Makar Sankranti: अग्नि और सोम का मिलन बिन्दु है मकर संक्रांति
वैदिक सनातन धर्म में मकर-संक्रांति एक अति महत्त्वपूर्ण धार्मिक कृत्य एवं उत्सव है। सूर्य की गति के संबद्ध यह उत्सव उत्तर और दक्षिण भारत की गणित का मेल है।

ज्योतिष शास्त्र का यह सिद्धांत है कि सूर्य की 12 राशियों में एक संपूर्ण परिक्रमण का काल ही एक संवत्सर होता है। मेष, वृष आदि बारह राशियों के कारण ही पुरातन काल से भारतीय संवत्सर 12 मास का ही होता है, भले उसकी गणना कभी से शुरू होती हो।
मकर संक्रांति इस वैज्ञानिक विवेचना की धुरी है। यह सूर्य की गति को नापने का एक आम आविष्कार है, जिसे भारतीय मनीषियों ने धर्मशास्त्र से जोड़कर आम लोगों तक पहुंचा दिया। आम धारणा है कि इस दिन सूर्य उत्तरायण में आते हैं, जिससे यह सकारात्मकता को बढ़ाने वाले समय की शुरूआत का अवसर है।
ज्योतिषियों का कथन है कि छह महीने से दक्षिणायन में रहे सूर्य का यह उत्तर की ओर बढ़ने का दिन है। ज्यों ज्यों सूर्य उत्तरायण की ओर बढ़ते जाते हैं, ग्रीष्म बढ़ता जाता है। इसे यूं समझा जा सकता है कि ऋग्वेद ने कहा है - 'अग्निषोमात्मकं जगत्' यानी संसार अग्नि और सोम से निर्मित है। मकर संक्रांति अग्नि और सोम का मिलन बिंदु है। छह महीने सोम अर्थात जल बढ़ने के बाद अब मकर संक्रांति अग्नि यानी ग्रीष्म के बढ़ने का ऐलान है।
धर्मशास्त्र ने भारतीय जन-मन का विचार कर इसे दान की सर्वोत्तम महिमा से जोड़ दिया। इस नाते कहा जा सकता है कि मकर संक्रांति ज्योतिष, धर्मशास्त्र और परंपरा का ऐसा त्रिवेणी उत्सव है जो कम से कम विगत दो हजार वर्षों के पहले से भारत में किसी न किसी रूप में मनाया जाता रहा है।
'संक्रांति' का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना। अत: वह राशि जिसमें सूर्य प्रवेश करता है, संक्रांति की संज्ञा से विख्यात है। जब सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है तो मकर-संक्रांति होती है। एक वर्ष में 12 संक्रांतियां होती हैं। वर्ष की प्रत्येक संक्रान्ति पवित्र दिन के रूप में स्वीकार्य है। मत्स्यपुराण ने संक्रांति, ग्रहण, अमावस्या एवं पूर्णिमा पर तीर्थों का स्नान पुण्यदायक माना है।
सभी ग्रहों की संक्रांतियां होती है किन्तु कुछ लेखकों के अनुसार 'संक्रांति' शब्द केवल रवि-संक्रांति के नाम से ही द्योतित है, जैसा कि 'स्मृतिकौस्तुभ' में उल्लिखित है। सूर्य की वर्ष भर की 12 संक्रान्तियां चार श्रेणियों में विभक्त है। पहली हैं, दो अयन संक्रांतियां (मकर में उत्तरायण का आरंभ होता है और कर्क में दक्षिणायन का आरम्भ होता है)। दूसरी हैं, दो विषुव-संक्रांतियां (मेष एवं तुला, जब रात्रि एवं दिन बराबर होते हैं)। तीसरे क्रम पर चार संक्रांतियां हैं, जो षडशीतिमुख (मिथुन, कन्या, धनु एवं मीन) कही जाती हैं। विष्णुपदी (वृषभ, सिंह, वृश्चिक एवं कुंभ) नामक संक्रांतियां चौथी हैं।
बारह संक्रांतियां सात नामों वाली हैं, जो किसी सप्ताह के दिन या किसी विशिष्ट नक्षत्र के सम्मिलन के आधार पर उल्लिखित हैं; ये हैं - मंदा, मंदाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, महोदरी, राक्षसी एवं मिश्रिता। घोरा रविवार को, ध्वांक्षी सोमवार को, महोदरी मंगल को, मंदाकिनी बुध को, मंदा बृहस्पति को, मिश्रिता शुक्र को एवं राक्षसी शनि को होती है।
आजकल मकर-संक्रांति धार्मिक कृत्य की अपेक्षा सामाजिक अधिक है। उपवास नहीं किया जाता है और कदाचित ही कोई पुरखों के लिए श्राद्ध करता है। फिर भी कई लोग समुद्र या प्रयाग या दूसरे जलाशयों पर तीर्थ-स्नान करते हैं। इस दिन तिल का प्रयोग अधिक होता है। शातातप ने तिल की महत्ता प्रदर्शित की है: "जो व्यक्ति संक्रांति पर तिल का प्रयोग छह प्रकार से करता है, वह असफल नहीं होता। ये छह प्रकार हैं - तिल से नहाना, तिल का तैल शरीर पर लगाना, पितरों को तिलयुक्त जल देना, अग्नि में तिलों की आहुति देना, तिलदान करना एवं तिल खाना।"
मकर संक्रांति पर दान का अधिक महत्व है। इस दिन न केवल पुरोहितों को दान किया जाता है बल्कि पुरोहित भी समाज के दूसरे लोगों को दान देते हैं। प्रयागराज में आयोजित होने वाले माघ मेले में संक्रांति के दिन हर मेलावासी स्नान के बाद दान करता है। दक्षिण में इस दिन 'पोंगल' नामक उत्सव होता है। पोंगल तमिल वर्ष का प्रथम दिन है। यह उत्सव तीन दिनों का होता है। 'पोंगल' का अर्थ है - 'यह पकाया जा रहा है'।
खगोलीय गणना के अनुसार 21 दिसंबर को सूर्य उत्तरायण होते हैं फिर भी भारत में वे लोग, जो प्राचीन पद्धतियों के अनुसार रचे पंचांगों का सहारा लेते हैं, उत्तरायण का आरंभ 14 या 15 जनवरी से ही मानते हैं। वे इस प्रकार उपयुक्त मकर संक्रांति से 23 दिन पीछे हैं। यह बात मध्यकाल के धर्मशास्त्र-ग्रंथों में भी उल्लिखित है और तेरहवीं शती के धर्मशास्त्र ग्रंथ हेमाद्रि ने तो यहां तक कहा है कि प्रचलित संक्रांति से पूर्व ही पुण्यकाल शुरू हो जाता है। अत: संक्रांति पर प्रतिपादित कृत्य प्रचलित संक्रांति से 23 दिन पूर्व भी किए जा सकते हैं।
हजारों वर्ष पूर्व ब्राह्मण एवं औपनिषदिक ग्रंथों में उत्तरायण के छह मासों का उल्लेख है। ऋग्वेद (3/33/7) में 'अयन' शब्द आया है, जिसका अर्थ है मार्ग या स्थल। गृह्यसूत्रों में उत्तरायण काल में संस्कार करने की विधि वर्णित है। 'उत्तरायण' बहुत शताब्दियों पूर्व से शुभ काल माना जाता रहा है। अत: मकर संक्रांति, जिससे सूर्य की उत्तरायण गति आरंभ होती है, पुरातन काल से ही पवित्र दिन मानी जाने लगी थी।
आजकल के पंचांगों में मकर-संक्रांति का देवीकरण भी हो गया और वह देवी मान ली गई है। संक्रांति किसी वाहन पर चढ़ती है, उसका प्रमुख वाहन हाथी जैसे पशु हैं। उसके वस्त्र काले, श्वेत या लाल रंग के होते हैं। उसके हाथ में धनुष या शूल रहता है। वह लौह या गोरोचन जैसे पदार्थों का तिलक करती है। वह युवा, प्रौढ या वृद्ध है। संक्रांति के विषय में अग्रसूचनाएं भी ज्योतिष के विभिन्न ग्रंथों में प्राप्त होती है।
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