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Maharashtra Karnataka Border Dispute: फिर खड़ा हुआ कन्नड़भाषी महाराष्ट्रियन बनाम मराठीभाषी कन्नाडिगा का विवाद

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Maharashtra Karnataka Border Dispute: एक अखंडित व संप्रभु देश में दो राज्यों के बीच सीमाओं को लेकर तलवारें खिंची नजर आयें तो यह आश्चर्य और चिंता, दोनों का विषय है। लेकिन, हमारे देश में यह कोई नयी बात नहीं है। असम-मेघालय, असम-मिजोरम, असम-नागालैंड, असम-अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा-हिमाचल प्रदेश, लद्दाख-हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र-कर्नाटक के बीच सीमा विवाद लंबे समय से अस्तित्व में है। इसी हफ्ते, असम और मेघालय की सीमा पर भड़की हिंसा में छह लोगों की मौत और अब महाराष्ट्र-कर्नाटक के बीच तनाव की खबरों ने इस मसले को फिर से चर्चा में ला दिया है।

Maharashtra Karnataka Border Dispute again flares up

दो दिनों से महाराष्ट्र और कर्नाटक की सरकारों के बीच सीमावर्ती इलाकों पर अधिकार को लेकर ठनी हुई है। दोनों राज्य ही एक-दूसरे के क्षेत्र में आने वाले गॉंव-शहरों को लेकर दावों-प्रतिदावों में उलझे हुए हैं। हांलाकि यह विवाद कोई नया नहीं है।

पिछले करीब पचास सालों से अक्सर यह विषय दोनों राज्यों के बीच तनाव का कारण बनता रहा है। लेकिन इस बार, यह इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि वर्तमान में दोनों राज्यों में एक ही दल, भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। इस नाते, उनसे यही अपेक्षा की जा रही थी कि वे आपसी बातचीत के जरिये, इसका कोई रचनात्मक समाधान निकालने का प्रयास करेंगे। बजाय इसके, दोनों राज्यों के नेताओं ने इसे निजी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है।

कन्नाडिगा बनाम मराठी

मौजूदा फसाद की शुरूआत, कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के इस दावे से हुई कि महाराष्ट्र के सांगली जिले के जत तालुका के 40 कन्नड़भाषी गांव, कर्नाटक में शामिल होना चाहते हैं। जवाब में महाराष्ट्र के उप- मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए हुंकार भरी कि वे राज्य का एक भी गांव कर्नाटक में नहीं जाने देंगे। इसी के साथ, उन्होंने कर्नाटक राज्य की उत्तरी सीमा के भीतर मौजूद मराठीभाषी क्षेत्रों, बेलगांव, कारवार और निपाणी को वापस लेने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने की भी बात कही।

दोनों राज्यों के बीच चल रहा यह विवाद साल 1956 में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के समय से ही अस्तित्व में है। उस दौरान महाराष्ट्र के कुछ नेताओं ने मराठी भाषी बेलगावी सिटी, खानापुर, निप्पानी, नांदगाड और कारवार को महाराष्ट्र में शामिल किये जाने की मांग की थी।

इस मांग पर विचार करने के लिए केंद्र सरकार ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश मेहर चंद महाजन की अध्यक्षता में एक आयोग के गठन का फ़ैसला लिया था।
कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री के इस पर सहमत हो जाने के बाद, राज्य में विवाद शुरू हो गया। जब आयोग की रिपोर्ट आयी तो उसमें महाराष्ट्र के कुछ इलाके कर्नाटक को और कर्नाटक के कुछ इलाके महाराष्ट्र को सौंपने की बात कही गयी थी।

लेकिन, इससे दोनों ही राज्य सहमत नहीं थे और मसला हल नहीं हो सका। मराठीभाषी कन्नड़ इलाकों को महाराष्ट्र में मिलाने की मॉंग को लेकर कुछ नेताओं ने महाराष्ट्र एकीकरण समिति गठित की, लेकिन वह बेअसर साबित हुई।

वर्ष 2006 में यह विवाद फिर से सुर्खियों में आया , जब महाराष्ट्र सरकार ने बेलगाम पर दावा जताते हुए, सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में दलील दी गयी कि कर्नाटक में रहने वाले मराठी भाषी लोगों के मन में असुरक्षा की भावना पैदा हो गयी है।

राज्यों का निर्माण और राज्य पुनर्गठन आयोग

जिस समय भारत को ब्रिटिश राज से स्वतंत्रता मिली, उस समय देश में 563 रियासतें थीं। इनका एकीकरण और पुनर्गठन, नई सरकार के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती था। विचार बना कि नये राज्यों के निर्माण के लिए भाषा को आधार बनाया जाये। इसके लिए 1947 में श्याम कृष्ण आयोग बनाया गया, लेकिन वह इस विचार के पक्ष में नहीं था। पर सरकार को लगता था कि जनता की यही इच्छा है।

इसी साल एक नया जेबीपी (जवाहरलाल नेहरू, बल्लभभाई पटेल, पट्टाभिसीतारमैया) आयोग गठित हुआ, जिसने भाषाई आधार पर पुनर्गठन का समर्थन किया। दिसंबर 1953 में न्यायमूर्ति फजल अली, हृदयनाथ कुंजरू और केएम पाणिक्कर की सदस्यता वाला राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया गया। उन्होंने एक ही सप्ताह में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी, जिसमें राष्ट्रीय एकता, प्रशासनिक और वित्तीय व्यवहार्यता, आर्थिक विकास, अल्पसंख्यक हितों की रक्षा तथा भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की सिफारिश की गयी थी।

कुछ संशोधनों के साथ इन सिफारिशों को सरकार ने अनुमति दे दी और 1956 में संसद द्वारा राज्य पुनर्गठन अधिनियम पास कर दिया गया। इसके अंतर्गत, देश में 14 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश बनाये गये। इसके बाद कई बार राज्यों का पुनर्गठन किया गया और नये-नये राज्य बनते गये। ज्यादातर मामलों में भाषा ही इनके गठन का मुख्य आधार रही।

अस्तित्व में, लेकिन सुस्त अंतर-राज्यीय परिषद

शायद ही ज्यादा लोगों को पता हो कि देश में भाषाई, सीमाओं संबंधी और नदियों के जल के बंटवारे, सुरक्षा की दृष्टि से सैन्य बलों की तैनाती, वित्तीय मामले जैसे मुद्दों को लेकर विभिन्न राज्यों के बीच होने वाले विवादों के निपटारे के लिए एक अंतर-राज्यीय परिषद भी है। सरकारिया आयोग की सिफारिशों और स्वयं राष्ट्रपति के आदेश से , संविधान के अनुच्छेद 263 के अंतर्गत यह संस्था 28 मई 1990 को गठित की गयी।

32 सालों से यह एक संवैधानिक निकाय के रूप में अस्तित्व में है, जिसके अध्यक्ष देश के प्रधानमंत्री होते हैं। संस्था के सदस्यों में देश के गृहमंत्री सहित, प्रधानमंत्री द्वारा नामांकित छह केंद्रीय मंत्री, सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य मंत्री, राष्ट्रपति शासन वाले राज्यों के राज्यपाल होते हैं। लेकिन, हैरानी की बात यह है कि पिछले तीन दशकों में अंतर-राज्यीय परिषद की सिर्फ 12 मीटिंग ही हुई हैं। इनमें भी आखिरी, पॉंच साल पहले 25 नवंबर 2017 को हुई थी।

चाहे असम-मेघालय हो या महाराष्ट्र-कनार्टक, देखने में आ रहा है कि विवादों को हवा देकर राजनीतिक फायदा उठाने के प्रयास जोर पकड़ रहे हैं। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि इस परिषद को अधिक मजबूत, चुस्त और सक्रिय किया जाये, ताकि यह भविष्य में भयावह रूप ले सकने वाली अंतर-राज्यीय समस्याओं को समय रहते सुलझाने में अपनी प्रभावी भूमिका निभा सके।

यह भी पढ़ें: State Border Disputes: महाराष्ट्र और कर्नाटक में सीमा विवाद क्यों, किन-किन राज्यों में है सीमा विवाद?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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English summary
Maharashtra Karnataka Border Dispute again flares up
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