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कई सवालों के भंवर में है 'वन नेशन,वन इलेक्शन'

By सुभाष रानडे, वरिष्ठ पत्रकार
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    नई दिल्ली। भारत चुनावों का देश है। यहां ग्राम पंचायतों से लेकर लोकसभा चुनाव तक पूरे सालभर कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं। लगातार चुनावों का यह सिलसिला रोकने के लिए आजकल 'वन नेशन,वन इलेक्शन' यानि पूरे देश में एक-साथ चुनाव कराने की चर्चा चल रही है। इससे पूर्व देश में 1952 से 1967 तक लोकसभा और विधान सभाओं के चुनाव एकसाथ हुए थे। यह एक संयोग था, क्योंकि भारतीय संविधान में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एकसाथ करने का प्रावधान नहीं है। 1950 में संविधान लागू होने के बाद 1952 में पूरे देश में एकसाथ चुनाव कराए गए थे। राजनीतिक स्थिरता के कारण 1967 तक चार चुनावों में यह सिलसिला कायम रहा।

    कई सवालों के भंवर में है वन नेशन,वन इलेक्शन

    1967 के चुनाव के बाद आठ राज्यों में विविध मोर्चों की मिलीजुली सरकारें स्थापित होने के कारण कांग्रेस के एकछत्र वर्चस्व को चुनौती मिली थी। हालांकि यह सरकारें अल्पजीवी रही। इनमें कुछ गिरी तो कुछ को संविधान के अनुच्छेद 356 का उपयोगकर बर्खास्त कर दिया गया। 1969 में कांग्रेस का विभाजन होने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1972 की बजाय 1971 में ही लोकसभा भंग कर आम चुनाव का ऐलान कर दिया। इसलिए एकसाथ चुनाव का चक्र थम गया और अलग-अलग चुनावों का चक्र शुरू हो गया। जो अभी तक जारी है।

    1999 में केंद्र में भाजपा के नेतृत्व एनडीए की सरकार बनने के बाद लोकसभा और विधानसभाओं के एकसाथ चुनाव की चर्चा शुरू हुई। 2003 में तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि सरकार एकसाथ चुनावों को लेकर गंभीरता से विचार कर रही है। अब फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एकसाथ चुनाव की जरूरत व्यक्त की है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी संसद के समक्ष अभिभाषण में एकसाथ चुनाव पर जोर दिया है। केंद्र सरकार ने विधि आयोग से इस बारे में राय मांगी है। इसलिए फिर इस पर चर्चा शुरू हो गई है। कुछ राजनीतिक पार्टियां इसके पक्ष में हैं जबकि कुछ पार्टियों की राय इसके विरोध में हैं। भाजपा के अलावा अकाली दल, अन्नाद्रमुक, समाजवादी पार्टी, जदयू, बीजू जनता दल और तेलंगाना राष्ट्र समिति इसके पक्ष में हैं जबकि कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, आप, द्रमुक और वामपंथी पार्टियों ने इससे असहमति जताई है। इसके समर्थन और विरोध के पीछे हर एक पार्टी की अपनी- अपनी राजनीति है। वैसे एकसाथ चुनाव का फैसला आसान नहीं हैं। इसके लिए संविधान की कई धाराओं में संशोधन करना पड़ेगा। यह संशोधन आम सहमति के बगैर संभव नहीं है।

    राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और एकसाथ चुनाव करने का समर्थन करने वालों ने अनेक तर्क सामने रखे हैं। कहा जा रहा है कि एकसाथ चुनाव करने से खर्च कम होगा, प्रशासनिक मशीनरी पर तनाव कम होगा और आचार संहिता के कारण विकास में आने वाला अवरोध खत्म होगा। यह कुछ हद तक सही भी है। चुनाव पर होने वाले खर्च में दिनोंदिन वृद्धि हो रही है। 1952 में एकसाथ हुए लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव पर सिर्फ 10 करोड़ 40 लाख रुपए खर्च हुए थे। यह खर्च 2009 के लोकसभा चुनाव में 1,483 करोड़ रुपए तक पहुंच गया तो 2014 के लोकसभा चुनाव में 3,426 करोड़ रूपए खर्च हुए। चुनाव मैदान में राजनीतिक पार्टियों की बढ़ती संख्या, पार्टियों व निर्दलीय प्रत्याशियों की तादाद में निरंतर वृद्धि, मतदाताओं में जागरूकता बढ़ाने के कार्यक्रम और वीवीपैट के उपयोग के कारण खर्च में वृद्धि हुई थी। इसके अतिरिक्त वह खर्च जो राजनितिक पार्टियों और उम्मीदवार प्रचार पर करते हैं, जिसका अनुमान लगाना मुश्किल है। एक अनुमान के अनुसार यदि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एकसाथ कराए जाते हैं तो विधानसभाओं के चुनाव पर किए जाने वाले साढ़े चार हजार करोड़ रुपये का खर्च बचेगा। इसके अलावा चुनाव आयोग का तनाव भी कम होगा, प्रचार की मेहनत भी कम होगी, स्रोत भी बचेंगे और एक ही मतदाता सूची पर चुनाव होंगे। रोजगार के लिए बाहर जाने वाले मतदाताओं का आने-जाने का खर्च भी कम होगा। किसी भी चुनाव के लिए 45 दिन की आचार संहिता लागू होती है। इसलिए एक ही बार में चुनाव होने से बार-बार लगने वाली आचार संहिता के कारण विकास अवरुद्ध नहीं होगा। केंद्र और राज्य सरकारें एकत्रित रूप से नीतियों पर अमल करेंगे। सरकार को पांच वर्ष तक विकास पर ध्यान केंद्रित करने का मौका मिलेगा। मतदान तय समय पर होने के कारण चुनाव कार्यक्रम में लगे अधिकारियों, कर्मचारियों, शिक्षक आदि को अपने रोजमर्रा के काम के लिए ज्यादा समय मिलेगा। चुनावी काम में लगने वाले सुरक्षा बलों को भी मुक्ति मिलेगी।

    एकसाथ चुनाव से असहमति जताने वालों के भी अपने तर्क हैं। उनका कहना है कि एकसाथ चुनाव से चुनाव आयोग पर तनाव बढ़ेगा। भारत जैसे विशाल और भौगोलिक विषमता वाले देश में क्या एकसाथ चुनाव आसान होंगे? क्या हमारे पास इतने संसाधन हैं? 2019 के चुनाव में मतदाताओं की संख्या 90 करोड़ के लगभग होगी। इसके अनुपात में मतदान केंद्रों, उनमें आवश्यक कर्मचारियों, ईवीएम मशीनों और सुरक्षाकर्मियों की तादाद भी बढ़ेगी। क्या इतनी व्यवस्था संभव है? मान लेते हैं कि सरकार इसका भी कोई हल खोज लेगी लेकिन यह सब करते हुए एकसाथ चुनाव के जो नकारात्मक परिणाम होंगे, उन्हें नजरअंदाज करना क्या संभव होगा?

    एकसाथ चुनाव पद्धति उन देशों में लाभदायक हैं जहां दो दलीय व्यवस्था है। लेकिन भारत जैसी बहुदलीय व्यवस्था में इस फैसले की पहली शिकार प्रादेशिक पार्टियां होने की आशंका ज्यादा हैं। यह पद्धति राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों के लिए अधिक लाभदायक होना संभव है। प्रादेशिक पार्टियां कुछ विशेष मुद्दों और प्रादेशिक अस्मिताओं पर आधारित होती हैं। इसलिए प्रादेशिक पार्टियों का गणित अलग होता है, उनके प्रचार के मुद्दे भी अलग होते हैं। अपनी देशव्यापी भूमिका के कारण राष्ट्रीय पार्टियों के मुद्दे इनसे भिन्न है। लोकसभा चुनाव राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर लड़े जाते हैं जबकि विधानसभा चुनाव में प्रादेशिक मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जाता है। एकसाथ चुनाव कराने से राष्ट्रीय मुद्दे केंद्र में होंगे और प्रादेशिक मुद्दे अपने आप पीछे छूट जाएंगे। इसलिए राष्ट्रीय पैमाने पर जिस पार्टी और नेता के पक्ष में वातावरण है उसी पार्टी के पक्ष में मतदान की संभावना अधिक है। राष्ट्रीय पार्टी की तुलना में प्रादेशिक पार्टियों के पास संसाधनों का भी अभाव होगा। राष्ट्रीय पार्टियां जिस ताकत के साथ मैदान में उतरती हैं उतनी ताकत से क्या प्रादेशिक पार्टियां चुनाव लड़ पाएंगी? जाहिर है इसका खामियाजा प्रादेशिक पार्टियों को ही उठाना पड़ेगा। हमारे देश में अशिक्षित मतदाताओं की संख्या भी विराट है। इन मतदाताओं के लिए नई व्यवस्था स्वीकार करना कठिन होगा। एकसाथ चुनाव होने पर मतदाताओं में इस बात को लेकर भ्रम पैदा होगा कि वह लोकसभा और विधानसभा के लिए किसे वोट दें, क्यों यह एक ही वक्त में उन्हें तय करना होगा। यह कई बार देखा गया है कि भारतीय मतदाता एकसाथ चुनाव होने पर एक ही पार्टी को वोट देते हैं। इससे देशभर में फिर एक पार्टी के वर्चस्व होने की संभावना बढ़ जाएगी।

    एक ओर प्रादेशिक पार्टियों के सामने चुनौती और दूसरी ओर एकसाथ मतदान के बारे में स्पष्टता न होने से कई संवैधानिक पेंच भी खड़े होंगे। एकसाथ चुनाव पद्धति से पांच साल में एक बार ही चुनाव होंगे। ऐसी स्थिति में किसी राज्य में त्रिशंकु परिस्थिति पैदा हुई तो क्या होगा? वहां दोबारा चुनाव होगा या राष्ट्रपति शासन लागू होगा? किसी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव मंजूर हुआ तो क्या होगा? किसी निर्वाचन क्षेत्र में, किसी भी वजह कोई स्थान रिक्त हुआ तो वहां उपचुनाव होगा या आगामी पांच साल तक स्थान रिक्त ही रहेगा? अलग-अलग समय पर होने वाले चुनावों के कारण सरकार, नेता, जनप्रतिनिधि मतदाताओं के प्रति थोड़ी-बहुत जवाबदेही महसूस करते हैं, यदि पांच वर्ष तक किसी चुनाव की चिंता से मुक्त हुए तो क्या यह जवाबदेही रहेगी? ऐसे अनेक सवाल हैं । क्या इन सवालों के जवाब खोजे बगैर 'वन नेशन,वन इलेक्शन' पद्धति साकार होगी?

    (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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    English summary
    Many questions loom large on one nation one election in India.

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