Maya Gang Delhi: उम्र जीने की, शौक मरने का!

Maya Gang Delhi: 29 अगस्त की रात दिल्ली के भजनपुरा इलाके में अमेजन के मैनेजर हरप्रीत की हत्या ने दिल्ली में सनसनी फैला दी है। हरप्रीत के साथ उनके मामा को भी गोली मारी गई जो गंभीर अवस्था में हॉस्पिटल में भर्ती हैं। मृतक के घरवालों के हिसाब से कहीं कोई दुश्मनी नहीं थी और वो हत्या के पीछे के वजहों को लेकर स्पष्ट नहीं हैं। इस हत्याकांड के पीछे पुलिस जांच में सामने आये 'माया गैंग' के नाम ने सबको चौंका दिया। इस गैंग का बॉस माया उर्फ़ मोहम्मद समीर है तथा उसके साथी मल्लू समेत 5 लोग हत्या में शामिल बताये जा रहे हैं।

फिल्मी स्टाइल में गठित इस माया गैंग के बारे में पुलिस का कहना है कि रोड रेज़ की सामान्य घटना को हत्या तक पहुंचाने के पीछे का मकसद अपराध की दुनिया में "नाम कमाना" था। पाप की दुनिया में नाम बनाने की बात सुनने में ही हास्यास्पद लग रही पर इसकी गंभीरता का विश्लेषण इसी बात पर किया जा सकता है कि अपराध को नाम, पैसा, रुतबा, पद, खौफ़ और दिखावे की "चौधराहट" के लिए अपना लेना समाज के एक वर्ग में कितने महत्व का हो गया है।

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मीडिया में आई खबरों के मुताबिक कुछ साल पहले मो. समीर ने केबल टीवी पर फिल्म 'शूटआउट एट लोखंडवाला' देखी। वह फिल्म में विवेक ओबेरॉय द्वारा निभाए गए 'माया' के किरदार से इतना प्रभावित हुआ कि समीर ने अपने ग्रुप का नाम ही 'माया गैंग' रख दिया और खुद को 'माया भाई' कहने लगा। उसने अपनी इंस्टाग्राम आईडी भी बदलकर 'king_maya_302' कर दी, जिसके आखिरी अंक हत्या की आईपीसी धारा का जिक्र करते थे।

पुलिस के अनुसार 5 लोग गैंग का हिस्सा हैं और सब 21 साल से कम उम्र के हैं। भजनपुरा जैसे इलाके जहाँ इरफान छेनू, नासिर और हाशिम बाबा जैसे शहर के गैंगस्टरों ने एक दशक से अधिक समय से किसी भी गिरोह को पनपने नहीं दिया, वहाँ "माया गैंग" के कारनामों ने इन गैंग्स को भी हिला कर रख दिया है।

कम उम्र में हत्या जैसे अपराध के प्रति आकर्षण प्रशासन से ज्यादा समाज के लिए चुनौती है। हाल में हुए अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी और संजीव जीवा की सरेआम हत्या ने भी कम उम्र में माफ़िया सरगना बनने की युवाओं की बलवती इच्छा और कदाचारी मंशा को दिखाया हैं। इन सभी हत्याओं में कम उम्र के युवा शामिल हैं जिन्होंने बेखौफ होकर घटनाओं को अंजाम दिया। ऐसे में 18-25 उम्र के युवाओं में अपराध की दुनिया में एंट्री के पीछे की कहानी को गहराई से समझना होगा।

2022 के NCRB की रिपोर्ट को देखें तो भारत में किशोर अपराध दर 7% है जो युवा वर्ग के एक बड़े तबके को भविष्य में जघन्य अपराधों में लिप्त होने की ओर संकेत देती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर चिंता व्यक्त की है। माया गैंग जैसे माफियाओं के पैदा होने के कारण भी कम उम्र में अपराध से नाम पैसा और शोहरत कमाने की मंशा है।

इसी मामले को देखें तो माया नाम से खुद को "कुख्यात" करने की कोशिश में लगे मोहम्मद समीर ने अपराध की शुरुआत कम उम्र में ही कर दी थी। उसका साथी मल्लू जो 29 तारीख को 18 साल का हुआ था उसने बालिग होते ही हत्या को अंज़ाम दे दिया। पुलिस की माने तो पांचों अपराधी कम उम्र के युवा हैं और ये पिछले दो साल में हुई 4-5 हत्याओं में शामिल रहे हैं।

कम उम्र में "फेमस" होने की चाह और मंजिल को पा लेने की जुनून व जिद्द कब फितूर और सनक बन जाती है, ये समझना जरूरी है। सोशल मीडिया की दीवानगी किशोरों और कम उम्र के युवाओं पर खूब असरकारी है। मसाला फिल्में और मनोरंजन के अन्य माध्यम भी इस सोच को बढ़ावा देते हैं। मोहम्मद समीर के सोशल मीडिया एकाउंट पर "गन कल्चर" को बढ़ावा देते फोटो और वीडियो की भरमार है। बेखौफ होने का आलम देखिये कि उसने पुलिस के एक छापे के दौरान अपने घर की ओर जाने वाली सीढ़ी पर सशस्त्र पुलिस के घुसने के सीसीटीवी फुटेज की एक पोस्ट 'पिन' की हुई है।

एक अन्य पोस्ट में उसे पिस्तौल पकड़े हुए दिखाया गया है, और उसके बिस्तर पर गोलियां और बंदूकें बिखरी हुई हैं। समीर ने हाल ही में माया गैंग बनाया था। उसने अपने इंस्टाग्राम बायो में अपना "नाम - बदनाम", "पता - कब्रिस्तान"," उमर - जीने की, शौक- मरने का", लिख रखा है। जिस उम्र में बच्चे अपने कैरियर के सबसे महत्वपूर्ण और नाजुक पड़ाव पर होते हैं वहाँ ऐसी सोच माता-पिता और पारिवारिक सामाजिक परिवेश को भी कटघरे में खड़ा करती है।

बाइक, चेन स्नैचिंग के प्राइमरी क्लास से अपराध शुरु करनेवाले इन नौजवानों को भू- माफिया, खनन माफिया, नशे का कारोबार और हत्याओं जैसे अपराध की ग्रेजुएशन करने में ज्यादा समय नहीं लगता है। सिद्धू मुसेवाला हत्या का मामला भी इन्हीं बातों की ओर इशारा करता है। मुसेवाला की हत्या की जिम्मेदारी लेने वाला लॉरेंस बिश्नोई जेल में बंद कम उम्र का युवा है जिसका अपना गैंग है। एक्सटॉर्शन, किडनैपिंग, नशे का कारोबार, हत्या, गैंगवार को अंजाम देता इसका गैंग जेल के बाहर चलता है। वह गोल्डी बरार भी नवयुवक ही है जो पैसे के दम पर कनाडा जा बसा है। इस गैंग का भी मकसद समझें तो पॉवर, पैसा और धाक ही है।

दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों के माफियाओं का पैटर्न अगर देखें तो संगठित और असंगठित दोनों तरह के गैंग नज़र आते हैं। दिल्ली जैसे शहर में 16-17 साल के किशोर जब 5-10 लोगों का गैंग बना कर स्थानीय स्तर पर अपराध शुरू करते हैं तो इनके दिमाग में पैसा उतना नहीं रहता जितना यह कि लोग इनसे डरे, इनको दुआ सलाम करें और इनके "धाक" को स्वीकारे। वहीं मुंबई कम उम्र के ऐसे भटके युवाओं को भी एक "संगठित प्लेटफॉर्म" दे देता है क्योंकि मुंबई की धरती लंबे समय से नशा, तस्करी, उगाही, किडनैपिंग जैसे अपराधों में लिप्त रही है। दिल्ली की तरफ प्रभुत्व जमाना अहम है तो मुंबई की ओर पैसा कमाना।

एम्स नई दिल्ली में पूर्व मनोरोग विशेषज्ञ रहे डॉ. राजकुमार कहते हैं कि युवाओं में अब खौफ के जरिए मशहूर होने और पैसे कमाने का ख्वाब उन्हें गैंगस्टर बना रहा है। इस काम में उन्हें शोहरत मिलती है, जिससे वे खुश होते हैं। युवाओं को लगता है कि इस राह पर चलने से लोग उनसे डरेंगे भी और उनकी इज्जत भी करेंगे।

गरीबी, बेरोजगारी, समय की मांग के मुताबिक शिक्षित ना होना, पारिवारिक और परिवेश का माहौल, कम उम्र में पैसा और शोहरत पाने का लालच ही ऐसे गैंग्स की जड़ें हैं। आमतौर पर गरीबी के परिवेश में पैदा होनेवाले ये नौजवान व्हाइट कॉलर जॉब के लायक पढे़ लिखे नहीं होते और मजदूरी या बढ़ई, मैकेनिक, मोबाइल रिपेयरिंग आदि का काम अपनी "शान के खिलाफ" समझते हैं। इसलिए वो अपराध की ओर अपना रुख करते हैं।

ऐसे अपराधियों को पनपने की एक वजह बच्चों पर माँ- बाप की पकड़ती छूट भी है। इलाके के छोटी मोटी वारदातों को पुलिस भी गंभीरता से नहीं लेती जब तक अपराध हत्या, बलात्कार, किडनैपिंग जैसे बड़े नहीं बन जाते। अत: शहरी समाज को अगर गैंग कल्चर से बचाना है तो तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना होगा, परिवार और परिवेश को हिंसा मुक्त करने के लिए कम उम्र के नौजवानों द्वारा किये जाने वाले उन छोटे मोटे अपराधों पर ज्यादा सूक्ष्मता से नजर रखनी होगी जिसे पुलिस जानबूझकर इग्नोर कर देती है। इसके साथ ही सोशल मीडिया के निगेटिव प्रभाव को रोकना होगा तथा सबके लिए कुछ न कुछ आर्थिक अवसर पैदा करना होगा। अगर ऐसा नहीं होता तो हिंसा और अपराध की ये दुनिया घटने की बजाय बढती ही चली जाएगी जिसका शिकार अंतत: शहर का निर्दोष नागरिक ही होगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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