Mamata Banerjee: मुस्लिम वोटबैंक की मारी, ममता बनर्जी बेचारी!
कर्नाटक चुनाव के बाद ममता बनर्जी को सबसे ज्यादा डर मुस्लिम वोटबैंक के खिसकने का हो गया है। यही कारण है कि बालासोर ट्रेन दुर्घटना के बाद भी वो गोधरा ट्रेन दुर्घटना का उल्लेख करना नहीं भूलीं।

Mamata Banerjee: उड़ीसा के बालासोर में हुई दुखद ट्रेन दुर्घटना के बाद वहां ममता बनर्जी इसलिए गयी थीं क्योंकि इसमें से एक ट्रेन यशवंतपुर हावड़ा एक्सप्रेस थी। लेकिन वहां पहुंचकर भी वो दुख की ऐसी घड़ी में राजनीतिक बयान देने से अपने आप को नहीं रोक सकीं। उन्होंने गोधरा ट्रेन दुर्घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि जो लोग (भाजपा वाले) इतिहास बदल सकते हैं वो (मरनेवालों) की संख्या भी बदल सकते हैं। गोधरा में एक चलती ट्रेन में आग कैसे लग गयी थी? इतने लोग कैसे मर गये थे? उन्हें माफी मांगनी चाहिए।"
ममता बनर्जी का यह बयान बालासोर ट्रेन दुर्घटना में मारे गये या घायल लोगों के जले पर नमक छिड़कने जैसा था। लेकिन राजनीति में नेता का बयान अपने वोटबैंक को लेकर दिया जाता है। कम से कम मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति करने वाले इस बात को कभी नहीं भूलते। ममता बनर्जी भला यह कैसे भूल जाएंगी? खासकर तब हाल फिलहाल में उन्होंने मुस्लिम वोटबैंक को कांग्रेस की ओर खिसकते देखा हो।
कर्नाटक में कांग्रेस की प्रचंड जीत भाजपा को हराकर हुई लेकिन हवा खराब हो गयी ममता बनर्जी की। इसका कारण था कर्नाटक में कांग्रेस को मिला मुसलमानों का एकतरफा वोट। इसके बाद से ही ममता बनर्जी को इस बात का भय सता रहा है कि कही कांग्रेस बंगाल में उनके मुस्लिम वोट बैक में से कुछ हिस्सा न हड़प ले। हालांकि बंगाल के मुसलमान यह जानते हैं कि सत्ता में काबिज ममता उनके लिए उग्र हिन्दुत्व से सुरक्षा का सबसे बड़ा कवच है। लेकिन बंगाल के मुसलमान इस बात पर भी विचार कर सकते हैं कि विधानसभा चुनाव में तो ममता बनर्जी की पार्टी को वोट दें जबकि आमचुनाव में राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस का चुनाव कर लें।
लोकसभा चुनाव में 9 माह का समय है। ऐसे में कर्नाटक में उभरे मुस्लिम सेंटिमेंटस का कुछ हिस्सा बंगाल में न पहुंच जाए। इसी डर ने ममता बनर्जी को कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के बाद तुरंत यह बयान देने के लिए मजबूर कर दिया कि 'जो पार्टी जिस राज्य में मजबूत है, वहां कांग्रेस को उसे मदद करना चाहिए। ममता यहां तक नहीं रूकी। ममता ने तुरंत अपने मुस्लिम विधायकों और सांसदो की बैठक आहुत कर अपने-अपने क्षेत्र मेे तृणमूल कांग्रेस द्वारा भाजपा को रोकने और मुस्लिम समाज के पक्ष में लिए गए निर्णय को जमीनी स्तर पर बताने के निर्देश दिए हैं। ममता के डर को बढ़ाने में बंगाल भाजपा के अध्यक्ष सुकांत मजूमदार के उस बयान ने भी भूमिका निभाई जिसमें उन्होंने कहा कि 'बंगाल के मुसलमानों को कांग्रेस से टूटकर बनी तृणमूल कांग्रेस के अलावा असली कांग्रेस पर भी विचार करना चाहिए।'
बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत बंगाल की 27.5 फीसद मुस्लिम आबादी (2011 की जनगणना के मुताबिक) है। 2021 में बंगाल की सत्ता में वापसी के बाद से ममता बनर्जी ने अल्पसंख्यक केंद्रित योजनाओं के लिए बजट में भारी-भरकम आवंटन कर यह बताने की कोशिश की है कि अल्पसंख्यकों का तृणमूल से बढ़कर कोई हितैषी नहीं है। सीएए और एनआरसी के खिलाफ आवाज बुलंद कर ममता ने अपने मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के हरसंभव प्रभाव किए हैं।
इधर कांग्रेस के साथ साथ भाजपा भी ममता के मुस्लिम वोट बैक में सेध लगाने का हरसंभव प्रयास कर रही है। भाजपा ने अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए जिन 65 मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्र को टार्गेट किया है उसमें से 13 सीटें बंगाल से हैं। भाजपा इन मुस्लिम क्षेत्रों में मोदी मित्र अभियान और मुस्लिम स्नेह सम्मेलनों के मार्फत मोदी सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के लिए किए गए कामों को पहुंचाने में जुटी है।
भाजपा ने ममता पर लगातार 'हिंदू विरोधी' होने का आरोप लगाकर हिन्दू मतों को अपने ओर मोड़ने में कुछ हद तक सफलता भी पायी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की 42 में से 18 सीटें जीत कर भाजपा राज्य की सबसे प्रमुख विपक्षी पार्टी बन गई। इस चुनाव के तुरंत बाद हुए सीएसडीएस लोकनीति के सर्वे ने बताया कि टीएमसी को हिंदुओं के महज 22 फीसद वोट मिले, जबकि 67 फीसद भाजपा के खाते में गए। ममता बनर्जी इस बात को समझती हैं कि भाजपा के वोट बैक में सेंध लगाना तृणमूल के बस की बात नहीे है, लेकिन भाजपा और कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस के वोट बैंक के कुछ हिस्से में सेंध लगा सकते हैं।
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अब भाजपा की कोशिश ममता को मिले 22 फीसदी हिन्दू मतों मे से पांच प्रतिशत अतिरिक्त हिस्सा अपनी तरफ डायवर्ट करने की है। इसलिए भाजपा लगतार ममता को मुस्लिम चेहरे के रूप में बताने की कोशिश कर रही है। बंगाल भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और सांसद दिलीप घोष ने इस लेख के लेखक से कहा कि ममता के मुस्लिम वोट बैक में सेंध लगाने से आसान हमारे लिए ममता के 22 फीसदी हिन्दू मतों में सेंध लगाना होगा और हम इसी पर ध्यान दे रहे हैं। इसके साथ दिलीप घोष यह भी कहते हैं कि मोदी सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों के लिए किए कामों को देखते हुए बंगाल के राष्ट्रवादी और प्रोग्रेसिव मुसलमान 2024 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा को वोट करेंगे। दिलीप घोष ने यह भी कहा कि बंगाल का मुस्लिम मतदाता जो एक समय कांग्रेस और लेफ्ट पार्टी के साथ था, तृणमूल को छोड़कर वापस कांग्रेस की ओर जा सकता है। ममता बनर्जी इसी बात से परेशान और डरी हुई हैं।
भाजपा सांसद के इस आकलन में कुछ सच्चाई भी नजर आती है। कुछ माह पूर्व 61 फीसद मुस्लिम आबादी वाले मुर्शिदाबाद जिले की सागरदिघी सीट पर उपचुनाव हुआ था। उसमें टीएमसी की हार और वाम समर्थित कांग्रेस प्रत्याशी की जीत हुई थी। उसके बाद मुस्लिम वोटबैंक के कांग्रेस और वाम दलों की ओर खिसकने की आशंकाओं से घिरी ममता तुरंत एक्शन में आ गई। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री पद से गुलाम रब्बानी को हटाकर यह प्रभार खुद मुख्यमंत्री ने अपने पास ले लिया है। मुसलमान तृणमूल का मूल मतदाता बना रहे और साथ में हिन्दू भी ममता को वोट करे इसके लिए ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी 25 अप्रैल से दो महीने की जनसंपर्क यात्रा शुरू कर चुके हैं।
ममता बनर्जी भी अपनी हिन्दू विरोधी छवि को दूर करने का प्रयास करती रही हैं। ममता के चंडी श्लोक का जाप करने और खुद को 'कट्टर ब्राह्मण" पृष्ठभूमि का बताने से लेकर बंगाल में जगन्नाथ और वैष्णो देवी मंदिरों की प्रतिकृतियां बनाने और हुगली के किनारे वाराणसी की गंगा आरती के आयोजन के फैसलों तक तृणमूल कांग्रेस हिंदुओं को रिझाने के भी सारे हथकंडे अपना रही है। जुलाई 2022 में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में जब टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने मां काली के "मासांहारी और मदिरा स्वीकार करने वाली देवी" होने के अपने निजी विश्वास को लेकर एक बेहूदा बात कही, तो टीएमसी ने खुद को मोइत्रा के विचारों से अलग करने में जरा देर नहीं की। एक बयान में उसने कहा, 'महुआ मोइत्रा की कही बात का पार्टी किसी भी रूप से अनुमोदन नहीं करती।"
ममता बनर्जी की सरकार बंगाल में गंगासागर तीर्थस्थल, सागर द्वीप, बंगाल की खाड़ी पर पांच नए मंदिर बना रही है। मंदिरों के निर्माण के लिए 4,000 वर्ग फुट का इलाका तय करके इसे 'बंगाल के मंदिर: एक आध्यात्मिक यात्रा' नाम दिया गया है। यह इलाका कालीघाट, तारापीठ, माल्दा की जहुरा काली, दक्षिणेश्वर और ताड़केश्वर से मिलता-जुलता होगा। ममता भाजपा के आक्रामक प्रचार के बाद दुविधा में है इसलिए मुस्लिम वोट के साथ हिंदू वोट पर भी नजर रख रही हैं।
ममता बनर्जी को 2021 के विधानसभा चुनाव में उम्मीद की किरण नजर आ ही चुकी है जिसमें टीएमसी के हिंदू वोटों में सात फीसद का इजाफा हुआ और भाजपा के हिंदू वोटों में इतनी ही गिरावट आई थी। लेकिन इसके बाद रामनवमी और हनुमान जयंती पर जिस तरह से हिन्दू विरोधी दंगे हुए उसके बाद भी उनकी यह बढ़त जारी रहेगी इसे देखने के लिए थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी। फिलहाल तो वो दो ऐसी नावों पर सवारी करने की कोशिश कर रही हैं जो विपरीत दिशाओं की ओर जा रही हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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