 2000 में मध्य प्रदेश से टूटकर बने छत्तीसगढ़ के चलते प्रदेश में 230 विधानसभाएं बचीं और 2003 के विधानसभा चुनाव में 161 विधानसभा सीटों पर साइकिल चली किंतु चुनाव परिणाम में मात्र 7 प्रत्याशी ही इसकी सवारी कर पाए। शेष सभी चुनावी रण में खेत रहे।

2008 के विधानसभा चुनाव को संभवतः कोई भी समाजवादी याद नहीं करना चाहेगा क्योंकि सपा के 187 अधिकृत प्रत्याशियों में से 183 की जमानत जब्त हो गई थी और निवाड़ी विधानसभा से मीरा यादव ही चुनाव जीत सकी थीं, वह भी तब जब उनके साथ उनके पति पूर्व विधायक और बाहुबली दीप नारायण सिंह यादव मजबूती से खड़े रहे थे। निवाड़ी टीकमगढ़ जिले में आता था जिसकी सीमा उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले से लगती है। 01 अक्तूबर, 2018 को निवाड़ी स्वतंत्र जिला बना दिया गया।

2013 का विधानसभा चुनाव भी सपा के लिए दु:स्वप्न रहा जबकि उसके 164 अधिकृत प्रत्याशियों में से 161 की जमानत जब्त हुई और पार्टी का खाता भी नहीं खुला। वहीं 2018 में सपा का मात्र 1 विधायक जीतकर विधानसभा में पहुंचा। वोट प्रतिशत के आधार पर देखें तो मध्य प्रदेश निर्वाचन आयोग के अनुसार, सपा को 1998 में 4.83 प्रतिशत, 2003 में 5.26 प्रतिशत, 2008 में 2.46 प्रतिशत, 2013 में 1.70 प्रतिशत और 2018 में 1.30 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे।

इसी प्रकार बसपा ने 1998 के विधानसभा चुनाव में 330 सीटों पर 221 प्रत्याशी उतारे जिनमें से 11 जीतने में सफल रहे। इस चुनाव में बसपा का वोट प्रतिशत 6.15 प्रतिशत रहा। 2003 विधानसभा चुनाव में बसपा को 7.26 प्रतिशत वोट मिले और उसके 2 प्रत्याशी विधानसभा पहुंचे। 2008 में बसपा ने 228 विधानसभा सीटों पर अधिकृत प्रत्याशी उतारे जिनमें से 7 प्रत्याशी जीतने में सफल रहे और पार्टी को 8.97 प्रतिशत वोट मिले। 2018 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 230 में से 227 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे और मात्र 2 सीटों पर जीत हासिल की। 202 सीटों पर पार्टी की जमानत जब्त हो गई।

हालांकि इस चुनाव में 5.1 प्रतिशत वोट शेयर पाकर बसपा मप्र में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी। प्रदेश की 65 सीटों पर बसपा का वोट बैंक 10 प्रतिशत तक रहा है। हालांकि सपा-बसपा के साथ प्रदेश में सबसे बड़ी समस्या उनके विधायकों की प्रतिबद्धता रही है क्योंकि अधिकांश ने जीत के बाद या तो भाजपा की सदस्यता ले ली अथवा 'हाथ' का साथ निभाने चल पड़े। जो बचे वे अपनी राजनीतिक जमीन नहीं बचा पाए क्योंकि उनके पास न तो नेतृत्व था और न ही जमीनी कार्यकर्ता। ऐसे में प्रदेश में तीसरी ताकत के लिए हमेशा मैदान साफ ही रहा है।

विंध्य के रास्ते हृदय प्रदेश में छाने को आतुर 'आप'

विंध्य क्षेत्र में विधानसभा की 30 सीटें हैं जिनमें से वर्तमान में 24 सीटें भाजपा के खाते में हैं और यह क्षेत्र कमल दल का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है किंतु 2022 में हुए नगरीय निकाय चुनाव में आप की रानी अग्रवाल सिंगरौली की महापौर बनीं जिन्होंने विंध्य क्षेत्र में सपा-बसपा की तीसरी ताकत बनने के स्वप्न पर झाड़ू फेर दी। यह प्रदेश के इतिहास में पहला अवसर था जब कोई महापौर भाजपा-कांग्रेस से इतर किसी अन्य राजनीतिक दल का चुना गया।

इसके अलावा आप ने निकाय चुनाव में प्रदेश भर के निकायों में 6-7 प्रतिशत वोट प्राप्त किए। प्रदेश में 40 से अधिक आप पार्षद प्रत्याशियों ने जीत का परचम लहराया और 86 से ज्यादा प्रत्याशियों ने दूसरा स्थान हासिल किया। नगरीय निकाय के इतर आप ने ग्रामीण क्षेत्र में भी अपना परचम लहराया। आप समर्थित उम्मीदवारों में ग्रामीण क्षेत्रों में 10 से अधिक जिला पंचायत सदस्य, 20 से अधिक जनपद सदस्य, 100 से अधिक सरपंच तथा 200 से अधिक पंच निर्वाचित हुए। ऐसे में आप के नेता और कार्यकर्ता पूरे दमखम से विधानसभा चुनाव में उतरने को आतुर हैं।

आप की प्रदेश में संभावनाएं इसलिए भी नजर आ रही हैं क्योंकि पार्टी को भाजपा और कांग्रेस के ऐसे मजबूत चेहरों का साथ मिला जिन्हें दोनों दलों ने टिकट से वंचित कर दिया। पिछले छह महीनों में आप ने कांग्रेस और भाजपा के कई क्षुब्ध नेताओं को पार्टी की सदस्यता दी है और उन्हें विधानसभा चुनाव में भी उतारा जा रहा है। चांचौड़ा से पूर्व भाजपा विधायक ममता मीणा ऐसा ही एक क्षुब्ध चेहरा हैं।

हालांकि ये तो चुनावी नतीजे ही बताएंगे कि आप प्रदेश के मतदाताओं में कितना प्रभाव छोड़ेगी किंतु इस बार आप की मौजूदगी ने भाजपा और कांग्रेस के बरक्स तीसरी ताकत बनने की ओर कदम तो बढ़ा ही दिए हैं। जो मैदान सपा-बसपा के कारण खाली पड़ा हुआ है, उसी को पाटने का काम आप करने की मंशा पाले हुए है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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